गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स काउंसिल की 28वीं बैठक में उपभोक्ताओं और कारोबारियों के लिए जिस तरह से राहत का ऐलान किया गया है, उससे यही लगता है कि सरकार पूरी तरह से जीएसटी के सहारे देश की जनता को साधने की जुगत में लगी है। जुलाई 2017 में जब जीएसटी को लागू किया गया था, तब से अभी तक में इसके टैक्स ढांचे में काफी परिवर्तन आ चुका है। लगभग दो सौ उत्पादों को सर्वोच्च टैक्स स्लैब से नीचे ले आया गया है और अब सरकार इस जुगत में है कि अगले आम चुनाव के पहले काउंसिल में आम सहमति की स्थिति बनाकर जीएसटी के तमाम टैक्स स्लैब को तीन टैक्स स्लैब में सीमित कर दिया जाये। अगर सरकार ऐसा करने में सफल होती है, तो निश्चित रूप से इस मोर्चे पर उसकी बड़ी सफलता होगी।

जीएसटी काउंसिल की 28वीं बैठक में उपभोक्ताओं और कारोबारियों के लिए कई राहतों का ऐलान किया गया है। माना जा रहा है कि सरकार इसके जरिये चुनाव के पहले जनता को साधने की कोशिश में लगी है।

जीएसटी काउंसिल की 28वीं बैठक में उपभोक्ताओं को कई अहम चीजों में राहत देने का काम किया गया है। मार्बल स्टोन, राखी, सेनेटरी नैपकिन जैसी चीजों को टैक्स मुक्त कर दिया गया है। इसी तरह लगभग 17 चीजों को 28 फीसदी वाले स्लैब से हटाकर नीचे के टैक्स स्लैब में लाया गया है। इस सबसे ऊंचे स्लैब में अब एयर कंडीशनर, डिजिटल कैमरा, विडियो रिकॉर्डर, डिशवॉशिंग मशीन और वाहन जैसे 35 उत्पाद रह गये हैं।

एक साल में बड़ी राहत

टैक्स कंसलटेंट संतोष केसरी का कहना है कि जीएसटी काउंसिल ने पिछले एक साल के दौरान 28 फीसदी दर वाले सबसे ऊंचे टैक्स स्लैब में शामिल 191 उत्पादों से टैक्स घटाने का काम किया है। जब जीएसटी को लागू किया गया था, उस समय 226 वस्तुओं को 28 फीसदी वाले सबसे ऊंचे टैक्स स्लैब में रखा गया था। लेकिन एक साल की अवधि में ही 191 चीजें इस स्लैब से बाहर कर दी गयी हैं। अभी भी इस टैक्स स्लैब में जो 35 उत्पाद बचे हैं, उनमें ज्यादातर सामग्री ऐश्वर्य के साधन, मोटर गाड़ी और तंबाकू, सिगरेट, पान मसाला जैसे स्वास्थ्य के लिए अहितकर उत्पाद ही हैं। हालांकि इस स्लैब में सीमेंट जैसी चीज भी रखी गयी है, जिसे नीचे के स्लैब में लाने की मांग लंबे अरसे से निर्माण उद्योग कर रहा है।

जीएसटी काउंसिल के ताजा फैसले से टीवी, फ्रीज और वाशिंग मशीन जैसे कंज्यूमर ड्यूरेबल आइटम जैसे दर्जनों उत्पाद सस्ते हो जायेंगे। उपभोक्ताओं को तो इसका फायदा मिलेगा ही, व्हाइट गुड्स इंडस्ट्री इससे सबसे ज्यादा लाभान्वित होगी। लगभग तीन साल से मंदी के दौर का सामना कर रहे घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण उद्योग (व्हाइट गुड्स इंडस्ट्री) को जीएसटी काउंसिल के इस फैसले से बड़ी राहत मिली है। जिस तरह से कंज्यूमर प्रोडक्ट्स को 28 फीसदी के स्लैब से घटाकर 18 फीसदी के स्लैब में लाया गया है, उससे इस उद्योग मे छायी सुस्ती के दूर होने की उम्मीद बन गयी है।

