कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान जीडीपी के संशोधित आंकड़े जारी होने के बाद से ही विवाद की स्थिति बनी हुई है। विवाद की चपेट में केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) और नीति आयोग भी आ गये हैं। जीडीपी की बैक सीरीज के जो आंकड़े जारी किये गये, उनमें यूपीए शासनकाल के दौरान हुई विकास दर को कम करके दर्शाया गया है। जबकि इसी साल अगस्त में सुदीप्तो मंडल कमेटी की ओर से जारी हुई पहली बैक सीरीज के आंकड़े इसके विपरीत ग्रोथ रेट को तेज हुआ दर्शा रहे थे।

जीडीपी बैक सीरीज के संशोधित आंकड़ों में यूपीए सरकार के कार्यकाल की विकास दर घट गयी है। नये फॉर्मूले से हुई गणना से कांग्रेस परेशान है। तथ्य ये है कि इसी फॉर्मूले से एनडीए के कार्यकाल के विकास दर की भी गणना की जा रही है। ऐसे में कांग्रेस के विरोध को बेमानी ही माना जाना चाहिए।

विवाद का विषय सिर्फ ग्रोथ रेट पर कैंची चलाना ही नहीं है, बल्कि इसको जारी करने के समय का भी है। आम चुनाव से कुछ महीने पहले उठाये गये इस कदम को लेकर राजनीतिक लाभ लेने की भी बात कही जा रही है। विपक्ष का आरोप है कि बैक सीरीज के आंकड़ों को मोदी सरकार अपना चुनावी हथियार भी बना सकती है। दरअसल, इस बैक सीरीज आंकड़ों में मोदी सरकार के चार वर्षों के दौरान जीडीपी की औसत विकास दर मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल की औसत विकास से ज्यादा दिखायी गयी है। बैक सीरीज के तहत यूपीए-1 और यूपीए- 2 के कार्यकाल की ग्रोथ कम दिखाई दे रही है। कांग्रेस का दावा है कि 2011 के वित्त वर्ष में उसने सर्वाधिक 10.3 फीसदी की विकास दर हासिल की थी, जिसे संशोधित कर 8.5 फीसदी कर दिया गया है। इन आंकड़ों में बदलाव वाली अवधि के चार सालों के दौरान नौ फीसदी से ज्यादा विकास दर दिखाई गयी थी, लेकिन नयी सीरीज में इतनी विकास दर वाला कोई भी साल नहीं नजर आ रहा है।

नीति आयोग का कदम कुल्हाड़ी मारने वाला है। अब इस संस्थान को बंद करने का समय आ गया है। पुराने आंकड़े राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग ने जुटाए थे। ये आंकड़े भद्दे मजाक की तरह हैं।

– पी. चिदंबरम, पूर्व वित्त मंत्री

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक बैक सीरीज में वित्त वर्ष 2005 से 2012 तक के लिए जीडीपी के आंकड़ों को नए तरीके से एडजस्ट किया गया है। इसमें 2012 को आधार वर्ष बनाया गया है। उनके मुताबिक यूपीए शासन वाले वर्षों में औसत विकास दर जो पहले 7.75 फीसदी दर्शायी गयी थी, उसे अब संशोधित करके 6.82 फीसदी कर दिया गया है। यह विकास दर मौजूदा सरकार के चार वर्षों के औसत विकास दर 7.35 फीसदी से कम है। इसी बात को लेकर कांग्रेस परेशान है, क्योंकि इसके पहले सुदीप्तो मंडल कमेटी ने बैक सीरीज में प्रोडक्शन शिट मेथड के आधार पर जो ग्रोथ दिखाया था, उसके मुताबिक 2003-04 से 2011-12 के दौरान विकास दर अपेक्षाकृत अधिक थी, जबकि 1994- 95 से 2002-03 तक विकास दर कम थी। इन आंकड़ों को लेकर सत्तारूढ़ बीजेपी और कांग्रेस के बीच तीखी बहस भी हुई थी। कांग्रेस का दावा था कि यूपीए शासनकाल में देश का हाल बेहतर था और उसके एक दशक के कार्यकाल में देश ने सबसे अच्छी विकास दर हासिल की। हालांकि सरकार ने सुदीप्तो मंडल कमेटी की रिपोर्ट को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि इस कमेटी ने जीडीपी के बैक सीरीज के जो आंकड़े जारी किये, वह एक प्रयोग का नतीजा था और वह प्रयोग विकास दर की गणना के लिए अपनाये जाने वाले तरीकों पर निर्णय करने के लिए किया गया था। इसलिए इन आंकड़ों को आधिकारिक नहीं कहा जाना चाहिए।

