भारत को आर्थिक मोर्चे पर साल 2018 में लगातार झटकों का सामना करना पड़ा। इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था ने जहां लंबी छलांग लगायी, वहीं रुपये की गिरती कीमत और कच्चे तेल की कीमत में आयी उछाल ने देश की अर्थव्यवस्था को लगातार तनाव में बनाये रखा। आर्थिक अपराध के कुछ आरोपित देश से निकल भागने में सफल भी रहे, तो विजय माल्या जैसे विलफुल डिफॉल्टर पर शिकंजा कसने में भी भारतीय एजेंसियां काफी हद तक सफल रहीं। भारतीय रिजर्व बैंक के साथ केंद्र सरकार के तनाव की खबरें भी लगातार सुर्खियों में छायी रहीं, तो देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम, आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल तथा प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने आर्थिक सलाहकार परिषद की अंशकालिक सदस्यता से इस्तीफा देकर केंद्र सरकार को झटका देने का काम किया।

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर देश को पूरे साल झटकों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद ये अर्थव्यवस्था की मजबूती ही थी, जिसकी वजह से देश की आर्थिक स्थिति लड़खड़ाने के बाद एक बार फिर पटरी पर आ गयी है।

सबसे पहले बात भारतीय अर्थव्यवस्था के उछाल की। भारतीय अर्थव्यवस्था इस साल फ्रांस को पीछे छोड़ते हुए दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने में कामयाब हुई। फ्रांस की अर्थव्यवस्था का आकार 2.582 लाख करोड़ डॉलर है, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़कर 2.597 लाख करोड़ डॉलर हो गया है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत का दबाव नहीं होता तो भारतीय अर्थव्यवस्था ब्रिटेन को भी पछाड़ कर पांचवें स्थान पर पहुंच सकती थी। अर्थव्यवस्था के सूचकों में से एक भारतीय शेयर बाजार ने भी 2018 में ऊंची छलांग लगाई और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक सेंसेक्स 38,000 के रिकॉर्ड स्तर को भी पार कर गया। हालांकि बाद में रुपये की गिरती कीमत और कच्चे तेल के दबाव का असर इस पर भी पड़ा और ये अपने उच्चतम स्तर से लगभग तीन हजार अंक नीचे लुढ़क गया। फिलहाल ये 35,000 अंक से ऊपर कारोबार कर रहा है। अब बात भारतीय रिजर्व बैंक और सरकार के बीच रस्साकशी की। भारत सरकार और रिजर्व बैंक के बीच तनाव की स्थिति तब बढ़ी, जब सरकार ने केंद्रीय बैंक से प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) के दायरे में आए 11 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को थोड़ी ढील देने और आरबीआई के सुरक्षित कोष में सरकार की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए कहा। सरकार का इरादा पीसीए के दायरे में आए बैंकों को ढील के जरिये छोटे और मंझोले उद्योगों को कर्ज देने का था, ताकि इनके सामने बना पूंजी का संकट खत्म हो जाए। सार्वजनिक क्षेत्र के इन बैंकों को पीसीए के दायरे में इसलिए लाया गया है, ताकि कर्जों के उठान पर अंकुश लगाकर एनपीए के बोझ को नियंत्रित करने की कोशिश की जा सके। सरकार का यह भी मानना था कि अगर सूक्ष्म, छोटे और मंझोले उद्योगों को कर्ज नहीं मिला तो उनके सामने तालाबंदी और छंटनी की मजबूरी बन जाएगी। सरकार का इरादा ये भी था कि आरबीआई के पास पड़े सुरक्षित कोष की अधिक हिस्सेदारी मिलने से सरकार उसका उपयोग छोटे उद्योगों को कर्ज देने और विकास कार्यों में कर सकती है। लेकिन केंद्रीय बैंक को ये बात मंजूर नहीं थी। इसी कारण दोनों के बीच तनाव की स्थिति भी बनी। इसी बीच ये खबर भी आयी की भारत सरकार रिजर्व बैंक एक्ट की धारा 7 के तहत आरबीआई को अपनी बात मानने के लिए बाध्य कर सकती है। इस अफवाह के कारण भी तनाव और बढ़ा। हालांकि आरबीआई के पूर्ण बोर्ड की बैठक में इन बातों को सुलझाने की कोशिश भी की गयी, लेकिन बैठक के कुछ दिनों बाद ही आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने अपना इस्तीफा दे दिया। उर्जित पटेल के बाद पूर्व नौकरशाह शक्तिकांत दास आरबीआई गवर्नर बनाये गये हैं।

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर देश को पूरे साल झटकों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद ये अर्थव्यवस्था की मजबूती ही थी, जिसकी वजह से देश की आर्थिक स्थिति लड़खड़ाने के बाद एक बार फिर पटरी पर आ गयी है।साल 2018 में संशोधित दिवालिया कानून का असर भी स्पष्ट रूप से नजर आया। इसके प्रावधानों के तहत सरकार को 13 बड़े लोन डिफॉल्टर्स पर शिकंजा कसने में मदद मिली। इन डिफॉल्टर कंपनियों की नीलामी से सरकार को बैंकों के खाते में एनपीए के रूप में तब्दील हो चुके लगभग 84,000 हजार करोड़ रुपये वापस लाने में सफलता मिली।

