‘पीरियड एंड आॅफ सेंटेंस’ को ‘डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट सब्जेक्ट श्रेणी में आॅस्कर पुरस्कार मिला है। यह फिल्म उत्तरी भारत के हापुड़ की लड़कियों, महिलाओं और उनके गांव में पैड मशीन की स्थापना को लेकर है।

प्र तिष्ठित आॅस्कर पुरस्कारों की ‘बेस्ट डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट सबजेक्ट’ श्रेणी में इस साल का पुरस्कार 26 मिनट की अवधि की ‘पीरियड एंड आॅफ सेंटेंस’ को मिला है। इसे ईरानी-अमेरिकी फिल्मकार रेका जहताबची ने निर्देशित किया है और भारतीय फिल्म प्रोड्यूसर गुनीत मोंगा की कंपनी सिख्या इंटरटेनमेंट ने इसका निर्माण किया है। ‘पीरियड’ का यह पुरस्कार कई वजहों से खास है। एक तो माहवारी का विषय समूची दुनिया में सामाजिक विकास और जागरूकता बढ़ने के बावजूद आज भी वर्जना का विषय बना हुआ है। यह भी कि यह फिल्म लॉस एंजिÞलेस के ओकवुड स्कूल के छात्रों और उनकी शिक्षिका मेलिसा बर्टन के प्रयास ‘द पैड प्रोजेक्ट’ का हिस्सा है। यह प्रोजेक्ट सस्ते और सुरक्षित सैनेटरी पैड उपलब्ध कराने की कोशिश करने के साथ माहवारी से जुड़ी नकारात्मक मान्यताओं और अवधारणाओं से लोगों को छुटकारा दिलाने के लिए प्रचार भी करता है। हम जानते हैं कि भारत के मृगानाथम ने सस्ते पैड बनाने की मशीन बनायी है।

उनके ऊपर अक्षय कुमार अभिनीत फिल्म ‘पैडमैन’ भी कुछ समय पहले बन चुकी है। इस मशीन को देश के अनेक ग्रामीण इलाकों में लगाया गया है। यह मशीन न सिर्फ पैड मुहैया कराती है, बल्कि पैड बनाने के काम में लगी महिलाओं के लिए नियमित आय का साधन भी है। ‘द पैड प्रोजेक्ट’ इसे आगे बढ़ाने में लगा हुआ है। यह फिल्म दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के ग्रामीण क्षेत्र में लड़कियों और महिलाओं पर आधारित है। इस बार के पुरस्कार के लिए ‘पीरियड’ की प्रतिस्पर्द्धा गंभीर मुद्दे पर बनी कुछ बहुत अच्छी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों से थी। ‘ब्लैक शीप’ नस्लभेद पर बनी है तथा ‘लाइफबोट’ सीरियाई शरणार्थियों का मुद्दा उठाती है। इन तीनों फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत सराहा जा चुका है तथा इन्हें कई अवार्ड मिल चुके हैं। ‘पीरियड’ का एक विशेष पहलू यह है कि गांव की लड़कियों और महिलाओं की माहवारी से जुड़ी मुश्किलों और उनसे संघर्ष को उदासी और दु:ख के साथ पेश करने के बजाय यह फिल्म सकारात्मकता और जिंदादिली को रेखांकित करती है। इस संघर्ष के सफल होने की आशा से भरी है यह फिल्म। माहवारी को लेकर बदलते रवैए को दिखाकर न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया के अन्य देशों के लिए भी एक मिसाल बनती है कि अगर काटीखेड़ा की औरतें मशीन लगा कर सैनेटरी पैड बना सकती हैं और उनके इस्तेमाल के लिए अन्य औरतों को उत्साहित कर सकती हैं, तो यह काम कहीं भी हो सकता है और यह होना भी चाहिए। समाज, खासकर पुरुषों की सोच को बदलने में महिलाओं की भूमिका का चित्रण भी आश्वस्त करनेवाला है।

मृगानाथम सही ही कहते हैं कि धरती पर सबसे ताकतवर बाघ या हाथी नहीं है, बल्कि लड़कियां हैं। ऐसा भी नहीं है कि ये लड़कियां गांव की हद में रहकर बदलाव कर रही हैं। फिल्म में दिखायी गयी एक लड़की में इतना आत्मविश्वास आता है कि वह दिल्ली आ पहुंचती है और पुलिस अधिकारी बनने का प्रशिक्षण लेती है। पर, फिल्म यह भी बता जाती है कि माहवारी को लेकर वर्जनाओं को बदलना बहुत आसान भी नहीं है और इसके लिए लगातार कोशिश की दरकार है। एक दृश्य में जब एक स्कूल में एक लड़की से माहवारी के बारे में पूछा जाता है, वह सन्न रह जाती है. वह कुछ कहना चाहती है, पर कह नहीं पाती। यह मार्मिक निशब्द दृश्य एक बड़ा संदेश दे जाता है कि बच्चियों को वर्जनाओं और बेमतलब विश्वासों के चंगुल से मुक्त कराया जाए। फिल्म को लेकर कुछ बड़ी आलोचनाएं भी हुई हैं। इस मुद्दे पर ग्रामीण क्षेत्रों में और बच्चियों के बीच काम करनेवाली कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि फिल्म बनाने के दौरान बच्चों के अधिकारों का हनन हुआ है। इस आरोप पर ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि बच्चे अपने अधिकारों के बारे में ठीक से नहीं जानते हैं। उनके अधिकारों की अवहेलना भी बहुत होती है। इसका एक आयाम यह भी है कि इस अवहेलना को लेकर लोगों में एक चिंताजनक लापरवाही भी है। दूसरा आरोप फिल्म में उल्लिखित आंकड़ों और तथ्यों की सत्यता को लेकर है। उम्मीद है कि इस फिल्म से जुड़े लोग जल्दी ही इन आरोपों पर अपना पक्ष रखेंगे। पर, इतना जरूर कहा जाना चाहिए कि ऐसे विषयों पर फिल्मों और सामाजिक सक्रियता की बहुत जरूरत है। ‘पीरियड’ को आॅस्कर मिलने से देश-दुनिया में माहवारी और पैड के मुद्दे पर काम करनेवालों का हौसला बढ़ेगा, इसकी उम्मीद रखनी चाहिए।

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