जीडीपी आकलन का नया फॉर्मूला अधिक वैज्ञानिक है। यूपीए सरकार के समय जीडीपी के आकलन की पद्धति में कई सेक्टरों के जीडीपी का आकलन बढ़ा-चढ़ाकर किया गया था। इसके अलावा आधार वर्ष तब्दील करना भी जरूरी था। नया फॉर्मूला दुनिया भर में इस्तेमाल किया जाता है। -राजीव कुमार, उपाध्यक्ष, नीति आयोग

कांग्रेस ने लिया था श्रेय यही बात एक बार फिर भारत सरकार कह रही है की नये आंकड़ों को आधिकारिक माना जाना चाहिए, क्योंकि ये केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय और नीति आयोग की सहभागिता से तैयार किये गये हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि नए मापदंडों पर जीडीपी के आंकड़े की नयी सीरीज की शुरुआत हुई है और इसमें यूपीए सरकार के आखिरी दो वर्षों को भी शामिल किया गया है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने फरवरी 2015 में अपना नया फॉर्मूलेशन किया था और इसी आधार पर नयी जीडीपी सीरीज बनाई गयी थी। इस नयी सीरीज में जो चीजें शामिल की गयी, उसका विस्तार किया गया और विश्व में जो सबसे अच्छे मापदंड हैं, उसके मुताबिक इसकी गणना की गयी। वित्त मंत्री के मुताबिक जब नया जीडीपी लागू किया गया था, तो यूपीए के आखिरी दो वर्ष को भी इसमें शामिल किया गया था और उसके विकास दर को बढ़ाया गया था। तब खुद कांग्रेस ने भी नयी सीरीज का स्वागत किया था और कहा था कि नयी सीरीज से स्थापित हो गया है कि हमने एक अर्थव्यवस्था को सही तरीके से चलाया था। लेकिन अब इसी पद्धति के मुताबिक जब बैक सीरीज जारी की गयी है, तो कांग्रेस इसका विरोध कर रही है। वित्त मंत्री के मुताबिक आंकड़ों को मापने के दो मापदंड नहीं हो सकते। अगर दो साल के आंकड़े के लिए कांग्रेस एक मापदंड पर चाहती है तो उसे अपने पूरे कार्यकाल के आंकड़ों को भी उन्हीं मापदंडों के आधार पर स्वीकार करना चाहिए। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय पर उठाए सवाल को लेकर भी उन्होंने कहा कि सीएसओ एक भरोसेमंद संस्थान है। इसके आंकड़ों पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए।

सीएसओ एक भरोसेमंद संस्थान है। इसके आंकड़ों पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए। इसमें वित्त मंत्रालय की दखल नहीं है। संशोधित आंकड़े तथ्यों और फॉर्मूले पर आधारित हैं और वे अर्थव्यवस्था के ज्यादा बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। – अरुण जेटली, वित्त मंत्री

