क्टूबर 2013 के बाद पहली बार भारतीय रिजर्व बैंक ने दो लगातार बैठकों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने का फैसला किया है। आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने रीपो रेट और रिवर्स रीपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी कर दी है। हालांकि महंगाई की संभावना को देखते हुए केंद्रीय बैंक का यह फैसला अप्रत्याशित तो नहीं है, लेकिन लगातार दूसरी बार ब्याज दरों में वृद्धि होना महंगाई के मोर्चे पर चिंताजनक संकेत भी देता है। यह स्थिति भी तब है जब अर्थव्यवस्था की रफ्तार ठीक बने रहने की उम्मीद जतायी जा रही है, लेकिन महंगाई की आशंका पीछा नहीं छोड़ रही है।

महंगाई की आशंका को देखते हुए आरबीआई ने एक बार फिर ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर दी है। इससे तमाम कर्जों की ईएमआई बढ़ने की संभावना बन गयी है। ब्याज दरों में हुई ये वृद्धि महंगाई को लेकर भी चिंताजनक संकेत देती है।

महंगाई बढ़ने की आशंका

आरबीआई को महंगाई बढ़ने के मुख्य कारकों में खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में लागत की तुलना में की गयी 50 फीसदी की बढ़ोतरी एक बड़ी वजह लग रही है। हालांकि एमएसपी में हुई बढ़ोतरी का ठीक-ठीक असर आने वाले दो-तीन महीने बाद ही पता चल सकेगा, जब खरीफ फसलों की बिक्री शुरू होगी। यदि सरकारी खरीद भी पिछले साल की तरह ही अधिक हुई, तो महंगाई पर इसका असर पड़ना लाजिमी होगा। इसके साथ ही आरबीआई कच्चे तेल के आयात से जुड़ी आशंकाओं को भी देखते हुए सावधानी बरतने की रणनीति अपना रहा है। महंगाई बढ़ने के अन्य कारकों में केंद्र सरकार द्वारा कुछ वस्तुओं पर लागू जीएसटी की दरों में कटौती भी एक है। ग्राहकों तक इस कटौती का सीधा फायदा पहुंचता है, तो उत्पादों की कीमत अवश्य कम होगी लेकिन इन उत्पादों के उठाव में बढ़ोतरी होने से मुद्रा की उपलब्धता पर असर पड़ेगा।आर्थिक विश्लेषक एस रामचंद्रन के मुताबिक खाद्य एवं ईंधन को छोड़कर बाकी सभी वस्तुओं की महंगाई हाल के दिनों में बढ़ी है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कंपनियों ने उत्पादन लागत में हुई बढ़ोतरी की रकम ग्राहकों से ही वसूली है। महंगाई की एक और वजह फाइनेंशियल मार्केट में जारी उथल-पुथल की आशंका भी है। इसी आधार पर आरबीआई ने मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में महंगाई दर 4.6 फीसदी तथा तीसरी तथा चौथी तिमाही में 4.8 फीसदी और 2019-20 की पहली तिमाही में 5 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है। महंगाई दर में वृद्धि की आशंका को देखते हुए ही केंद्रीय बैंक को लगातार दूसरी बार ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने का निर्णय लेना पड़ा है।

कच्चे तेल ने बढ़ायी चिंता

दरअसल भारतीय रिजर्व बैंक ने मुद्रास्फीति को 4 फीसदी से ऊपर न जाने देने का लक्ष्य रखा है, लेकिन केंद्रीय बैंक और वित्त मंत्रालय की तमाम कोशिशों के बावजूद इस पर लगाम नहीं लग सका है। कच्चे तेल की ही बात की जाये तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत इस साल लगभग 20 फीसदी तक उछल चुकी है। अभी तेल की कीमत में कुछ नरमी जरूर आयी है, लेकिन आने वाले दिनों में तेल के दाम में और बढ़ोतरी होने की आशंका है। खासकर ईरान पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंध के मद्देनजर कच्चे तेल की कीमत में और भी उछाल आ सकता है। इस तरह से महंगा आयात बिल अंतत: भारत में महंगाई और मुद्रास्फीति को ही हवा देगा।

एक परेशानी रुपये की कमजोरी की भी है। रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हुई है। इस साल जनवरी से लेकर अभी तक रुपये की कीमत में 7 फीसदी की गिरावट आ चुकी है। आने वाले कुछ दिनों में इसके 70 रुपये के स्तर तक नीचे गिर जाने की आशंका जतायी जा रही है। ये दोनों ऐसी वजहें हैं, जिनके कारण भारतीय मुद्रा में आयात बिल का दबाव बढ़ सकता है, जो कि अंतत: महंगाई बढ़ाने का एक कारण बनेगा।

देश में अभी मानसून की स्थिति भी ठीक नहीं है। मानसून के देशभर के आंकड़ों के मुताबिक मानसून का पैटर्न काफी असंतुलित रहा है। कुछ स्थानों पर जरूरत से कम बारिश हुई है तो कुछ स्थानों पर जरूरत से ज्यादा बारिश हुई है। यानी कहीं सूखे की स्थिति बन रही है, तो कहीं बाढ़ की स्थिति बनी हुई है। ऐसे भी पूरे देश में हुई बारिश का समग्र आंकड़ा सामान्य से छह फीसदी कम बारिश दिखा रहा है। परेशानी ये है कि मौसम विभाग ने अगस्त में मानसून की चाल में कमजोरी रहने की आशंका जतायी है। अगर ऐसा हुआ तो इसका सीधा असर आने वाली खरीफ फसल पर भी पड़ेगा। जिन क्षेत्रों में बारिश जरूरत से ज्यादा हुई है वहां की स्थिति तो फिर भी संभल जायेगी, लेकिन जिन क्षेत्रों में जरूरत से कम बारिश हुई है, वहां मानसून की कमजोरी सूखे की स्थिति बना सकती है। ऐसा हुआ तो खरीफ फसल का उत्पादन भी आशा के अनुरूप नहीं हो सकेगा।

