भारतीय संस्कृति में विश्वास का बंधन अमूल्य माना गया है। रक्षाबंधन का पावन पर्व इसी विश्वास का प्रतीक है। हिन्दू संस्कृति में ‘सूत्र’ अविच्छिन्नता का प्रतीक माना गया है। ऋषि मनीषा कहती है कि जिस तरह सूत्र (धागा) बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला के रूप में एकाकार बनता है, ठीक उसी तरह रक्षासूत्र में निहित विश्वास व्यक्ति को मानवीय कर्तव्यों से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। पवित्र स्नेह का बंधन और रक्षा का संकल्प। यही है इस श्रावणी पर्व का मूल तत्व दर्शन।

मूल्यहीनता के वर्तमान दौर में रक्षा सूत्र धारण करने वाले व्यक्ति के भीतर कर्तव्यबोध जागृत होता है। देश की सीमाओं पर तैनात हमारे जांबाज सैनिकों की कलाइयों पर सजी राखियां उनके भीतर ऐसी नव ऊर्जा भर देती हैं कि कर्तव्य की बलिवेदी पर कुर्बान होने में उन्हें जरा भी भय नहीं रहता।

अनेक दिलचस्प कथानक इस पर्व की पौराणिकता की तस्कीद करते हैं। मान्यता है कि सर्वप्रथम मां लक्ष्मी ने दानवराज बलि को रक्षासूत्र बांधा था। यह प्रसंग भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ा है। कथा है कि दानवों के राजा बलि के सौ अश्वमेघ यज्ञ पूरे होने पर जब देवराज इन्द्र का सिंहासन डोलने लगा, तो इन्द्र आदि देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने वामन बटुक का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा में तीन पग भूमि के बदले तीनों लोक मांग लिये। प्रभु की लीला को समझ चुके बलि ने तत्क्षण अपना शीश उनके चरणों में प्रस्तुत कर दिया। प्रभु के पैर रखते ही बलि पाताल पहुंच गये। भक्तवत्सल प्रभु बलि की इस सदाशयता पर रीझ गये और उनके निवेदन पर पाताललोक में उनके समक्ष रहना स्वीकार लिया। जब माता लक्ष्मी को इसकी जानकारी हुई तो वे पाताल लोक पहुंची और बलि को रक्षासूत्र बांधकर अपना भाई बनाकर उपहार में अपने पति विष्णु को वापस मांग लिया। कहते हैं बलि को सूत्र बंधन की वह तिथि श्रावण मास की पूर्णिमा थी।

भविष्य पुराण की एक कथा के अनुसार एक बार देवता और दैत्यों (दानवों) में बारह वर्षों तक युद्ध हुआ परन्तु देवता विजयी नहीं हुए। हार के भय से दु:खी इंद्र देवगुरु बृहस्पति के पास गये और उनके सुझाव पर इंद्र की पत्नी महारानी शची ने श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन विधि-विधान से व्रत का अनुष्ठान कर रक्षासूत्र तैयार किये और स्वास्ति वाचन के साथ वह सूत्र इंद्र की दाहिनी कलाई में बांधा। उस रक्षासूत्र की शक्ति ने इन्द्र को विजय दिलायी। वह रक्षासूत्र आज भी बोला जाता है- ‘येन बद्धोबली राजा दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वां मनुबध्नामि, रक्षंमाचल माचल।।’ मंत्र का भावार्थ है कि दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधती हूं। हे रक्षासूत्र! तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो।

महाभारत युग की श्रीकृष्ण व दौपदी के जीवन से जुड़ी एक घटना भी इस पर्व से जुड़ी है। जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया, तब उनकी तर्जनी में चोट आ गयी। उस वक्त द्रौपदी ने अपनी साड़ी का आंचल फाड़कर उनकी अंगुली पर पट्टी बांधी थी। वह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। बाद में श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के चीर-हरण के समय उनकी लाज बचाकर भाई का धर्म निभाया था। प्राचीन काल में जब देश में राजपूत राजा जब लड़ाई पर जाते थे, तब घर की महिलाएं उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ-साथ हाथ में रेशमी धागा भी बांधती थी। इस विश्वास के साथ कि यह धागा उन्हें विजयश्री के साथ वापस ले आएगा।