व्हाइट गुड्स इंडस्ट्री को फायदा

माना जा रहा है कि इसके बाद इन सामानों की खुदरा कीमत में छह से आठ फीसदी तक की कमी हो सकती है। कीमत में कमी आने से स्वाभाविक रूप से इनका बाजार बढ़ेगा और इसका प्रत्यक्ष फायदा इस उद्योग को मिलेगा। व्हाइट गुड्स इंडस्ट्री की हालत फिलहाल अच्छी नहीं है और ये लंबे समय से राहत का इंतजार कर रही है। अगर आंकड़ों पर गौर करें, तो अप्रैल-मई 2018 में इन उद्योगों की समग्र तौर पर वृद्धि दर महज 0.1 फीसदी रही है। भारत में व्हाइट गुड्स इंडस्ट्री यानी टीवी, फ्रीज, वाशिंग मशीन, वाटर कूलर जैसे उत्पादों का बाजार सालाना लगभग 16 अरब डॉलर का है। इतने बड़े बाजार को जीएसटी काउंसिल के इस फैसले से तुरंत फायदा मिलेगा।

एक साल के अनुभव के आधार पर यही कहा जा सकता है कि जैसे-जैसे समय बीत रहा है, वैसे-वैसे जीएसटी काउंसिल कारोबारियों और उपभोक्ताओं को राहत देने की कोशिश करती रही है। इस दौरान निश्चित रूप से राजस्व संग्रह में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। एक साल में ही जीएसटी में 40 लाख अतिरिक्त करदाता शामिल हुए हैं और औसत मासिक टैक्स कलेक्शन लगभग 90 हजार करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। इससे उत्साहित होकर ही काउंसिल ने रिटर्न प्रक्रिया को भी और आसान बनाने की कोशिश की है, ताकि कारोबारियों को और राहत मिल सके।

कारोबारियों को भी राहत

चार्टर्ड अकाउंटेंट लक्ष्मी रमण गोस्वामी जीएसटी काउंसिल के फैसले को कारोबारियों के हित के लिहाज से भी अहम मानते हैं। उनका कहना है कि ताजा फैसले में पांच करोड़ रुपए से कम टर्नओवर वाले व्यापारियों को अब तीन महीने में एक बार रिटर्न भरने की सुविधा देने का फैसला किया गया है। इसके पहले उन्हें हर महीने रिटर्न भरना पड़ता था, जो उनके लिए एक बड़ी परेशानी की वजह होता था। इस फैसले से जीएसटी के लिए पंजीकृत कुल कारोबारियों में से लगभग 93 फीसदी कारोबारियों को मासिक रिटर्न भरने के झंझट से राहत मिलेगी। हालांकि इन कारोबारियों को जीएसटी तो पहले की तरह ही हर महीने जमा कराना होगा। उन्हें इस मामले में कोई छूट न तो दी गयी है और न ही मौजूदा प्रावधानों में ऐसा कर पाना संभव है।

कारोबारियों के लिए राहत देने के लिए जीएसटी काउंसिल ने रिवर्स चार्ज मैकेनिज्म के प्रावधानों का क्रियान्वयन भी सितंबर 2019 तक के लिए टाल दिया है। इसके अलावा जीएसटी काउंसिल ने कंपोजीशन स्कीम की सीमा को भी सालाना टर्नओवर एक करोड़ रुपये से बढ़ाकर डेढ़ करोड़ रुपये कर कर दिया है। इसके साथ ही कंपोजीशन स्कीम के डीलरों को उनके टर्नओवर का दस फीसदी या अधिकतम पांच लाख रुपये तक सेवाओं की आपूर्ति में भी छूट देने का भी निर्णय लिया गया है।

