जादी की पहली दहाई भारतीय सिनेमा का सुनहरा वक्त माना जाता है। इनमें से 1957 का साल बेहतरीन फिल्मों के लिहाज से अहम है। उसी साल फिल्मकार राज कपूर कामयाब फिल्में बनाने के बाबत कहते हैं कि हीरो-हीरोइन का प्यार दिखा दो, दिल को छूने वाले संवाद डाल दो, मेलोड्रामा और गानों की भरपूर खुराक हो और आखिर में खलनायक को हारते हुए और अच्छाई को जीतते हुए दिखा दो। हालांकि घिसे-पिटे फामूर्ले फिल्म की कामयाबी की गारंटी नहीं दे सकते हैं, फिर भी 1950 से पहले और आज तक यही सिलसिला जारी है। साल 2015 में निमार्ता-निर्देशक महेश भट्ट ने चिंता जाहिर की थी कि भारतीय सिनेमा अपनी भारतीयता खोता जा रहा है और इसकी वजह है उसका अपनी जड़ों से कटना। उनकी नजर में इन जड़ों की तलाश क्षेत्रीय सिनेमा में की जानी चाहिए।

मेलोड्रामा से लेकर ध्वनि-प्रकाश संयोजन की तकनीकों को हमारे निर्देशकों ने अपनाया। संगीत भी लिया, कथा को कहने का ढंग भी, लेकिन इन्हें हमारे देश और समाज के साथ जोड़ने के कुछेक प्रयासों के अलावा बहुधा नकल कर नया करने के खोखले दावे ही किये गये।

आजाद हिंदुस्तान के इन दो फिल्मकारों की चिंता को भारतीय सिनेमा के पितृ-पुरुष दादासाहेब फाल्के के आखिरी बयान के साथ पढ़ा जाना चाहिए। मद्रास में जुलाई, 1940 में उन्होंने कहा था कि भले ही सिनेमा उद्योग सुस्थापित हो गया है, पर इसके सफर की दिशा सही नहीं है। उनकी सलाह थी कि सिनेमा एक शैक्षणिक उपदेशक है तथा फिल्मकारों को असभ्य और चिढ़ पैदा करने वाले प्रसंगों से परहेज करना चाहिए। यदि हम आजादी के बाद के सात दशकों की फिल्मों पर नजर डालें, तो तमाम उपलब्धियों के बावजूद एक सांस्कृतिक उत्पाद और अभिव्यक्ति के रूप में सकारात्मक परिदृश्य कमतर ही दिखता है। हम भले यह दावा कर लें कि संख्या और कमाई के मामले में झंडे भी गाड़े हैं, पर कला, शिल्प और विषय के स्तर पर व्यापक पिछड़ेपन से इनकार करना मुमकिन न होगा।

साहित्य, कला-रूप, भाषा, अभिव्यक्ति जैसे सांस्कृतिक तत्वों की हमारे विविधतापूर्ण देश में कोई कमी नहीं है, पर इस रचनात्मक कोष का सिनेमा ने समुचित संज्ञान नहीं लिया है। कहने के लिए हम फाल्के, शांताराम, सत्यजित रे, महबूब खान, जॉन अब्राहम, अदूर गोपालकृष्णन, जानू बरुआ आदि अनेक नाम गिना सकते हैं, पर इन परंपराओं का विस्तार बेहद सीमित ही रहा। हमारे फिल्मकार मुख्य रूप से मनोरंजन और मुनाफे के फेर में ही ज्यादा रहे हैं। यदि व्यावसायिक सिनेमा  को देखें, तो आप हिंदी या किसी अन्य भाषा की फिल्मों में अंतर नहीं कर पायेंगे। सब एक जैसा है। वही प्रेम की कथा, गाने, दृश्य- फूहड़ता की छौंक और ग्लैमर का दिखावा। यदि विशाल साहित्यिक, पौराणिक, ऐतिहासिक तथा लोक संस्कृति से कथा या अन्य तत्व लिये भी जाते हैं, तो उन्हें पॉपुलर की चाशनी में या सतहीपन के शोरबे में डूबा कर बेमानी कर दिया जाता है।

यह सही है कि सिनेमा एक आधुनिक तकनीक है जिसे पश्चिम से आयात किया गया है। यह भी स्वाभाविक है कि पाश्चात्य सिनेमा का असर रहेगा, पर यह असर सौ सालों में अंधानुकरण और नकल में तब्दील हो गया है। क्राइस्ट पर बनी हॉलीवुड की फिल्म फाल्के को सत्य हरिश्चन्द्र पर फिल्म बनाने को प्रेरित करती है, पर फाल्के अपनी कहानी और उसके चित्रण को भारतीय परंपरा में स्थापित करते हैं। इसका एक अन्यतम उदाहरण प्रभात फिल्म कंपनी की संत तुकाराम है जो 1930 के दशक में वेनिस फिल्म समारोह में धूम मचा देती है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद इटली की फिल्मों के नव-यथार्थवाद को सत्यजित रे समेत अनेक फिल्मकार अपनाते हैं और उसे विशिष्ट भारतीय पहचान देते हैं। कला फिल्मों का प्रयोगवाद भी नयी संभावनाओं की दस्तक था। मेलोड्रामा से लेकर ध्वनि-प्रकाश संयोजन की तकनीकों को हमारे निर्देशकों ने अपनाया, संगीत भी लिया, कथा को कहने के अंदाज पर भी प्रभाव पड़ा, लेकिन इन्हें हमारे देश और समाज के साथ जोड़ने के कुछेक प्रयासों के अलावा बहुधा नकल कर नया करने के खोखले दावे ही किये गये।

यदि हम अरब, फ्रांस, इटली, जर्मनी, जापान और ईरान के सिनेमा को देखें, तो तकनीक और कथा-शैली के आदान-प्रदान के बावजूद उनकी अपनी खास पहचान बनी। एक बात यह भी रही कि हमारी सरकारें और समाज नीतियों और चिंताओं के बावजूद सिनेमा को समृद्ध करने में ठीक योगदान देने में कमजोर साबित हुए। अच्छी फिल्में दर्शकों का इंतजार करती रहीं, सरकारें अनुदान देने में कोताही करती रहीं। दूसरी ओर सतही मनोरंजन कर करोड़ों-अरबों का कारोबार चलता रहा। सिनेमा एक प्रभावी माध्यम है। यह खर्चीला भी बहुत है। इसकी बेहतरी सरकार और समाज के सहयोग के बिना संभव नहीं है।

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