मतौर पर बॉलीवुड की फिल्में समाज और सियासत से जुड़े सवालों से सीधे टकराने की जहमत नहीं उठातीं। उन फिल्मकारों से ऐसी फिल्मों की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है, जो प्यार-मोहब्बत या एक्शन को केंद्र में रखकर फिल्में बनाते रहे हों। लेकिन ‘तुम बिन’, ‘दस’ और ‘रा.वन’ जैसी फिल्में बनाने वाले अनुभव सिन्हा ने ‘मुल्क’ के जरिये आतंकवाद और सांप्रदायिकता को विषय-वस्तु बनाकर जोरदार दखल दिया है। ऐसा नहीं है कि इन मुद्दों पर फिल्में नहीं बनी हैं, पर पूरी फिल्म में इनसे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर बेबाकी से बहस के उदाहरण न के बराबर हैं।

आतंकवाद और सांप्रदायिकता को केंद्र में रखकर बनी फिल्म ‘मुल्क’ इस समय चर्चा में है। ऐसे विषय के बावजूद मनोरंजन के सिनेमाई तत्वों का संतुलन साधते हुए फिल्म अपने संदेश को दर्शकों तक बखूबी पहुंचाती है।

गंभीर विषयों पर फिल्म बनाते समय सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वह उपदेशात्मक बोझिलता में न बदल जाये। उबाऊ फिल्म नेक इरादे के बावजूद असर नहीं छोड़ सकती है। ‘मुल्क’ इस मुश्किल से बच जाती है और इसका श्रेय कसी हुई पटकथा और कलाकारों के दमदार अभिनय को जाता है। यह तय करना आसान नहीं है कि वरिष्ठ अभिनेता ऋषि कपूर की अदायगी उम्दा है या कुछ फिल्मों का अनुभव रखने वाली तापसी पन्नू का अभिनय। बॉलीवुड फिल्मों में कॉमेडी भूमिकाओं में नजर आने वाले मनोज पाहवा को कई स्तरों पर अपना हुनर दिखाने का मौका मिला है। इनके अलावा नीना गुप्ता, रजत कपूर और प्राची शाह पंड्या ने भी कमाल का काम किया है। इन कलाकारों को आशुतोष राणा, प्रतीक बब्बर समेत अन्य अभिनेताओं का पूरा साथ मिला है। अभिनय के लिहाज से ‘मुल्क’ बीते कुछ सालों में आयीं बेहतरीन फिल्मों में आसानी से शुमार की जा सकती है।

फिल्म मुख्य रूप से बनारस में घटित होती है। वहीं इसका बड़ा हिस्सा अदालत में बहस का है। शहर और इसके गली-कूचों को इवान मुलीगन ने बड़ी लगन से फिल्माया है। अदालत के दृश्यों में कहानी और मौके के तनाव और बेचैनी का भी फिल्मांकन बेहद प्रभावी है। मुलीगन का कैमरा कुछ इस अदा से मौजूद है कि वह दर्शकों को फिल्म और उसके किरदारों के बीच ले जाता है। इससे कहानी में रमे रहने और उसके असर को महसूस करने की शिद्दत बढ़ जाती है।

यह एक अजीब विडंबना है कि एक तरफ हमारे देश में आस्था, भाषा, पहनावा, खान-पान तथा रहन-सहन के लिहाज से दुनिया का सबसे अधिक विविधता है, वहीं इन्हीं बातों के आधार पर हिंसा और भेदभाव का सिलसिला भी लगातार चलता रहता है। हिंदू और मुस्लिम समुदाय जहां गंगा-जमुनी तहजीब के जरिये देश के सांस्कृतिक जीवन को समृद्ध करते रहे हैं, वहीं आपस में इनके लड़ने-मरने के भी अनेक उदाहरण हैं। दुर्भाग्य से यह सांप्रदायिक खाई घटने के बजाये बढ़ती ही जा रही है। ‘मुल्क’ के जरिये अनुभव सिन्हा ने इस खाई को पाटने की एक ईमानदार कोशिश की है। ‘मुल्क’ की सबसे बड़ी खासियत है कि यह उन बातों को रेखांकित करने से परहेज नहीं करती है, जिनके बारे में चर्चा मीडिया और राजनीति में लगभग अनुपस्थित है। राष्ट्रीय लोकवृत्त में यह चुप्पी अफवाहों, फरेब और शको-सुबहा को खाद-पानी देती है जिसकी फसल बदकिस्मती से टेलीविजन पर उन्मादी बहसों और सोशल मीडिया पर गाली-गलौच के रूप में लहलहा रही है। आस्था और जीवन-शैली के आधार पर आबादी के एक हिस्से को भयभीत कर अपमानजनक हाशिये पर धकेलने की कवायद देश के हित में नहीं है। फिल्म यह बताते हुए जोर देकर कहना चाहती है कि मेल-जोल, साथ खाने-पीने और कहकहे लगाने के गुमशुदा मौसमों को वापसी जरूरी है। तल्ख चीखों का यह मौजूदा माहौल मुल्क के आने वाले कल के लिए जहर बनता जा रहा है. ‘मुल्क’ जैसी फिल्म बनाकर अनुभव सिन्हा ने भले ही अपने करियर या अपनी फिल्मी पहचान के लिहाज से जोखिम उठाया है, पर यह जोखिम इस फिल्म की अहमियत के हिसाब से कम ही कही जायेगी। जिस तरह से फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों की सराहना मिल रही है, उसे देखते हुए यह उम्मीद की जा सकती है कि हमारे फिल्मकार अपने समय और समाज की कहानियों को परदे पर उकेरने का साहस दिखायेंगे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here