देश के सामने आर्थिक चुनौतियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। एक ओर रुपये में लगातार गिरावट का रुख बना हुआ है, दूसरी ओर पेट्रोलियम उत्पादों के दाम दिन ब दिन चढ़ते जा रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले केंद्र सरकार के सामने आर्थिक चुनौतियां विकराल होती जा रही हैं। रुपये की तेज गिरावट और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में लगातार तेजी ने आर्थिक चिंतकों को भी सोचने के लिए विवश कर दिया है।

रुपया लगातार गोते लगा रहा है और डीजल-पेट्रोल की कीमत लगातार छलांग लगा रही है। वैश्विक उथलपुथल की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था दबाव में है। सबको हालात में सुधार होने का इंतजार है। सवाल है कि ऐसा होगा कब?

इस साल रुपये की कीमत में लगभग 10 फीसदी गिरावट आ चुकी है। शुक्रवार को ही डॉलर की बढ़ती मांग की वजह से रुपया गिरकर 71 के आॅल टाइम लो लेवल तक पहुंच गया। गिरावट आगे भी जारी रह सकती है। आने वाले सप्ताह में रुपया 72 के स्तर को भी पार कर सकता है। पहले भारतीय नीति निर्धारकों के पास रुपये को 70 के स्तर तक आने से रोकने की चुनौती थी, लेकिन अब जबकि रुपये ने 71 के स्तर को भी छू लिया है, तो नीति-निर्धारकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसको 72 के स्तर तक पहुंचने से रोकने की होनी चाहिए। ऐसा तभी हो सकता है, जब भारतीय रिजर्व बैंक अपना विशाल विदेशी मुद्रा भंडार रुपये की कीमत को थामने के लिए खोल दे। उसके हस्तक्षेप के बिना अभी तत्काल रुपये की कीमत को थामने का कोई तरीका नजर नहीं आ रहा है।

2 महीने में 3 रु. की उछाल

ंतरराष्ट्रीय स्तर पर बने राजनीतिक तनाव की वजह से कच्चे तेल का दाम भी लगातार बढ़ता जा रहा है। भारतीय मुद्रा में गिरावट और कच्चे तेल के दाम में उछाल ने मिलकर भारत में बिकने वाले पेट्रोल और डीजल की कीमत पर सबसे अधिक असर डाला है। महज दो महीने की अवधि में ही दिल्ली में पेट्रोल की कीमत में 2.97 रुपये की बढ़ोतरी हो चुकी है, वहीं डीजल की कीमत में भी इस अवधि में 2. 83 रुपये की उछाल आ चुकी है। साफ है कि दो महीने के दौरान ही ये दोनों पेट्रोलियम उत्पाद प्रति लीटर लगभग तीन रुपये महंगे हो गये हैं।

दिल्ली में शुक्रवार को पेट्रोल की कीमत 78.52 रुपये थी, जबकि 21 अगस्त को इसकी कीमत 77.58 रुपये थी। यानी सिर्फ 10 दिन में ही दिल्ली में पेट्रोल की कीमत में 94 पैसे का इजाफा हुआ। वहीं एक जुलाई को इसकी कीमत 75.55 रुपये थी। इसी तरह डीजल की कीमत शुक्रवार को 70.21 रुपये थी, जबकि 21 अगस्त को इसकी कीमत 69.10 रुपये थी। जबकि एक 1 जुलाई को इसकी कीमत 67.38 रुपये थी। बात अगर मुंबई की करें, तो यहां शुक्रवार को 85.93 रुपये प्रति लीटर की दर से पेट्रोल मिल रहा था, जबकि डीजल की कीमत 74.54 रुपये थी।

इन आंकड़ों से साफ है कि पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत में आग लगी हुई है और यह लगातार बढ़ रही है। रुपये की कीमत में आयी गिरावट के कारण पेट्रोलियम का आयात लगातार महंगा होता जा रहा है, वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी की वजह से इसका आयात करने वाली आॅयल मार्केटिंग कंपनियों को दोहरे दबाव का सामना करना पड़ रहा है। इसका सीधा असर उपभोक्ताओं को झेलना पड़ रहा है, जिनकी जेब से अब ज्यादा पैसे निकलने लगे हैं।

नहीं बना कोई फॉर्मूला

इसमें कोई शक नहीं है कि इन चुनौतियों से पार पाने के लिए केंद्र सरकार अपनी ओर से लगातार कोशिश कर रही है, लेकिन अभी तक ऐसा कोई भी फार्मूला नहीं बनाया जा सका है, जिससे रुपये की कीमत में गिरावट और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत में उछाल को काबूकर देश की अर्थव्यवस्था, बाजार और आम उपभोक्ताओं को प्रभावित होने से बचाया जा सके। हालांकि सरकार की ओर से लगातार दावा किया जा रहा है कि हालात में शीघ्र ही सुधार होगा।

