पेट्रोल, डीजल और बिना सब्सिडी वाले रसोई गैस की कीमतों को लेकर जितना बड़ा तूफान खड़ा किया गया है, उससे ऐसा लगता है कि शेष सारी पार्टियां तो जनता की हितैषी हैं। वे तेल मूल्य कम करना चाहतीं हैं लेकिन नरेन्द्र मोदी सरकार जानबूझकर कीमतों को बढ़ाती जा रही है। क्या यह तर्क किसी विवेकशील व्यक्ति के गले उतरेगा? कोई सरकार जिसे पांच विधानसभा चुनावों का सामना करना हो, उसके बाद लोकसभा चुनाव है, इस तरह जनता को नाराज करने वाला व्यवहार करेगा? हमारे यहां तो राजनीति के लिए सब कुछ बलि चढ़ा देने का चरित्र रहा है। कांग्रेस भारत बंद आयोजित कर इसका हीरो बन रही है। हालांकि उसकी कल्पना के अनुरूप सारे दल बंद में शामिल नहीं हुए। ममता बनर्जी ने कह दिया कि हम मूल्य वृद्धि का तो विरोध करते हैं, लेकिन बंद सही तरीका नहीं है।

भारत की गैर जिम्मेवार राजनीति ने तेल मूल्य को बड़ा मुद्दा बना दिया है। वे जनता को बार-बार यही संदेश दे रहे हैं कि सरकार मूल्य कम नहीं कर रही। भारत बंद बुलाकर कांग्रेस पाखंड कर रही है। उसने अपने राज में तो खूब दाम बढ़ाए और आज वह दाम घटाने की बात कर रही है। कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए कि कर्नाटक की सरकार ने जब पेट्रोल और डीजल पर वैट बढ़ाने का निर्णय किया तब आपने विरोध क्यों नहीं किया?

