पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को आप अपनी विचारधारा और उनके लंबे जीवन के आकलन के आधार पर चाहे जिस तरह विवेचित करें, परंतु आप इस तत्व को अलग नहीं रख सकते कि वे एक संवेदनशील कवि और सहृदय मनुष्य भी थे। जैसे पंडित जवाहरलाल नेहरू को उनके सुचिंतित एवं भावपूर्ण लेखन के लिए जाना जाता है, वैसे ही उन्हें सांस्कृतिक इतिहास के राजनीतिक खाते में ऐसे कवि के रूप में दर्ज किया जायेगा, जो अपने सार्वजनिक, व्यक्तिगत और आत्मिक यात्रा को काव्य में संजोने की विलक्षण प्रतिभा से संपन्न था।

अटल जी को उनकी कविताओं और उनके रसिक होने में भी खोजा और सहेजा जाना चाहिए। राजनीति से इतर भी तो जीवन के रंग होते हैं।

यह जगजाहिर है कि अटल जी पुराने फिल्मी गानों और शास्त्रीय संगीत के रसिक थे। अपने चिरसहयोगी लालकृष्ण आडवाणी की तरह उन्हें फिल्मों का भी शौक था। सुदीर्घ कलात्मक और राजनीतिक जीवन में अटल जी का संपर्क हर विधा के तमाम कलाकारों से रहा होगा, यह स्वाभाविक भी है। औपचारिक-अनौपचारिक तस्वीरों के दस्तावेज इसकी हामी भी भरते हैं, लेकिन अपनी कविताओं की कलात्मकता के साथ परदे पर आना 2002 में मुमकिन हो सका। वह संयोग भी विलक्षण रहा। अटल जी के प्रख्यात काव्य-संकलन ‘मेरी इक्यावन कविताएं‘ को चित्रात्मक एवं ध्वन्यात्मक अभिव्यक्ति को निर्देशित किया रोमांस और मुहब्बत के फिल्मकार यश चोपड़ा ने। कविताओं को आवाज मिली हरदिल अजीज गायक जगजीत सिंह की। इन्होंने ही संगीतबद्ध किया और मशहूर शायर-लेखक जावेद अख्तर ने अपनी भूमिका से इस प्रस्तुति को एक आयाम में बांधा। इसे महान अभिनेता अमिताभ बच्चन ने अपनी आवाज में पढ़ा।

इस पूरे आयोजन में एक रचनात्मक आयाम यह भी जुड़ता है कि अटल जी के संकलन के इस एलबम का लोकार्पण महान सितारवादक और संगीतज्ञ पंडित रविशंकर के हाथों संपन्न हुआ। इस एलबम का नाम उचित ही ‘संवेदना‘ रखा गया क्योंकि विरोधाभासों से जटिल अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व का वह एक मूल तत्व है। जगजीत सिंह ने तब कहा था, ‘कलाकार के रूप प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व से मैं अभिभूत था। वे एक संवेदनशील व्यक्ति हैं।‘  ‘क्या खोया क्या पाया‘ कविता के वीडियो में खुद अटल जी को देखा जा सकता है। परदे पर आने की इस परिघटना के बारे में अटल जी ने एक साक्षात्कार में कहा था कि एक दिन यश चोपड़ा उनके कक्ष में आये और कहने लगे कि वे उन्हें निर्देशित करना चाहते हैं। अटल जी ने हामी भरते हुए खुद को निर्देशक के हाथों सौंप दिया। इस सौंपने के पीछे जो भरोसा था, उसकी वजह यह थी कि वाजपेयी जी यश चोपड़ा के बड़े प्रशंसक थे।

आज उस वीडियो और एलबम को आये 16 साल बीत चुके हैं। अटल जी के साथ यश चोपड़ा और जगजीत सिंह भी दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। ऐसे में उस एलबम का महत्व न सिर्फ कलात्मक उत्पाद के रूप में, बल्कि सांस्कृतिक दस्तावेज के रूप में भी बहुत बढ़ जाता है। आज जब हम अटल जी के जाने का शोक मना रहे हैं, तो वह एलबम और वह वीडियो उनके व्यक्तित्व के अलहदा रूप की निशानी के तौर पर हमारे पास है। इसे देखकर अनुभव के अन्यतम स्तरों की यात्रा की जा सकती है।

इस संदर्भ में यह बात भी याद रखी जानी चाहिए कि तल्ख  राजनीतिक उठापटक के हमारे दौर के लिए अटल जी का कवि रूप और विविध कलात्मक अभिव्यक्तियों के प्रति उनका अनुराग अनुभव व अनुभूति के साथ एक अन्यतम आदर्श भी हो सकता है। क्या खूब हो सकता है जब हम राजनेताओं की विचारधाराओं और उनकी खूबियों-खामियों पर बहस के साथ उनकी कलात्मक अभिव्यक्तियों का भी संज्ञान लें। इससे अविश्वास, हिंसा, अपमान, द्वेष और द्वंद्व से आक्रांत हमारे समय को एक सुकून का ठौर मिलेगा, संवेदना को ऊर्जा मिलेगी तथा हौसलों को उड़ान की सीख प्राप्त होगी।

कहते हैं कि कभी सुरों की महारानी लता मंगेशकर ने अटल जी से कहा था कि अगर अंग्रेजी में आपके नाम के पहले हिस्से को उलट दें, तो वह लता हो जाता है। यह सुन अटल जी अपने चिर-परिचित अंदाज में ठठाकर हंस दिये। यह हंसी उस बिंदास और विराट व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति थी, जो कविता कर सकती थी, राजनीति के दांव चल सकती थी, जीवन के उतार-चढ़ाव में सम को साध सकती थी। अटल जी को उनकी कविताओं और उनके रसिक होने में भी खोजा और सहेजा जाना चाहिए। राजनीति से इतर भी तो जीवन के रंग होते हैं।

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