इसी बुधवार को आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने कहा कि रुपये की कीमत में आयी गिरावट तात्कालिक है और वैश्विक व्यवस्था में सुधार होते ही इसकी कीमत में भी सुधार हो जायेगा। उनका दावा था कि जल्द ही रुपये की कीमत 68 रुपये के स्तर तक पहुंच जायेगी, क्योंकि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने एक बार फिर अपना रुख भारत की ओर कर लिया है। ऐसा होने से डॉलर की आपूर्ति बढ़ेगी और इस पर बना दबाव कम होगा, जिसकी वजह से रुपये की कीमत में भी सुधार होगा।

गर्ग ने यह भी दावा किया कि वैश्विक उथल-पुथल की वजह से रुपये की कीमत में आयी गिरावट पूरी तरह से अस्थाई है। भारत के साथ ही अन्य देशों की अर्थव्यवस्था पर भी कच्चे तेल के दाम में आयी तेजी का नकारात्मक असर पड़ा है। इसलिए इस समस्या से निपटने के लिए भारत में लॉन्ग टर्म पॉलिसी बनायी जा रही है। साथ ही रुपये की स्थिति को सुधारने के लिए भी कई उपायों पर विचार किया जा रहा है। इनमें निर्यात को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन योजना लाने तथा आयात को कम करने के लिए कुछ वस्तुओं की इंपोर्ट ड्यूटी में बढ़ोतरी करना भी शामिल है। ऐसा होने से डॉलर की मांग घटेगी वहीं निर्यात पढ़ने से उसकी उपलब्धता बढ़ेगी, जिससे रुपया मजबूत होगा।

तत्काल राहत की उम्मीद नहीं

सरकार का दावा अपनी जगह पर है, लेकिन अर्थशास्त्री और बाजार विशेषज्ञ इस बात से संतुष्ट नजर नहीं नजर नहीं आते हैं। मार्केट एनालिस्ट रामप्रसाद जायसवाल का कहना है कि फिलहाल वैश्विक तेल बाजार और मुद्रा बाजार की जो स्थिति है, उसमें जल्द राहत पाना आसान नहीं है, क्योंकि इसमें तत्काल परिवर्तन होने की संभावना काफी कम है।

पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत में आयी उछाल और रुपये की गिरावट की वजह से निगेटिव चेन रिएक्शन होगा। इससे महंगाई दर में भी बढ़ोतरी हो सकती है। अगर ऐसी स्थिति बनी, तो इसको थामने के लिए आरबीआई एक बार फिर ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने का रास्ता अपना सकता है। जिससे विकास कार्यों के लिए लिये जाने वाले कर्ज के उठान में भी कमी आयेगी। साथ ही महंगाई दर में बढ़ोतरी होने से उपभोक्ता बाजार से भी लोग पीछे हटने लगेंगे, जिससे बाजार में डिमांड की कमी होगी और कंपनियों के विस्तार कार्य में भी रुकावट आयेगी। ऐसा होने का एक असर रोजगार के नये अवसरों के सृजन पर भी नकारात्मक रूप से पड़ सकता है।

फेडरेशन आॅफ इंडियन एक्सपोर्ट आॅर्गनाइजेशन (फियो) के पूर्व अध्यक्ष रामू एस देवड़ा का मानना है की पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत में उछाल और रुपये की कीमत में गिरावट से देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी। इन दो कारकों की वजह से सबसे पहले कच्चे माल की कीमत में ही इजाफा हो जायेगा, जिससे तैयार उत्पादों के कीमत भी बढ़ जायेगी। इसका दुष्प्रभाव निर्यात पर भी पड़ेगा। कीमत बढ़ने की वजह से घरेलू खरीददारी भी कम हो जायेगी, जिसके कारण कॉरपोरेट सेक्टर, कोर सेक्टर और इंडस्ट्रियल सेक्टर पर नकारात्मक असर पड़ेगा, जो अंतत: इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन ग्रोथ रेट को भी प्रभावित करेगा।

एक अच्छी खबर भी

हालांकि इस बीच एक अच्छी खबर यह भी आयी है कि भारत ने विकास दर के मामले में जबरदस्त उछाल दर्ज की है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा शुक्रवार को ही जारी आंकड़े के मुताबिक भारत ने अप्रैल से जून 2018 की तिमाही में 8.2 फीसदी की विकास दर को हासिल किया है, जो पिछले तीन सालों के दौरान अभी तक की सबसे ऊंची विकास दर है। इस उछाल को देश की अर्थव्यवस्था में आ रही मजबूती के नजरिये से भी देखा जा सकता है, क्योंकि पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि (पहली तिमाही) में भारत की विकास दर सिर्फ 5.6 फीसदी थी। ये विकास दर इस बात का संकेत है कि भारत की अर्थव्यवस्था में बुनियादी मजबूती बनी हुई है और वैश्विक दबाव तथा उथल-पुथल का दौर खत्म होते ही एक बार फिर आर्थिक मोर्चे पर बनी चुनौतियों से आसानी से निपटा जा सकेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि वैश्विक दबाव अगर जल्दी खत्म नहीं हुआ, तो अगली बार विकास दर के आंकड़ों में भी तेज गिरावट नजर आ सकती है, जो कि अंतत: देश की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह साबित होगा।

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