भारतीय रुपया मुद्रा बाजार में लुढ़कने का नया रिकॉर्ड बना रहा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया बार-बार 70 के स्तर को पार कर रहा है। बाजार विश्लेषकों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि रुपये की कीमत में मुख्य रूप से वैश्विक कारकों की वजह से गिरावट आ रही है। रुपया 70 के स्तर को पार करने के बाद भारतीय रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप से कुछ सुधार करता है, लेकिन मांग बढ़ते ही लुढ़ककर फिर 70 के स्तर को पार कर जाता है।

वैश्विक उथल-पुथल की वजह से रुपया लगातार गिर रहा है। इस साल इसकी कीमत 9.78 फीसदी टूट चुकी है। ऐसे में अमेरिका-चीन के ट्रेडवॉर के बीच भारत अपनी मुद्रा की कीमत कैसे स्थिर रख पायेगा, ये एक अहम सवाल है।

13 अगस्त को रुपये ने हाल के दिनों में सबसे बड़ी गिरावट देखी। एक ही दिन में ये 1.09 रुपये गिरकर 69. 93 के स्तर पर पहुंच गया। उम्मीद की जा रही थी कि आरबीआई रुपये की गिरावट को थामने के लिए हस्तक्षेप करेगा, लेकिन वैश्विक उथल-पुथल की वजह से केंद्रीय बैंक ने भी कोई हस्तक्षेप नहीं किया और 3 सितंबर 2013 के बाद पहली बार रुपये की कीमत में एक दिन में इतनी बड़ी गिरावट दर्ज की गयी। उसके बाद रुपये की कीमत को थामने की कई बार कोशिश की गयी, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार के दबाव की वजह से अभी भी रुपये की कीमत 70 से कुछ आगे या कुछ पीछे ही चल रही है।

वैश्विक उथल-पुथल का असर

इस सप्ताह भी इसने दो बार 70 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार किया है। रुपये की कीमत में गिरावट का असर आयातित वस्तुओं पर पड़ना तय है। माना जा रहा है की अभी रुपये में जो गिरावट हुई है, उसकी मुख्य वजह टर्की से मेटल इंपोर्ट पर अमेरिकी ड्यूटी डबल किया जाना है। आलम यह है कि इमर्जिंग मार्केट समझे जाने वाले दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील की मुद्रा में भी लगभग 20 फीसदी की गिरावट हो गयी है। अर्थशास्त्री राजीव कुमार का कहना है कि भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति के कारण रुपये की कीमत ज्यादा नहीं गिर सकती है। हालांकि देखा जाये तो जनवरी से लेकर अभी तक रुपये की कीमत में 9.78 फीसदी की गिरावट आ चुकी है, लेकिन आंतरिक अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर भारत में महंगाई दर नियंत्रण में है। साथ ही 10 अगस्त को आरबीआई द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक विदेशी मुद्रा भंडार 400. 88 डॉलर के उच्चतम स्तर पर है। यानी रुपये पर दबाव बढ़ने से भी देश को तात्कालिक नुकसान होने की आशंका नहीं है। विदेशी मुद्रा भंडार की मजबूती से रुपये की कीमत को कभी भी थामने की कोशिश की जा सकती है।

बाजार विश्लेषक डीके जोशी का मानना है कि रुपये की कीमत में गिरावट का सबसे ज्यादा असर तेल का आयात करने वाली आॅयल मार्केटिंग कंपनियों पर पड़ सकता है। रुपये की कीमत में अभी हो रही गिरावट के पीछे वैश्विक दबाव के साथ ही एक बड़ी वजह तेल आयात करने वाली कंपनियों की ओर से डॉलर की मांग में हुई जबरदस्त वृद्धि को भी माना जा रहा है। इसके बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अमेरिकी डॉलर लगातार मजबूत हो रहा है। अमेरिका में इस साल ब्याज दरों में बढ़ोतरी की गयी है और 2019 के लिए भी पॉजिटिव आउटलुक रखते हुए तीन बार ब्याज दरें बढ़ाने की बात कही गयी है। अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेडवॉर की वजह से अमेरिका अपनी आर्थिक स्थिति को ब्याज दरों के बल पर मजबूत बनाये रखना चाहता है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी से डॉलर को भी लगातार मजबूती मिली है।

