न दिनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रिस विट्ज की फिल्म ‘आॅपरेशन फिनाले’ की खूब चर्चा है। इस फिल्म का विषय हिटलर के शासन के एक प्रमुख अधिकारी एडॉल्फ आइकमैन के अर्जेंटीना में इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के एजेंटों द्वारा अपहरण और इजरायल लाये जाने के प्रकरण पर आधारित है। जब 1930-40 के दशक में जर्मनी में नाजीवाद का उदय हुआ, तो उसका मुख्य निशाना जर्मनी और यूरोप के यहूदी थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यूरोप के एक बड़े हिस्से पर दखल जमाये नाजी जर्मनी के सामने यह एक बड़ी समस्या थी कि लाखों यहूदियों का निपटारा कैसे हो। हिटलर ने यूरोप को यहूदी-मुक्त करने की जिम्मेदारी एडॉल्फ आइकमैन को दी। इसकी निगरानी में जर्मनी, पोलैंड, आॅस्ट्रिया और फ्रांस में लाखों यहूदियों का कत्लेआम हुआ। युद्ध में हार के बाद कई नाजी अधिकारियों ने भयावह सजा के डर से आत्महत्या की, अनेक गिरफ्तार हुए और कुछ भाग निकले। आइकमैन भागता हुआ अर्जेंटीना पहुंचा और नाम बदलकर रहने लगा। तत्कालीन अर्जेंटीना नाजियों के लिए मुफीद जगह थी, क्योंकि वहां का शासन नाजी समर्थक था। बहरहाल, किसी तरह से इसकी भनक इजरायल को लग गयी और इस देश के पहले प्रधानमंत्री डेविड बेन गुरियों ने मोसाद को उसे इजरायल लाने का आदेश दे दिया। आइकमैन को अपहरण कर इजरायल लाया गया और मौत की सजा दी गयी। ‘आॅपरेशन फिनाले’ की यही कहानी है। आइकमैन हो या दुनिया की ऐसी अन्य कहानियां हैं, जिन पर हॉलीवुड, यूरोप, लातिन अमेरिका, इजरायल और अरब में बेशुमार फिल्में बनी हैं और बन रही हैं। ‘लॉरेंस आॅफ अरेबिया’, ‘अक्टूबर’, ‘द लास्ट एम्परर’, ‘गांधी’, ‘आर्गो’, ‘म्यूनिख’ जैसी कितनी फिल्में हैं, जो क्लासिक मानी जाती हैं।

अब इस स्थिति की तुलना अपने बॉलीवुड से करें, जो दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने का रिकॉर्ड बना चुका है, जिसके पास किसी भी सिनेमा उद्योग से अधिक दर्शक हैं और जिसके पास देश के भीतर ही विभिन्न भाषाओं में लोगों तक पहुंचने का अवसर है। अंग्रेजी शासन के दौर और उस वक्त के नेताओं पर जो फिल्में बनी हैं, उनमें इतिहास और ऐतिहासिक तथ्यों को हाशिये पर डालते हुए मेलोड्रामा में रचा-बसा वीरता और राष्ट्रवाद की कथा कही गयी है। ‘मंगल पांडे’, ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’, ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’, ‘सरदार’, ‘अंबेडकर’ जैसी कई फिल्में इसी श्रेणी में हैं। ‘इंदू सरकार’ या ‘गंगाजल’ जैसी फिल्मों के साथ यही मुश्किल है। प्राचीन भारत और मध्यकालीन भारत से जुड़ी फिल्में भी बस डिजाइनर पोशाकों तक सिमट तक रह गयीं। युद्धों पर बनीं फिल्में- ‘हकीकत’, ‘बॉर्डर’ आदि-असली घटनाओं पर आधारित होते हुए भी उनके बारे में खास समझ बनाने में मदद नहीं करती हैं। यहां यह भी साफ करना जरूरी है कि इनमें से कई फिल्में अदाकारी, तकनीक और मनोरंजन के पैमाने पर जोरदार हैं, पर उन्होंने अपने विषय के साथ ईमानदारी नहीं बरती है।

आजाद हिंदुस्तान के इतिहास से किसी एक अहम घटना के बारे में संतुलित कथानक तैयार करना बहुत मुश्किल काम नहीं है। सिनेमा एक सांस्कृतिक दस्तावेज है। उसमें इतिहास की भी जगह होनी ही चाहिए।

भारत में इतिहास पर आधारित फिल्में बनाने में अनेक चुनौतियां हैं। एक तो तथ्यों और विवरण को लेकर अलग-अलग राय होने के कारण मुश्किल यह है कि किस पक्ष या आयाम को लेकर कथानक की रचना हो। दूसरी दिक्कत बजट और बाजार से जुड़ी आशंकाओं का है। तीसरी कठिनाई यह है कि फिल्म को लेकर कुछ लोग या तबके सवाल उठा सकते हैं और सरकार या फिल्म सर्टिफिकेट देनेवाला बोर्ड की ओर से रुकावट आ सकती है। लेकिन इन अवरोधों का बहाना नहीं बनाया जा सकता है। स्टारडम और ग्लैमर से ग्रस्त बॉलीवुड को कम-से-कम पैसे का रोना नहीं रोना चाहिए। दूसरी बात यह है कि हमारी फिल्म इंडस्ट्री हर सरकार के नजदीक रही है और इसका लाभ वह अपने दायरे को बढ़ाने में कर सकती है। रही बात तथ्यों और उनसे जुड़े विवादों की है, तो सात दहाइयों के आजाद हिंदुस्तान के इतिहास से किसी एक अहम घटना के बारे में संतुलित कथानक तैयार करना बहुत मुश्किल काम नहीं है। याद रहे, सिनेमा एक सांस्कृतिक दस्तावेज है और इस नाते उसमें इतिहास की भी जगह होनी ही चाहिए। बहुत जमाने से यूरोपीय टिप्पणीकार कहते रहे हैं कि भारतीयों में इतिहास-बोध की कमी प्राचीन काल से ही रही है। इस बयान पर आलोचनात्मक या निंदात्मक टीका करना आसान है, पर आज के संदर्भ में ठोस सिनेमाई पहल कर इसका जवाब देना मुश्किल है। खैर, उम्मीद पर दुनिया कायम है और बॉलीवुड ने भी अपनी सीमाओं का विस्तार किया है, इसलिए यह अपेक्षा की जा सकती है कि बहुत जल्दी ही हिंदी सिनेमा हालिया इतिहास को भी गंभीरता से खंगालना शुरू करेगा।

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