स बार आॅस्कर में विदेशी श्रेणी के लिए रीमा दास निर्देशित ‘विलेज रॉकस्टार्स‘ को भेजा गया है। कम बजट की इस फिल्म ने पहले ही तमाम फिल्म समीक्षकों-आलदुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म पुरस्कार आॅस्कर के लिए भारतीय प्रविष्टि के रूप में रीमा दास द्वारा निर्देशित स्वतंत्र असमी फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स‘ को चुना गया है। बीते सप्ताह फिल्म फेडरेशन आॅफ इंडिया की 12 सदस्यों की समिति ने इसका चयन आॅस्कर की ‘बेहतरीन विदेशी फिल्म‘ श्रेणी के लिए किया है। असम के एक गांव में बेहद गरीब परिवार में जन्मी बच्ची के जीवन और सपनों की यह कथा अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी है। इसकी एक विशेषता यह है कि निर्देशन के अलावा इस फिल्म का लेखन, छायांकन और संपादन भी रीमा दास ने किया है। ऐसा पहली बार है, जब इतने छोटे बजट और स्वतंत्र रूप से बनाई गई फिल्म को आॅस्कर में देश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है।

बहरहाल, यह तो बाद की बात है कि फिल्म इस पुरस्कार समारोह में क्या उपलब्धि हासिल करती है। लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि किसी भी प्रविष्टि को अंतिम पांच फिल्मों में शामिल होने के लिए अनेक स्तरों से गुजरना होता है। इसमें सबसे अहम भूमिका प्रचार की होती है। फिल्म को आॅस्कर पुरस्कार देने वाली अकादमी के हजारों सदस्यों तक पहुंचना होता है। इसके बाद पांच नामांकित फिल्मों की सूची बनती है। अब तक सिर्फ तीन फिल्मों- मदर इंडिया (1957), सलाम बॉम्बे (1988) और लगान (2001) को ही नामांकित होने का अवसर मिल सका है। प्रचार में पीछे रहने के कारण अक्सर भारत और अन्य देशों की अच्छी फिल्में निर्णायक मंडल तक पहुंच ही नहीं पाती हैं।

इस बार ऑस्कर में विदेशी श्रेणी के लिए रीमा दास निर्देशित ‘विलेज रॉकस्टार्स’ को भेजा गया है। कम बजट की इस फिल्म ने पहले ही तमाम फिल्म समीक्षकों-आलोचकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।

इस प्रचार के लिए बड़ी धनराशि का होना जरूरी होता है। फिल्म फेडरेशन आॅफ इंडिया की चयन समिति के अध्यक्ष एस.वी. राजेंद्र सिंह बाबू ने अफसोस जाहिर किया है कि प्रचार के लिए जरूरी धन की बड़ी कमी है। हालांकि असम सरकार ने इसके लिए अपने कोष से पचास लाख रुपये देने की घोषणा की है। जानकारों का कहना है कि आॅस्कर में अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए करीब पांच करोड़ रुपये तक खर्च करने पड़ सकते हैं। रीमा दास ने सरकार और फिल्म जगत से मदद की गुहार लगाई है।

निश्चित रूप से भारत की निगाहें ‘विलेज रॉकस्टार्स‘ पर रहेंगी, पर देश के बाहर की फिल्मों के जरिये कुछ भारतीय नाम भी इस साल चर्चा में हैं। बांग्लादेश की आधिकारिक प्रविष्टि ‘डूब‘ में इरफान खान प्रमुख भूमिका में तो हैं ही, वे इस फिल्म के सह-निर्माता भी हैं। पिछले साल अक्टूबर में प्रर्दिशत इस फिल्म को बांग्लादेश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था, पर भारी विरोध के कारण उसे पीछे हटना पड़ा। नॉर्वे द्वारा आॅस्कर भेजी जा रही ‘व्हाट विल पीपुल से‘ में आदिल हुसैन मुख्य कलाकारों में से हैं। आदिल हुसैन असम से हैं और रीमा दास की फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स‘ के प्रचार के लिए धन जुटाने की मुहिम में सक्रिय हैं। भारत की ओर से आॅस्कर पुरस्कारों के लिए फिल्में भेजने का सिलसिला1957 में महबूब खान की ‘मदर इंडिया‘ से शुरू हुआ। ऐसा कहा जाता रहा है कि वह फिल्म सिर्फ एक वोट की कमी से पुरस्कार न पा सकी थी। इधर कुछ सालों का आकलन करें, तो शायद अक्सर हमारा चयन ही कमजोर होता है। पिछले समारोह में भेजी गई ‘न्यूटन‘ एक उम्दा फिल्म तो थी, पर करीब पांच-सात करोड़ की लागत से बनी फिल्म आॅस्कर में खुद को चर्चा में लाने के लिए और पांच करोड़ नहीं जुटा पाई। ‘लगान‘ के मामले में ऐसी दिक्कत नहीं आई थी, सो फिल्म आखिरी पांच फिल्मों में शामिल होने में कामयाब रही थी। खैर, यह सुकून की बात है कि दूसरे देशों की फिल्मों के जरिये ही सही, भानु अथैया, एआर रहमान, रसूल पुकुट्टी, गुलजार, जैसे भारतीय नाम पुरस्कार विजेताओं की सूची में हैं। महान फिल्मकार सत्यजित रे को विश्व सिनेमा में योगदान के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड मिल चुका है। साल 2012 में एंग ली की ‘लाइफ आॅफ पाई‘ के एक तमिल गीत को नामांकित किया गया था जिसे बॉम्बे जयश्री ने रचा था। अश्विन कुमार की ‘लिटिल टेररिस्ट‘ को 2005 में शॉर्ट फिल्म श्रेणी में नामित किया गया था।

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