इसमें वित्त मंत्रालय की दखल नहीं है। संशोधित आंकड़े तथ्यों और फॉर्मूले पर आधारित हैं और वे अर्थव्यवस्था के ज्यादा बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। वही पूर्व वित्त मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी चिदंबरम नीति आयोग की सहभागिता को लेकर काफी नाराज नजर आते हैं। उनका कहना है कि नीति आयोग का कदम कुल्हाड़ी मारने वाला है। अब इस संस्थान को बंद कांग्रेस ने लिया था श्रेय यही बात एक बार फिर भारत सरकार कह रही है की नये आंकड़ों को आधिकारिक माना जाना चाहिए, क्योंकि ये केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय और नीति आयोग की सहभागिता से तैयार किये गये हैं। वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि नए मापदंडों पर जीडीपी के आंकड़े की नयी सीरीज की शुरुआत हुई है और इसमें यूपीए सरकार के आखिरी दो वर्षों को भी शामिल किया गया है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने फरवरी 2015 में अपना नया फॉर्मूलेशन किया था और इसी आधार पर नयी जीडीपी सीरीज बनाई गयी थी। इस नयी सीरीज में जो चीजें शामिल की गयी, उसका विस्तार किया गया और विश्व में जो सबसे अच्छे मापदंड हैं, उसके मुताबिक इसकी गणना की गयी। वित्त मंत्री के मुताबिक जब नया जीडीपी लागू किया गया था, तो यूपीए के आखिरी दो वर्ष को भी इसमें शामिल किया गया था और उसके विकास दर को बढ़ाया गया था। तब खुद कांग्रेस ने भी नयी सीरीज का स्वागत किया था और कहा था कि नयी सीरीज से स्थापित हो गया है कि हमने एक अर्थव्यवस्था को सही तरीके से चलाया था। लेकिन अब इसी पद्धति के मुताबिक जब बैक सीरीज जारी की गयी है, तो कांग्रेस इसका विरोध कर रही है। वित्त मंत्री के मुताबिक आंकड़ों को मापने के दो मापदंड नहीं हो सकते। अगर दो साल के आंकड़े के लिए कांग्रेस एक मापदंड पर चाहती है तो उसे अपने पूरे कार्यकाल के आंकड़ों को भी उन्हीं मापदंडों के आधार पर स्वीकार करना चाहिए। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय पर उठाए सवाल को लेकर भी उन्होंने कहा कि सीएसओ एक भरोसेमंद संस्थान है। इसके आंकड़ों पर संदेह नहीं किया जाना चाहिए। इसमें वित्त मंत्रालय की दखल नहीं है। संशोधित आंकड़े तथ्यों और फॉर्मूले पर आधारित हैं और वे अर्थव्यवस्था के ज्यादा बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। वही पूर्व वित्त मंत्रीपी शिवशंकर मूर्ति का कहना है कि सांख्यिकी आयोग की सिफारिश पर जनवरी 2015 में आधार वर्ष 2004-05 से बदलकर 2011- 12 हुआ। इससे पहले इसे जनवरी 2010 में भी बदला गया था। इसमें आंकड़ों के स्रोत भी बदले गये। पहले कंपनियों की स्थिति पर रिजर्व बैंक की स्टडी देखी जाती थी, लेकिन नयी पद्धति में कॉरपोरेट मंत्रालय से आंकड़े लिए गए। उनके मुताबिक आधार वर्ष से अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़ों की वास्तविक स्थिति का पता चलता है। इसलिए आधार वर्ष अगर बहुत पुराना हुआ, तो मौजूदा आंकड़े वास्तविक नहीं लगेंगे। इसीलिए आम तौर पर हर पांच वर्ष बाद आधार वर्ष में बदलाव किया जाता है। शिवशंकर मूर्ति के मुताबिक नयी सीरीज संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुरूप है और इसमें कॉरपोरेट सेक्टर के आंकड़ों की हिस्सेदारी बढ़ी है। साथ ही असंगठित क्षेत्र के आंकड़े भी तुलनात्मक तौर पर बेहतर हुए हैं। परेशानी ये है कि इसके पहले जब सुदीप्तो मंडल कमेटी ने प्रायोगिक बैक सीरीज डेटा जारी किया था, तो उसमें यूपीए के कार्यकाल की औसत विकास दर एनडीए के कार्यकाल के औसत विकास दर से ज्यादा दिख रही थी तब कांग्रेस ने इसका श्रेय लिया था, लेकिन आधिकारिक आंकड़ों में यह पता चलता है कि एनडीए के समय की विकास दर अधिक है। यही वजह है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल ने आंकड़ों का विरोध कर रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि उसके विकास दर को कम करके दिखाने की कोशिश की जा रही है। कांग्रेस के आरोपों पर विचार करते वक्त इस बात को भी समझ लिया जाना चाहिए कि जिस फॉर्मूले के तहत कांग्रेस के कार्यकाल के विकास दर की गणना की जा रही है, उसी फॉर्मूले के तहत एनडीए के कार्यकाल के विकास दर की भी गणना की जा रही है। अगर फॉर्मूले में बदलाव होता है, तो उसे भूत, भविष्य और वर्तमान हर तरह के आंकड़ों की गणना में उपयोग किया जाता है। नयी पद्धति में विश्व में स्थापित मानदंडों को शामिल किया गया है। इसलिए इसे किसी भी हालत में गलत नहीं कहा जा सकता है। हां, यह जरूर है कि विकास दर के आंकड़ों को राजनीतिक हथियार अवश्य बनाया जा सकता है। इसके आधार पर मोदी सरकार अपने कार्यकाल को अधिक सफल जरूर बता सकती है। जहां तक आंकड़ों की बात है, तो आंकड़े अर्थव्यवस्था की वास्तविकता को दर्शाते हैं। इसी फॉर्मूले पर चलकर विश्व के अन्य देशों के भी विकास दर का पैमाना तय किया जाता है। इसलिए इसे लेकर हो रही आलोचना को सही नहीं कहा जा सकता है। और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी चिदंबरम नीति आयोग की सहभागिता को लेकर काफी नाराज नजर आते हैं। उनका कहना है कि नीति आयोग का कदम कुल्हाड़ी मारने वाला है। अब इस संस्थान को बंद

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रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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