आम आदमी पार्टी ने भी यही बयान दिया लेकिन उसके दो नेता राहुल गांधी के साथ मंच पर थे। बसपा और समाजवादी पार्टी का कोई नेता आया नहीं। बीजद ने अपने काम को इससे अलग रखा। इसलिए कांग्रेस तेल मूल्य के बहाने अपने नेतृत्व में विपक्षी एकजुटता तो जो संदेश देना चाहती थी उसमें ये बड़ी कमी रह गई। फिर बसपा प्रमुख मायावती ने बयान दे दिया कि पहले कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए सरकार ने गलत नीति बनाई जिससे तेल मूल्य बढ़े और नरेन्द्र मोदी सरकार ने उसकी नीतियों को ही आगे बढ़ाया। नरेन्द्र मोदी सरकार की आलोचना तो उनको करनी ही थी लेकिन इस बयान के राजनीतिक मायने गंभीर हैं। अगर बसपा कांग्रेस का विरोध कर रही है तो क्या उत्तर प्रदेश में वह कांग्रेस को गठजोड़ का हिस्सा नहीं मानती? यह बड़ा प्रश्न इस प्रकरण से खड़ा हुआ है। मायावती के कहने का एक अर्थ तो यह लगाया ही जा सकता है कि भारत बंद बुलाकर कांग्रेस पाखंड कर रही है। उसने अपने राज में तो खूब दाम बढ़ाए और आज वह दाम घटाने की बात कर रही है। वैसे भी तेल मूल्य पर भारत बंद किया जाए यह तो किसी सूरत में मान्य नहीं हो सकता है। आज तक ऐसा नहीं हुआ। हालांकि यह सच है भारत की गैर जिम्मेवार राजनीति ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया है। वो जनता को बार-बार यही संदेश दे रहे हैं कि सरकार मूल्य कम नहीं कर रही। यह झूठ है। कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए कि कर्नाटक की सरकार में तो आप बड़ी पार्टी हैं। वहां की सरकार ने जब पेट्रोल और डीजल पर वैट बढ़ाने का निर्णय किया तब आपने विरोध क्यों नहीं किया? तब आपने कर्नाटक बंद क्यों नहीं कराया? लेकिन यह बड़ा मुद्दा बन चुका है। लोगों के सामने सच पहुंच नहीं रहा। हम मानते हैं और यह सच है कि तेल महंगा है तो इसका असर व्यापक होता है। महंगाई तो इससे सीधे जुड़ा है। अगर ढुलाई खर्च बढ़ेगा तो उस सामान का मूल्य बढ़ाना ही पड़ेगा। खसकर डीजल तो सीधे आम आदमी को प्रभावित करना है, किसानों को प्रभावित करता है। कोई नहीं चाहेगा कि महंगाई बढ़े और आम जन परेशान हो। पर कुछ स्थितियां ऐसी होतीं हैं जिन पर आपका वश नहीं होता। कोई अर्थशास्त्री नहीं मानेगा कि आज की स्थिति में तेल का मूल्य कम किया जा सकता है। भारत कच्चे तेल का अंतरराष्ट्रीय मूल्य निर्धारित नहीं कर सकता। केन्द्र के पास उत्पाद शुल्क तथा राज्यों के सामने वैट में कमी करने का विकल्प है। लेकिन सच यही है कि इनमें थोड़ी कमी करने से मूल्यों पर बहुत ज्यादा असर नहीं हो सकता। हां, केन्द्र एवं राज्यों की वित्तीय स्थिति अवश्य खराब होगी। अब आइए जरा तेल पर हो रही राजनीति की परत उकेरें तथा इसके अर्थशास्त्र को विस्तार से समझें। राहुल गांधी भारत बंद के हीरो बन रहे थे उनको याद दिलाना आवश्यक है कि कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए शासन के अंतर्गत पेट्रो पदार्थों के मूल्यों में रिकॉर्ड बढ़ोत्तरी हुई। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार जाने के दिन दिल्ली में पेट्रोल 31 रुपये तथा डीजल 21 रुपये प्रति लीटर था। मई 2014 तक यह 71 रुपये और 55 रुपये हो गया। 20 मई, 2004 से 16 मई, 2014 के काल में पेट्रोल की कीमत 75.8 प्रतिशत तथा डीजल की 83.7 प्रतिशत बढ़ी थी। भाजपा नीत राजग सरकार में पेट्रोल के मूल्य में 13 प्रतिशत था एवं डीजल में 28 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। अपने गिरेबान में कांग्रेस झांकती तथा यूपीए सरकार में शमिल दलों को थोड़ी भी शर्म होती तो इस तरह सरकार के विरोध का अनैतिक हरकत नहीं करते। आखिर आप देश में झूठ फैलाकर कैसा वातावरण बनाना चाहते हैं? चुनाव के लिए आप देश की अर्थव्यवस्था को दांव पर लगा देंगे? आर्थिक मामलों पर इस तरह की गंदी राजनीति सबके लिए आत्मघाती है।

हालांकि यूपीए सरकार के समय भी विरोध होता था। पर भारत बंद जैसा अतिवादी कदम कभी नहीं उठया गया। उस समय तेल कंपनियों के कुछ खर्च कम करने, विज्ञापन बंद करने आदि की मांग उठी और यह व्यावहारिक बात थी। आखिर तेल कंपनियों को अपना प्रचार करने की क्या आवश्यकता है? किंतु कुल मिलाकर अर्थशास्त्रियों का यही मानना था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते मूल्य के सामने हम विवश हैं, कुछ नहीं कर सकते। ध्यान रखिए, उस समय भी केन्द्र एवं राज्यों ने अपने करों में कटौती की लेकिन इससे मूल्य पर ज्यादा असर न होना था, न हुआ। हम लाचार हैं। तेल मूल्यों में केन्द्र के उत्पाद कर एवं राज्यों के वैट की बड़ी भूमिका है। इन्हें पूरी तरह खत्म कैसे किया जा सकता है? यहां विरोध करने वालों को यह आईना भी दिखाना जरूरी है कि अधिकतर राज्यों में वैट केन्द्र के उत्पाद शुल्क से ज्यादा है। मजे की बात देखिए कि वो पार्टियां भी सरकार के खिलाफ बयानवाजी कर रहीं हैं और बंद तक में शामिल थीं।