उर्जित पटेल के इस्तीफे के अलावा सरकार को मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम के इस्तीफे से भी झटका लगा। उनको अक्टूबर 2014 में तीन साल के लिए देश का मुख्य आर्थिक सलाहकार नियुक्त किया गया था। कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्हें सरकार ने एक और कार्यकाल देने की पेशकश की थी, लेकिन सुब्रमण्यम इसके लिए तैयार नहीं हुए और अंतत: 2018 में वे अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो गये। इसी तरह प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अंशकालिक सदस्य सुरजीत भल्ला ने भी उर्जित पटेल के इस्तीफे के कुछ दिन बाद ही एक दिसंबर को अपना पद त्याग दिया। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए झटके की एक बड़ी बात अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में इजाफा होना भी रहा। अक्टूबर तक कच्चे तेल की कीमत 86 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गयी थी, जिसकी वजह से देश के आयात बिल में लगभग 82 फीसदी का इजाफा हो गया था। आयात बिल बढ़ने का एक असर डॉलर की मांग बढ़ने के रूप में भी नजर आया। लगभग इसी समय अमेरिका में ब्याज दर बढ़ाये जाने की खबर की वजह से डॉलर में भी मजबूती आयी और उसका प्रत्यक्ष असर रुपये की कीमत में गिरावट के रूप में नजर आया। रुपया लुढ़ककर 74 के आॅल टाइम लो तक गिर गया। हालांकि बाद के दिनों में कच्चे तेल की कीमत में गिरावट आनी शुरू हुई, जिसकी वजह से डॉलर की मांग भी घटी और रुपये पर पड़ने वाला दबाव भी कम हुआ। जिसके परिणामस्वरूप रुपये की कीमत में सुधार आना शुरू हुआ और यह फिलहाल अभी 70 रुपये के स्तर पर बना हुआ है। साल 2018 में संशोधित दिवालिया कानून का असर भी स्पष्ट रूप से नजर आया। इसके प्रावधानों के तहत सरकार को 13 बड़े लोन डिफॉल्टर्स पर शिकंजा कसने में मदद मिली। इन डिफॉल्टर कंपनियों की नीलामी से सरकार को बैंकों के खाते में एनपीए के रूप में तब्दील हो चुके लगभग 84,000 हजार करोड़ रुपये वापस लाने में सफलता मिली। अभी भी इस संशोधित कानून के प्रावधानों के तहत देश के 223 बड़े बैंक डिफॉल्टर्स के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। इसके जरिये करीब 3.54 लाख करोड़ रुपये की वसूली होने का अनुमान है। साल 2018 में ही देश के सबसे बड़े कर सुधार जीएसटी ने जुलाई में अपना पहला साल पूरा किया। इस दौरान कारोबारियों की नाराजगी पर भी सरकार काफी हद तक काबू पाने में सफल रही, वहीं जीएसटी कलेक्शन भी प्रतिमाह एक लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया। जीएसटी रिटर्न फाइलिंग में लगाये गये क्लॉज की वजह से आयकर संग्रह पर भी सकारात्मक असर पड़ा। 2017-18 में आयकर से 10.02 लाख करोड़ रुपये प्राप्त हुए, जो इसके पूर्ववर्ती साल 2016-17 की तुलना में 18 फीसदी अधिक है। अगर कर वसूली की यही रतार बनी रही, तो अनुमान लगाया जा रहा है कि 2018-19 में इस मद में 20 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। जीएसटी की अच्छी बातों में टैक्स कलेक्शन में बढ़ोतरी होने के साथ की टैक्स पेयर्स की संख्या में बढ़ोतरी होना भी है। 2016- 17 में कर देने वाले कारोबारियों की कुल संख्या 64 लाख थी, जो 2018 में बढ़कर 70 लाख हो गयी। इसी तरह प्रति व्यापारी हर महीने का औसत कर भुगतान भी 1,12,370 रुपये से बढ़कर 1,17,143 रुपये हो गया। सबसे अहम बात तो यह रही कि देश में बुनियादी स्तर पर किये गये कामों की वजह से अत्यंत गरीब लोगों की संख्या में काफी तेजी से कमी आयी। 2016 में देश में अत्यंत गरीब लोगों की संख्या 12.5 करोड़ आंकी गयी थी, जो 2018 में घटकर 7.3 करोड़ रह गयी। इसी तरह 39 फीसदी गरीब जनसंख्या वाले देश भारत में गरीबों की संख्या घटकर 21 फीसदी रह गयी। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में एक अहम बात ये भी रही कि 2018 में विश्व बैंक ने भारत को सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था करार दिया। विश्व बैंक का अनुमान था कि मौजूदा वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था का विकास 7.3 फीसदी की दर से होगा, जबकि आने वाले दो सालों में विकास दर बढ़कर 7.5 फीसदी या इससे भी अधिक हो जाएगी। सच्चाई तो यह है कि तमाम झटकों के बावजूद भारत अपनी आर्थिक जटिलताओं से काफी हद तक उबर चुका है। देश के मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट और इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में लगातार इजाफा हो रहा है। इसके साथ ही देश में प्रति व्यक्ति आय में भी इजाफा हुआ है, जिससे भारत में गरीबी को कम करने में मदद मिल रही है। 

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रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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