निराला की दीदी महादेवी

ऐसा ही एक मर्मस्पर्शी संस्मरण हिंदी की महान कवयित्री महादेवी वर्मा और महाप्राण ‘निराला’ के जीवन का है। ‘निराला’ महादेवी के मुंहबोले भाई थे। एक बार वे रक्षाबंधन के दिन सुबह-सुबह महादेवी के घर जा पहुंचे। अपनी लाडली बहन के घर के सामने रिक्शा रुकवाकर चिल्लाकर बोले, ‘दीदी! जरा बाहर आओ और हां, बारह रुपये भी लेती आना।’ महादेवी रुपये लेकर ले घर के बाहर निकल आयीं। निराला को पैसे दिये, पर सहज ही पूछ बैठीं, यह तो बताओ भैया, यह सुबह-सुबह आज बारह रुपये की क्या जरूरत आन पड़ी? हालांकि ‘दीदी’ यह अच्छे से जानती थीं कि उनका यह दानवीर भाई रोजाना ही किसी न किसी को अपना सर्वस्व दान कर आ जाता है, पर आज तो रक्षाबंधन है, आज क्यों? उत्तर में निराला सरलता से बोले, अरे दीदी! ये दुई रुपया तो इस रिक्शा वाले के लिए और दस रुपये तुम्हें देना है। आज राखी है न! तुम्हें भी तो राखी बंधवाई के पैसे देने होंगे। ऐसे थे फक्कड़ ‘निराला’ और ऐसी थी उनकी वह स्नेहमयी ‘दीदी’। महादेवी वर्मा को जब ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो एक साक्षात्कार के दौरान किसी ने उनसे पूछा कि आप इन एक लाख रुपयों का क्या करेंगी? प्रश्न सुनकर वे भावुक हो उठीं। कहने लगी, अब मैं अब न तो कीमती साड़ियां पहनती हूं और न कोई सिंगार-पटार। पर इस बात की टीस जरूर है कि यदि ये लाख रुपये कुछ समय पहले मिल गये होते तो अपने भाई को चिकित्सा और दवा के अभाव में यूं न जाने देती।

राखी के साथ एक और ऐतिहासिक प्रसंग जुड़ा हुआ है। मुगलकाल में जब बादशाह हुमायूं चितौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा वचन ले लिया। हुमायूँ ने इसे स्वीकार कर मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्मवती और मेवाड़ राज्य की रक्षा की। मध्ययुग की बात करें तो विश्व विजय अभियान पर निकले महान योद्धा सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया था। वहीं भारतीय सम्राट पुरु ने भी युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दे दिया था।  मानवीय रिश्तों में नवीन ऊर्जा का संचार करने वाले इस पावन पर्व से जुड़े उपरोक्त उद्धरण न सिर्फ इस पुरातन वैदिक पर्व की महत्ता को उजागर करते हैं, अपितु मूल्यहीनता के वर्तमान दौर में भी इस सूत्र को धारण करने वाले व्यक्ति के भीतर इस कर्तव्यबोध को जागृत करते हैं कि अतीत के महामानवों की भांति उनके भीतर भी साहस, बल, बुद्धि और विद्या के वही बीज विद्यमान हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है कि देश की सीमाओं पर तैनात हमारे जांबाज सैनिकों की कलाइयों पर सजी राखियां उनके भीतर ऐसी नव ऊर्जा भर देती हैं कि कर्तव्य की बलिवेदी पर कुर्बान होने में उन्हें जरा भी भय नहीं रहता।

आजाद को मिली बहन

बात उन दिनों की है जब क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत थे। फिरंगियों से बचने के लिए एक तूफानी रात वे एक ऐसे दरवाजे पर जा पहुंचे, जहां एक विधवा अपनी बेटी के साथ रहती थी। हट्टे-कट्टे आजाद को डाकू समझ कर पहले तो वृद्धा ने शरण देने से इनकार कर दिया, लेकिन जब आजाद ने अपना परिचय दिया तो ससम्मान घर के भीतर ले आयीं। बातचीत में उन्हें आभास हुआ कि गरीबी के कारण विधवा की बेटी की शादी नहीं हो पा रही है। आजाद ने उस विधवा से कहा, बहन! मेरे सिर पर पांच हजार का का इनाम है, आप फिरंगियों को मेरी सूचना देकर वह इनाम पा अपनी बेटी का विवाह सम्पन्न करवा सकती हैं। आजाद की बात सुन विधवा रो पड़ी। वह बोली, भैया! तुम देश की आजादी के लिए अपनी जान हथेली पर रखे घूमते हो… न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है। मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती। यह कहते हुए उसने एक रक्षासूत्र आजाद के हाथों में बांध कर भाई बना लिया। सुबह जब विधवा की आंखें खुली तो आजाद जा चुके थे और तकिए के नीचे एक पर्ची के साथ 5000 रुपये रखे थे, लिखा था- अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट- आजाद।

इस दिन को सनातनधर्मी वैदिक ब्राह्मणों के ज्ञानपर्व “श्रावणी उपाकर्म” के रूप में भी मनाया जाता है। वेदमंत्र है-तन्मे मन: शिव संकल्पमस्तु। यानी हम शिव (कल्याण) संकल्प मन वाले बनें क्योंकि शिव संकल्प ही सामाजिक बुराइयों को खत्म कर सकता है। इसका उद्देश्य प्रमाद या अज्ञानवश किए गए दुष्कर्मों को प्रायश्चित द्वारा दूर कर जीवन-मूल्यों की रक्षा के लिए संकल्पित होना है। प्राचीन काल में इसी दिन से वेद अध्ययन आरम्भ करने की प्रथा थी। इसी दिन यज्ञोपवीत बदलने का भी विधान है। भारत में जिस समय गुरुकुल शिक्षा प्रणाली पूर्ण उत्कर्ष पर थी, उस समय विद्या ग्रहण के पूर्व व उपरान्त गुरु से आशीर्वाद लेने के लिए शिष्य उनसे अपनी कलाई पर रक्षा सूत्र बंधवाते थे।

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