कुछ लोग तेल मूल्यों को प्रतिदिन निर्धारित करने की नीति की आलोचना करते हैं। 16 जून, 2017 से पेट्रोल-डीजल के मूल्य अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुसार प्रतिदिन निर्धारित करने (डेली डाइनैमिक प्राइसिंग) का नियम हो गया है। हालांकि इसके पहले भी तेल कंपनियां हर 15 दिन पर मूल्य की समीक्षा करती थी। तो अंतर इतना ही आया है। आप अगर अंतरराष्ट्रीय मूल्य के बावजूद कम मूल्य पर तेल बेचेंगे तो आपकी वित्तीय स्थिति खोखली हो जाएगी। पहले तेल कंपनियों की स्थिति बहुत खराब थी। उनको घाटे से बाहर निकालना था। आखिर घाटे पर कितने दिन चलाया जा सकता था। हालांकि प्रतिदिन वाली व्यवस्था के पीछे जो तर्क दिया गया उस रूप में पूरी तरह लागू हुआ नहीं। अंतरराष्ट्रीय मूल्य घटने के अनुरुप ग्राहकों को उसका पूरा लाभ नहीं मिला। यह सच है कि केंद्र सरकार ने नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के बीच नौ बार में पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 11.77 रुपये तथा डीजल पर 13.47 रुपये प्रति लीटर बढ़ाया। यह तेल के अंतरराष्ट्रीय मूल्यों में गिरावट का दौर था। केन्द्र का तर्क है कि पूर्व सरकार ने इतना ज्यादा बॉण्ड जारी कर दिया था कि उसकी भरपाई करनी आवश्यक थी। यह सच है कि 1 लाख 48 हजार के करीब तेल बांड की भरपाई केन्द्र को करनी पड़ी। जब मूल्य बढ़ने लगे तो सिर्फ एक बार अक्टूबर 2017 में उत्पाद शुल्क 2 रुपये प्रति लीटर की दर से घटाई थी। अब सरकार पर दबाव है और हो सकता है वो कुछ घटाएं लेकिन उससे बहुत ज्यादा अंतर नहीं आ सकता।

यह तथ्य भी लोगों को जानना जरूरी है कि तेल के अंतर्राष्टÑीय मूल्य जितना बढ़ रहा है राज्य उसके अनुसार ज्यादा कमा रहे हैैं। क्योंकि प्रतिशत के हिसाब से वैट और पर्यावरण अधिभार बढ़ता है। यह ध्यान रखिए कि वो अपना कर तो वसूलते ही हैं केन्द्रीय कर से भी उनको 42 प्रतिशत हिस्सेदारी मिलती है। यानी केन्द्र के पास अपने कर का 58 प्रतिशत हिस्सा ही रहता है। वर्ष 2014-15 से वर्ष 2017-18 तक वैट, पर्यावरण अधिभार एवं केंद्रीय कर के हिस्से से राज्यों ने 9 लाख 45 हजार 258 करोड़ रुपये कमाए हैं। इसके अनुपात में केंद्र की आय 7 लाख 49 हजार 485 करोड़ रुपये हुई जिसमें से 42 प्रतिशत यानी 3 लाख 14 हजार 784 करोड़ रुपये राज्यों को मिले। यहां दिल्ली का उदाहरण दिया जा सकता है। इससे स्थिति ज्यादा स्पष्ट हो जाएगी। दिल्ली में इस समय पेट्रोल की कीमत 80 रुपए के आसापास है। दिल्ली को 40.45 रुपये प्रति लीटर की दर से पेट्रोल दिया गया है। इस पर केन्द्र का उत्पाद कर करीब 19.48 रुपया लगा जिसमें से 42 प्रतिशत यानी 8.18 रुपया केंद्र से दिल्ली को मिला। दिल्ली सरकार प्रति लीटर करीब 17.20 रुपये वैट ले रही है। अगर इनको मिला दें तो कर के रूप में प्राप्त 36.64 रुपये में 25.40 रुपये दिल्ली को मिलता है जबकि केन्द्र के हिस्से केवल 11.24 रुपया आ रहा। दिल्ली सरकार पेट्रोल पर 27 प्रतिशत तथा डीजल पर 17.24 प्रतिशत वैट वसूलती है। यह केन्द्र के उत्पाद शुल्क से ज्यादा है। इसमें यदि दिल्ली सरकार केन्द्र सरकार की आलोचना कर रही है तो इसे आप क्या कहेंंगे?

