र्थव्यवस्था के संकेतको में से एक शेयर बाजार लगातार गोते लगा रहा है। 28 सितंबर को कारोबार बंद होने के साथ ही सितंबर का महीना शेयर बाजार के लिए पिछले ढाई वर्षों के दौरान सबसे बुरा महीना बन गया। महीने के आखिरी शुक्रवार को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) का 30 शेयरों वाला सूचकांक सेंसेक्स गिरकर 36,277.14 अंक पर बंद हुआ। महीने के आखिरी कार्य दिवस की गिरावट को मिलाकर सितंबर के महीने में सेंसेक्स ने कुल 2,417.93 अंकों का गोता लगाया, जो फरवरी 2016 के बाद सेंसेक्स के गिरावट के लिहाज से सबसे बुरा प्रदर्शन है। महीने के इस आखिरी कारोबारी दिन नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) का 50 शेयरों वाला सूचकांक निफ्टी भी गिरकर 10,930.45 अंक पर बंद हुआ।

38,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार करने के बाद बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स सितंबर के बाद अब अक्टूबर में भी लगातार फिसलता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय कारकों की वजह से बाजार पर मंदड़िये हावी हैं। ऐसे में छोटे निवेशकों के लिए बाजार से दूर रहना ही बेहतर है।

ध्यान दिया जाय, तो इन दोनों प्रमुख सूचकांकों के लिए यह लगातार चौथी साप्ताहिक गिरावट थी। सितंबर के आखिरी सप्ताह में सेंसेक्स ने कुल 614.46 अंकों का गोता लगाया, वहीं निफ्टी भी 212.65 अंक फिसल गया। बाजार के ट्रेंड से जाहिर है कि अभी शेयर बाजार में गिरावट का दौर बना हुआ है। जो संकेत मिल रहे हैं, उससे अक्टूबर के महीने को भी सेंसेक्स के लिहाज से ज्यादा शुभ नहीं माना जा सकता है। एनएसई के ब्रोकर सुमित ढौंढियाल के मुताबिक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में आयी कमजोरी, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमत, नन बैंकिंग फाइनेंस (एनबीएफसी) सेक्टर में हाल के दिनों में बने संकट और बाजार में पूंजी उपलब्धता की चुनौतियों की वजह से निवेशकों का रुख शेयर बाजार के प्रति अच्छा नहीं है।

रुपये की कीमत में आयी गिरावट की वजह से आयात महंगा हो गया है और इससे विदेशी मुद्रा भंडार लगातार कमजोर हो रहा है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में लगातार आ रही उछाल ने भी विदेशी मुद्रा भंडार को बुरी तरह से प्रभावित किया है। ऊपर से एनबीएफसी सेक्टर की नकारात्मक खबरों ने भी शेयर बाजार को तोड़कर रख दिया है। इन कारकों की वजह से शेयर बाजार को स्थिर होने का मौका ही नहीं मिल रहा है और एक-दो दिन की मजबूती दिखाने के बाद ये फिर फिसल जाता है।

आलम ये हो गया है कि सितंबर के महीने में नेट बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों के शेयरों की हालत लगातार खराब रही। पीएनबी हाउसिंग फाइनेंस के शेयर कारोबारी सत्र के दौरान साढ़े चार फीसद से ज्यादा टूट गए, जबकि इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड को नौ फीसदी से भी अधिक का नुकसान झेलना पड़ा। इसी तरह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा की गई कार्रवाई की वजह से यस बैंक के शेयरों को भी राहत नहीं मिल सकी और वह 9.7 फीसदी गिर गया। सितंबर के महीने में गिरने वाले प्रमुख शेयरों में टाटा स्टील, भारती एयरटेल, बजाज आॅटो, हीरो मोटोकॉर्प जैसे शेयर शामिल हैं। सितंबर के आखिरी कारोबारी दिन एचडीएफसी लिमिटेड, आईटीसी, इंफोसिस ओएनजीसी जैसे शेयरों ने तेज खरीदारी के बल पर सेंसेक्स की गिरावट को काफी हद तक जरूर थाम लिया, लेकिन शेयर बाजार में गिरावट का दौर आगे भी जारी रहने की उम्मीद है।

जानकारों का कहना है के शेयर बाजार मामूली खबर के वजह से भी कई बार लुढ़क जाता है। सितंबर का महीना शेयर बाजार में लगातार बुरी खबर लेकर आने वाला रहा। रुपये के मूल्य में गिरावट और कच्चे तेल की कीमत में उछाल तो लगातार बनी हुई है. लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंस सर्विसेज (आईएलएंडएफएस) की नकारात्मक रिपोर्ट और उसकी आर्थिक स्थिति ने शेयर बाजार में  सक्रिय एनबीएफसी सेक्टर और हाउसिंग सेक्टर पर काफी भी प्रतिकूल प्रभाव डाला है। आईएलएंडएफएस का नियंत्रण हालांकि सरकार ने अपने हाथ में ले लिया है और अब उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में इसकी स्थिति में सुधार होगा। जाने-माने बैंकर उदय कोटक की अगुवाई में कंपनी का नया बोर्ड इसको आर्थिक चुनौतियों से उबार पाने में सक्षम हो सकेगा है, लेकिन जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक इस कंपनी के बुरे परिणाम शेयर बाजार के कारोबारी सत्रों में नजर आते रहेंगे।