घट सकती है वृद्धि दर

भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने इन तमाम तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही ब्याज दरों में लगातार दूसरी बार बढ़ोतरी करने का फैसला लिया है और बहुमत से रीपो रेट तथा रिवर्स रीपो रेट में बढ़ोतरी की गयी है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी से जहां देश का आम नागरिक प्रभावित होगा, वही कॉरपोरेट के कामकाज पर भी इसका असर पड़ेगा। त्वरित लोन लेकर काम करने की प्रक्रिया इससे धीमी पड़ सकती है, जिसका सीधा असर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और कॉरपोरेट सेक्टर दोनों की ही वृद्धि दर घटने के रूप में दिखेगा। ब्याज दर बढ़ने के बाद निश्चित रूप से बैंक फिक्स डिपॉजिट दर बढ़ा सकते हैं। इससे बचत के प्रति लोगों का रुझान जरूर बढ़ सकता है, लेकिन होम लोन, पर्सनल लोन, आॅटो लोन की ब्याज दर बढ़ने से लोग कर्ज लेने से बचने की कोशिश करेंगे। कुछ समय पहले ही जीएसटी की दरों में हुई कटौती की वजह से ह्वाइट गुड्स इंडस्ट्री में तेजी आने की उम्मीद जतायी जा रही थी, लेकिन ईएमआई बढ़ने की आशंका के कारण इस इंडस्ट्री कि इस आशा पर भी तुषारापात हो सकता है। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि मौजूदा समय में बैंकों से कर्ज के उठान की रफ्तार काफी धीमी है। ऐसे में अगर बैंक लोन की दरों में और बढ़ोतरी करते हैं तो कर्ज का उठान और भी कम हो जायेगा। ऐसे में इस बात की भी संभावना जतायी जा रही है कि अधिकांश बैंक ब्याज दर में बढ़ोतरी करने की जगह कर्ज के उठान को तेज कर अपना बिजनेस बढ़ाने की कोशिश करेंगे। ऐसे भी ज्यादातर बैंकों ने हाल में ही अपने ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने का फैसला किया है। इसलिए संभव है कि सारे बैंक उपभोक्ताओं को दिये जाने वाले कर्ज की दरों में बढ़ोतरी करने से बचें। पुराने कर्ज की ईएमआई में बढ़ोतरी करने की नीति अवश्य ही अपनायी जा सकती है।

बढ़ सकती है ईएमआई

हालांकि आमतौर पर माना यही जाता है कि रीपो रेट में बढ़ोतरी होने का मतलब मोटे तौर पर बैंक के कर्जों की ब्याज दर बढ़ना ही होता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि रीपो रेट बढ़ने से बैंकों का मार्जिनल कॉस्ट बेस्ड लेंडिंग रेट (एमसीएलआर) भी बढ़ जायेगा। आरबीआई के निर्देशों के मुताबिक होम लोन समेत सभी तरह के लोन एमसीएलआर से जुड़े होने चाहिए। इसमें बैंकों को इस बात की छूट अवश्य दी गयी है कि वे एमसीएलआर के ऊपर कुछ अतिरिक्त चार्ज लगाते हैं या नहीं, ये उनपर निर्भर करता है। लेकिन इसमें शर्त यही है कि लेंडिंग रेट किसी भी हालत में एमसीएलआर से नीचे नहीं होना चाहिए। यही वजह है कि तमाम विशेषज्ञ कह रहे हैं कि जब केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने का फैसला ले ही लिया है, तो लोन लेने के इच्छुक लोगों को इंतजार करने की जगह तत्काल कर्ज ले लेना चाहिए। क्योंकि आने वाले कुछ दिनों में बैंक ब्याज दरों में परिवर्तन भी कर सकते हैं। उन्हें इस बात का इंतजार नहीं करना चाहिए कि कुछ दिन पहले ही ब्याज दर बढ़ाये जाने की वजह से बैंक दोबारा ब्याज दर नहीं बढ़ायेंगे।

ब्याज दर बढ़ने की बात पर विचार करने के क्रम में इस तथ्य पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि महंगाई की स्थिति आने वाले दिनों में और भी तीखी हो सकती है। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था में सुस्ती की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। यह ठीक है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने जीडीपी विकास दर के 7.4 फीसदी पर बने रहने का अनुमान जताया है, लेकिन अगर मुद्रास्फीति और महंगाई पर काबू पाने में भारतीय रिजर्व बैंक तथा केंद्रीय वित्त मंत्रालय सफल नहीं हुए, तो आने वाले दिनों में यही एक वजह विकास दर को भी प्रभावित करेगी। निश्चित रूप से चुनावी साल में सरकार ऐसा किसी भी हालत में नहीं चाहेगी।

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रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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