तो यह है पूरी तस्वीर है। जनता के समक्ष इन बातों को रखा जाए तो वे समझ जाएंगे कि राजनीतिक दलों का विरोध केवल पाखंड है। ये गंदा खेल खेल रहे हैं। इसके बाद आसानी से समझा जा सकता है कि देश में तेल मूल्यों पर जो हंगामा मचा है उसमें कितना झूठ है। किस तरह विरोधी दल अपना पल्ला झाड़ रहे हैं। अगर मूल्य घटाने के लिए कर कम करना है तो राज्यों की भूमिका ज्यादा होनी चाहिए। अभी राजस्थान एवं आंध्र प्रदेश ने थोड़ी कमी की है लेकिन अन्य राज्य इसके लिए तैयार नहीं हैं। वे केवल केन्द्र को दोषी ठहराने में लगे हैं। ज्यादातर आम लोगों को तेल के इस वित्त शास्त्र की जानकारी नहीं होती, इसलिए वे भी केन्द्र को ही दोषी मान रहे हैं। हालांकि जैसा हमने देखा पिछले समय में केन्द्र ने भी कमाई की है, लेकिन राज्यों ने उससे ज्यादा किया है। उदाहरण के लिए वर्ष 2015-16 में अंतरराष्ट्रीय बाजार से भारत ने औसतन 46 डॉलर प्रति बैरल की दर से कच्चा तेल खरीदा था। राज्यों ने वैट से 1 लाख 42 हजार 848 करोड़ रुपये प्राप्त किए। केंद्र को उत्पाद शुल्क मिला,1,78,591 करोड़ रुपये जिसमें से 42 प्रतिशत तो राज्यों को चला गया। इस तरह राज्यों को कुल 2,17,856 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। वर्ष 2017-18 में अंतरराष्ट्रीय बाजार से कच्चा तेल औसतन 56 डॉलर प्रति बैरल की दर से खरीदा गया। राज्यों की राशि बढ़ कर 2 लाख 80 हजार 278 करोड़ रुपये हो गई। पता नहीं सरकार एवं भाजपा के नेता इन तथ्यों को लोगों के सामने रखते क्यों नहीं? मीडिया इस तरह इसे क्यों सामने नहीं लाता?