इस बात की भी जानकारी आ रही है कि भारत सरकार नन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों को मजबूती देने के लिए जल्द ही ठोस उपायों की घोषणा कर सकती है। अगर ऐसा हुआ तो इस सेक्टर में कार्यरत कंपनियां जल्द ही शेयर बाजार में अपनी स्थिति सुधार सकेंगी। जहां तक रुपये की मजबूती की बात है, तो फिलहाल इसमें तत्काल सुधार के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। रुपये की कीमत को थामने के लिए पिछले दो महीने के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा भंडार से लगभग 25 अरब डॉलर की निकासी कर चुका है। सितंबर के आखिरी शुक्रवार को विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 393 अरब डॉलर थे। फिलहाल इसकी स्थिति संतोषजनक है और अभी भी रुपये की स्थिति सुधारने के लिए आरबीआई लगभग 90 अरब डॉलर आसानी से मुद्रा बाजार में निकाल सकता है, लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं है।

अगर जल्द ही निर्यात के मोर्चे पर भारत को मजबूती नहीं मिली और आयात पर प्रभावी अंकुश नहीं लगाया जा सका, तो रुपये की कीमत को थाम पाना बहुत मुश्किल हो जायेगा। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से भी विदेशी मुद्रा भंडार पर तो दबाव पड़ ही रहा है, भारत में भी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत लगातार बढ़ती जा रही है। ये परेशानी और भी बढ़ सकती है, क्योंकि तेल उत्पादक देशों की संस्था ओपेक ने कच्चे तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी करने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों का तेज होना लगभग तय है।

भारतीय अर्थव्यवस्था की दृष्टि से तेल की कीमत में बढ़ोतरी और रुपये की कीमत में गिरावट दोनों ही प्रतिकूल असर डालने वाले कारक हैं। इन दोनों ने शेयर बाजार को अभी भी प्रभावित किया है और आगे भी लगातार प्रभावित करते रहेंगे। हालांकि त्योहारी सीजन होने की वजह से बाजार में मुद्रा प्रवाह बढ़ेगा और ये शेयर बाजार के लिए एक सकारात्मक बात है। क्योंकि आमतौर पर त्योहारी सीजन में निवेशक पैसा लगाने के लिए के लिए प्रेरित होते हैं। नवरात्रों से लेकर दीपावली के बीच छोटे निवेशकों का निवेश बढ़ने का ट्रेंड देखा जाता है। निवेशकों के इस रुख से बाजार को कुछ मजबूती मिल सकती है।

बाजार के लिए असल परेशानी अंतरराष्ट्रीय कारक हैं। इनकी वजह से ही देश का शेयर बाजार दबाव की स्थिति में आया है। अगर उन पर नियंत्रण पाने का शीघ्र ही कोई उपाय नहीं किया गया, तो त्योहारी सीजन में होने वाला फायदा भी शेयर बाजार में जान फूंकने में कामयाब नहीं हो सकेगा। भारतीय शेयर बाजार पिछले चार वर्षों में लगातार नई ऊंचाई हासिल करता रहा है और बीएसई का सूचकांक सेंसेक्स 38,000 के मनोवैज्ञानिक स्तर को भी पार कर चुका है। लेकिन, अगस्त के आखिरी सप्ताह से जो गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ है, वह अभी भी जारी है। ऐसे में जब तक सरकार अपने स्तर पर आर्थिक क्षेत्र में ठोस कार्रवाई करने के संकेत नहीं देती है, तब तक शेयर बाजार को वापस तेज उछाल लाने वाले बाजार के रूप में तब्दील कर पाना आसान नहीं होगा।

जहां तक छोटे और खुदरा निवेशकों की बात है, तो अभी शेयर बाजार में उनके लिए जोखिम ज्यादा है और अल्पकालिक सौदा करने वाले निवेशकों को तो फिलहाल बाजार से दूर ही रहना चाहिए। लेकिन यदि कोई लंबी अवधि के लिए बाजार में निवेश करने का इच्छुक है तो वह बाजार में आयी लगभग दो हजार अंकों की गिरावट का फायदा उठाते हुए अच्छे प्रदर्शन वाले शेयरों में निवेश कर सकता है। इसका उसे दीर्घकाल में फायदा मिल सकता है।

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