मजबूत हो सकता है रुपया

जानकारों का कहना है कि रुपये की कीमत कई बातों पर निर्भर करती है इन बातों में डॉलर की मांग और उसकी आपूर्ति सबसे महत्वपूर्ण है। डॉलर की मांग बढ़ने पर वह महंगा होता है और रुपये की कीमत घटती चली जाती है। इसके साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार की मजबूती भी अहम कारक है। विदेशी मुद्रा भंडार कमजोर होने पर भुगतान असंतुलन की आशंका से भी डॉलर महंगा हो जाता है। भारत के लिए स्थिति चिंताजनक इसलिए नहीं है, क्योंकि वैश्विक उथल-पुथल का दौर खत्म होने के बाद रुपया वापस मजबूती हासिल कर सकता है। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि रुपये की कीमत में आयी गिरावट का अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। इसका सबसे बुरा असर पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत पर पड़ेगा। भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी कच्चा तेल विदेशी बाजार से आयात करता है। ऐसे में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत में उछाल आने की भी आशंका है।

ऐसा नहीं है कि रुपये की कीमत में गिरावट से सिर्फ नुकसान ही है। कुछ क्षेत्रों में रुपये की गिरावट से फायदा भी होगा। उदाहरण के लिए फार्मा सेक्टर, आॅटोमोबाइल सेक्टर, आॅटो सेक्टर जैसे निर्यात आधारित सेक्टर्स को रुपये की गिरावट से निश्चित रूप से फायदा होगा। लेकिन अगर समग्र रूप से अर्थव्यवस्था की मजबूती की बात की जाये, तो रुपये की गिरावट चिंताजनक संकेत देती है। रुपये की कीमत बार-बार 70 के स्तर को पार कर रही है। ऐसे में रिजर्व बैंक को तत्काल सुरक्षात्मक उपाय करने होंगे। सबसे पहली चुनौती तो रुपये को 70 के स्तर से नीचे लाने की है। लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थिति में ऐसा होना काफी कठिन है।

बढ़ सकती है ब्याज दर

रुपये की कीमत में गिरावट आने के बाद वित्त मंत्रालय ने भी बयान जारी करके लोगों से नहीं घबराने की अपील की है। सरकार का मानना है कि ये गिरावट बाहरी कारकों की वजह से हो रही है और आगे चलकर इसमें सुधार होने की उम्मीद है। लेकिन सरकार के इस बयान को लेकर ही निश्चिंत नहीं हुआ जा सकता है। रुपये की कीमत में गिरावट को रोकना जरूरी है। रुपये की कीमत को थामने के उपायों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी करना भी एक तरीका हो सकता है। आरबीआई ने इस साल लगातार दो बार ब्याज दरों में इजाफा किया है। रुपये की कमजोरी को देखते हुए अनुमान लगाया जा रहा है कि केंद्रीय बैंक एक बार फिर ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने का तरीका अपना सकता है।

इसके साथ ही आरबीआई को फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में दखल देकर भी इस मसले को हल करने की कोशिश करनी चाहिए। करंसी की बिगड़ती स्थिति को सुधारने में टैरिफ में भी इजाफा करने का उपाय अपनाया जा सकता है। आयात को कम करके डॉलर की मांग में कमी लाने के लिए पहले भी अपने देश में टैरिफ में इजाफा किया जाता रहा है। अब चालू खाता घाटे को नियंत्रित करने के लिए ऐसा फिर से किया जा सकता है। इसके पहले 2013 में भी भारत ने रुपये की गिरावट को थामने के लिए गोल्ड और ज्वेलरी के आयात पर टैरिफ को बढ़ा दिया था।

परस्पर सहयोग जरूरी

जानकारों का कहना है कि यदि कैपिटल फ्लो में सुधार नहीं होता है, तो आरबीआई की ओर से 20 अरब डॉलर तक की रकम चालू खाते के घाटे को कम करने के लिए दी जा सकती है। लेकिन इन उपायों से भी ज्यादा अहम बात तो ये है कि भारत को ट्रेडवॉर के इस दौर में समझदारी से काम लेते हुए वैश्विक शक्तियों के साथ तालमेल बैठाने की कोशिश करनी चाहिए। उथलपुथल के इस दौर में लगभग हर देश की मुद्रा डॉलर की तुलना में कमजोर हो रही है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि दुनिया भर की तमाम आर्थिक शक्तियां परस्पर सहयोग का रवैया अपनाएं और समझदारी से काम लें। क्योंकि अगर ट्रेडवॉर के साथ ही दुनिया में करंसी वॉर भी बढ़ा तो इसका नुकसान सिर्फ भारत या अन्य विकासशील देशों को ही नहीं होगा, बल्कि इसकी मार विकसित देशों को भी झेलनी पड़ेगी।

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रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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