इन सबके बाद यह प्रश्न किया जाए कि क्या तेल की कीमत कम करने का कोई उपाय हो सकता है तो उसका उत्तर देना आसान नहीं है। हम अपनी आवश्यकता का 80 प्रतिशत आयात करते हैं। रुपये में गिरावट का भी असर है। 2017-18 में 22.043 करोड़ टन कच्चे तेल के आयात पर करीब 87.7 अरब डॉलर (5.65 लाख करोड़ रुपये) खर्च हुआ था। वित्त वर्ष 2018-19 में लगभग 22.7 करोड़ टन कच्चे तेल के आयात का अनुमान है। वित्त वर्ष के आरंभ में 108 अरब डॉलर (7.02 लाख करोड़ रुपये) का कच्चा तेल आयात किए जाने का अनुमान था। तब कच्चे तेल की औसत कीमत 65 डॉलर प्रति बैरल मानी गई थी। तथा एक डॉलर की 65 रुपये कीमत आंकी गई थी। आज कच्चे तेल के दाम बढ़ गए तथा रुपया और नीचे आ गया। तो फिर रास्ता क्या है? केन्द्र एवं राज्य करों में कमी करें। करें तो कितना करें? न्याय की बात तो यही है कि केन्द्र से ज्यादा कर राज्यों को मिलता है इसलिए वे ज्यादा घटाएं। दबाव में कर घटाया जा सकता है किंतु इसका परिणाम भयानक होगा। राज्यों के खर्च का ढांचा इस पर इतना टिक गया है कि इसे ज्यादा कम करते ही उनकी कठिनाइयां बढ़ जाएंगी। केन्द्र का राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा। जिन कल्याण कार्यक्रमों पर राशि खर्च होती है उनके लिए अलग से धन जुटाना होगा। यह कहा जा रहा है कि इनको जीएसटी में ले आया जाए। पहली नजर में ऐसा लगता है कि अधिकतम कर भी लगे तो 28 प्रतिशत रहेगा। या इसे 18 प्रतिशत भी लाया जा सकता है। एक तो इसके लिए फिर वित्तीय समायोजन करनी होगी। यानी जो आय इनसे हाती है उसकी भरपाई के लिए आय के दूसरे स्रोत बनाने होंगे। नहीं करेंगे तो कर्ज लेना पड़ेगा। हालांकि सच यह है कि राज्य ही इसके लिए तैयार नहीं हैं। इनमें भाजपा के राज्य भी हैं और विपक्ष के भी। पता नहीं वे आगे भी इसके लिए तैयार होंगे या नहीं। मुझे तो इसकी संभावना कम लगती है। यह है पूरी स्थिति। इसके बाद क्या होना चाहिए इस पर आप विचार करिए। मान लीजिए केन्द्र ने दो रुपये और राज्यों ने चार रुपये कम कर दिया तो पूरे मूल्य पर 6 रुपये कम हुआ। आम उपभोक्ता को इससे कितना अंतर आ जाएगा। और इसका असर हमारी अर्थव्यवस्था पर उससे कहीं ज्यादा पड़ेगा जितनी लोगोंं को राहत मिलेगी। अंतरराष्ट्रीय स्थिति को समझिए। ओपेक देशों ने जो तेल उत्पाद में 30 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती की उसे वो खत्म कर नहीं रहे हैं।

नरेन्द्र मोदी जब रुस गए थे तो उन्होंने राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन से इस पर बात की। पुतिन ने मोदी के रहते ही आपेक के प्रमुख सउदी अरब से बात की। मोदी वापस आए और सउदी अरब के विदेश मंत्री वहां पहुंचे। फिर ओपेक ने घोषणा किया कि हम 10 लाख बैरल उत्पादन बढ़ा रहे हैं। इसके बावजूद 20 लाख बैरल प्रतिदिन कम है। जब मांग ज्यादा और आपूर्ति कम रहेगी मूल्य बढ़ेगा। दूसरे ईरान पर प्रतिबंध लगा हुआ है। उसके तेल खरीदार अमेरिका के भय से कन्नी काट रहे हैं। हालांकि भारत ने यह तय किया है कि वह प्रतिबंध के बावजूद ईरान से तेल लेगा। तो देखना होगा। तीसरे, एक बड़ा तेल उत्पादक देश वेनेजुएला राजनीतिक संकट से गुजर रहा है। उसका असर भी अंतरराष्ट्रीय मूल्य पर है। इन सब कारणों के रहते अंतर्राष्टÑीय मूल्य गिरने की तत्काल संभावना कम है। देश का हित इसी में हैं कि हम राजनीतिक दलों के बहकावे में न आकर इसका सामना करें। संकट के समय ही किसी देश की पहचान होती है। आग उगलने वाले राजनीतिक दलों ने देशहित पर दलहित चढ़ा दिया है। इनसे हम विवेकसम्मत व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकते।

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