मिलेगा राजनीतिक लाभ

कहने को तो जीएसटी काउंसिल ने ये सारे निर्णय सभी राज्यों के प्रतिनिधियों की सहमति से लिये हैं, लेकिन इनमें केंद्र सरकार अपना राजनीतिक लाभ भी देख रही है। आर्थिक विश्लेषक वीरेंद्र प्रभाकर का मानना है कि उपभोक्ताओं और कारोबारियों को मिली इस राहत का फायदा निश्चित रूप से सरकार आने वाले चुनावों में उठा सकती है। आने वाले आठ-नौ महीनों में देश में अगले लोकसभा चुनाव हो सकते हैं। तय है कि मौजूदा एनडीए सरकार अब पूर्ण बजट नहीं ला सकेगी। ऐसे में जीएसटी काउंसिल का ताजा निर्णय राजनीतिक तौर पर भी सरकार के लिए काफी फायदेमंद हो सकता है।

वीरेंद्र प्रभाकर का मानना है कि इस फैसले से सरकार विपक्ष के आरोपों को कुंद भी करने की कोशिश कर सकती है। सरकार की विरोधी पार्टियां जीएसटी को अपना चुनावी हथियार बनाती रही हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने तो गुजरात चुनाव के दौरान इसे गब्बर सिंह टैक्स की संज्ञा देकर इसकी आलोचना की थी। लेकिन टैक्स दरों में कमी और कारोबारियों की दी गयी राहत के जरिये अब सरकार जीएसटी की आलोचना के स्वर को दबाने में सफल हो सकती है।

राजस्व संग्रह पर टिकी नजर

हालांकि माना जा रहा है कि जीएसटी दरों में हुई इस कटौती से सरकार को शुरुआती दौर में सालाना दस हजार करोड़ रुपये तक का नुकसान भी हो सकता है। लेकिन इसके साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि अगर टैक्स की दर में कमी आने की वजह से कारोबार की वृद्धि दर बढ़ती है, तो निश्चित रुप से उपभोक्ता उत्पादों की बिक्री भी बढ़ेगी। और जब बिक्री बढ़ेगी तो कम दर होने के बावजूद टैक्स के कलेक्शन में भी बढ़ोतरी होगी। जीएसटी काउंसिल के इन फैसलों से उपभोक्ताओं और कारोबारियों को निश्चित रूप से राहत मिलेगी, लेकिन अभी भी इस दिशा में काफी कुछ किया जाना बाकी है। अभी भी अपने देश में जीएसटी में छह स्लैब बने हुए हैं, जबकि मांग सिर्फ एक ही टैक्स स्लैब बनाने की है। इसके साथ ही जीएसटी को तभी सफल माना जा सकता है, जब व्यापारियों की आमदनी का सही आंकड़ा पता लग सके और उसके हिसाब से ही जीएसटी की वसूली हो सके। जीएसटी काउंसिल ने खुद भी इस बात को स्वीकार किया है कि जीएसटी के प्रावधान में सालाना बीस लाख से कम टर्नओवर वाले व्यापारियों के लिए जीएसटी पंजीकरण कराना अनिवार्य नहीं होने वाले प्रावधान का कुछ व्यापारी गलत तरीके से फायदा उठा रहे हैं।

ऐसे व्यापारी कोई न कोई रास्ता तलाश कर न केवल अपना टर्नओवर कम दिखा रहे हैं, बल्कि जीएसटी बचाकर राजस्व का नुकसान भी कर रहे हैं। ऐसे में परंपरागत रूप से टर्नओवर का आकलन करने की जगह कोई ऐसी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए, जिससे कि किसी वस्तु या सेवा का आदान-प्रदान अनअकाउंटेड तरीके से न हो सके। इसके लिए भी सभी राज्य सरकारों के वाणिज्य विभाग को दुरुस्त करने की जरूरत है। ऐसा होने पर ही जीएसटी का सही अर्थों में फायदा मिल सकेगा।

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