भले ही 1947 के बाद से अब तक सिनेमा का रंग-ढंग बहुत हद तक बदल चुका है, पर उसकी बुनियाद में 1913 और 1930-40 के बीच के कई कारक हैं।

साल 1931 में भारतीय सिनेमा ने बोलना भी शुरू कर दिया था। अब सिनेमा को भी राष्ट्र के सांस्कृतिक जीवन में जगह चाहिए थी।

साल 1913 में दादासाहेब फाल्के ने ‘राजा हरिश्चन्द्र’ बनाई और सिनेमा की औपचारिक यात्रा हमारे देश में प्रारंभ हुई। बहुत जल्दी ही मुम्बई के अलावा कोल्हापुर, चेन्नई, कोलकाता, पूना और हैदराबाद में फिल्में बनने लगीं। लेकिन अंग्रेजी हुकूमत भी चौकन्ना थी। इसलिए उसने सितंबर, 1917 में सिनेमा का विधेयक पेश कर दिया, अगले साल कानून बन गया। मुम्बई, चेन्नई और कोलकाता में सेंसर बोर्ड बने जिनका काम था फिल्मों को सेंसर करने में पुलिस की सहायता करना। यह कानून अगस्त, 1920 में लागू हो गया। साल 1928 में रबीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी पर शिशिर बोस द्वारा निर्देशित ‘बिचारक’ को रोक दिया गया। शायद रबीन्द्रनाथ ठाकुर पहले ऐसे शीर्ष व्यक्ति थे, जिन्होंने सिनेमा में शुरू से ही बड़ी दिलचस्पी दिखाई। उन्होंने नई प्रतिभाओं को बढ़ावा दिया और यह भी राय दी कि सिनेमा को साहित्य और पाठ से इतर अपनी स्वायत्त धारा बनाये। वे विदेशों से भी कलात्मक सहयोग के लिए प्रयासरत थे। साल 1932 में उन्होंने ‘नातिर पूजा’ नामक फिल्म का निर्देशन भी किया। उसी साल उन्होंने कोलकाता में एक सिनेमाघर के उद्घाटन के लिए एक कविता भी लिखी। मार्च, 1937 में वे कोलकाता में ‘अछूत कन्या’ के प्रीमियर में भी शामिल हुए। साल 1930 में उन्होंने कनाडा में अंतरराष्ट्रीय फिल्म सम्मेलन में भाषण भी दिया था। इससे पहले 1926 वे लंदन में ब्रिटिश एम्पायर फिल्म इंस्टीट्यूट में सदस्य भी बने थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि भारतीयों में गहरी कलात्मक चेतना होती है और उनमें अच्छी फिल्मों को पसंद करने की क्षमता है। बहरहाल , 1930 तक आजादी की लड़ाई सघन हो रही थी और साल 1931 में भारतीय सिनेमा ने बोलना भी शुरू कर दिया था। अब सिनेमा को भी राष्ट्र के सांस्कृतिक जीवन में जगह चाहिए थी। साल 1924 से ही सिनेमा पर अखबारों में लिखनेवाले पत्रकारों का समूह खड़ा हो चुका था। साल 1930 में राष्ट्रीय आंदोलन और नेताओं की गतिविधियां दिखाने वाली कुछ फिल्में प्रतिबंधित भी हुई थीं। हालांकि इसके बावजूद ऐसी फिल्में बनती रहीं। साल 1931 में बनी पहली तमिल बोलती फिल्म ‘कालिदास’ में एक गीत में गांधी की प्रशंसा की गई थी। अनेक सामाजिक फिल्मों में राष्ट्रीय आंदोलन के आदर्शों को आधार बनाया गया। कोलकाता में न्यू थियेटर्स के मालिक बीएन सरकार ने अपने मित्र सुभाषचंद्र बोस से राष्ट्रीय सिद्धांतों पर आधारित देशी सिनेमा के विकास के लिए मदद मांगी थी। पर राष्ट्रीय नेताओं के सामने कुछ और अहम चुनौतियां और लक्ष्य थे, इसलिए ऐसी कोई मदद नहीं मिली। भारतीय सिनेमैटोग्राफ कमेटी द्वारा 1927 में भेजे गए सवालों के जवाब में महात्मा गांधी ने कहा था कि उन्होंने कोई फिल्म नहीं देखी है। जब मुम्बई के एक अखबार ने भारतीय सिनेमा के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर गांधी से संदेश देने की प्रार्थना की, उनके सचिव ने उत्तर दिया कि गांधी को सिनेमा में दिलचस्पी नहीं है और वे प्रशंसा का कोई पत्र नहीं देंगे। फिल्म पत्रकार और लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास ने 1939 में गांधी को एक पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने सिनेमा के महत्व और उसमें हो रहे अच्छे बदलाव का उल्लेख किया गया था। ‘फिल्म इंडिया’ ने 1942 में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का एक साक्षात्कार छापा था। उसमें राजाजी ने पौराणिक फिल्मों की गुणवत्ता से असंतोष जाहिर किया था तथा सनसनी और सतहीपन से बचने की सलाह दी थी। उन्होंने उम्मीद जाहिर की थी कि सिनेमा अपने अनुभवों से सीखकर बेहतर होने की ओर अग्रसर होगा। फिल्मी पत्रिकाओं की स्पष्ट आलोचनाओं की भी उन्होंने सराहना की थी, पर समीक्षकों को उदारमना और प्रेरक होने की सलाह भी दी थी। सरदार पटेल कांग्रेस पर फिल्म बनाने के पक्षधर थे। साल 1942 में एक साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कह दिया कि आजादी मिलने के बाद उस फिल्म में कांग्रेस के विघटन का भी दृश्य जोड़ दिया जाए, जैसा कि गांधी की राय थी कि आजादी के बाद कांग्रेस को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उन्हीं दिनों सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि हमें अपने प्राचीन आदर्श बनाये रखने चाहिए, पर उसके आधुनिक लोगों के जीवन के साथ साम्य को भी रेखांकित किया जाना चाहिए। उन्होंने सिनेमा उद्योग से आम लोगों के रोजमर्रा जीवन और उनकी समस्याओं पर ध्यान देने की सलाह दी थी।

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