‘केसरी’ दर्शकों को पसंद आ रही है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म को पसंद करने के लिए सभी फिल्मी तत्व मौजूद हैं। यही कारण है कि जांबाजी और रोमांच समेटे इस फिल्म की कमाई रिकार्ड तोड़ रही है।

केसरी सबसे कम दिनों में सौ करोड़ रुपये कमाने वाली इस साल की पहली फिल्म बन गयी है। इतनी कमाई करने में जहां ‘गली बॉय’ को आठ और ‘टोटल धमाल’ को नौ दिन लगे, वहीं अनुराग सिंह निर्देशित ‘केसरी’ ने यह कारनामा महज सात दिनों में कर दिखाया। इस फिल्म में मुख्य भूमिका सुपरस्टार और बॉक्स आॅफिस के भरोसेमंद खिलाड़ी अक्षय कुमार ने निभायी है। करण जौहर जैसे बड़े नाम इस फिल्म के निर्माण से जुड़े हैं। दर्शकों के रुझान को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि ‘केसरी’ की कमाई का सिलसिला अभी कुछ दिन जारी रहेगा। फिल्म की कहानी 12 सितंबर, 1897 को हुई सारागढ़ी की लड़ाई पर आधारित है।
उस दौर में भारतीय उपमहाद्वीप पर अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन अपनी जड़ें जमा चुका था, लेकिन पश्चिमी मोर्चे पर उसे अक्सर पख्तून कबीलों की चुनौती का सामना करना पड़ता था। उनसे मुकाबले के लिए ब्रिटिश शासन ने अपनी सेना के सिख रेजीमेंट को आगे किया। खैबर-पख्तूनख्वा (अब पाकिस्तान में) ब्रिटिश सेना की चौकी पर घटना के दिन 10-12 हजार पठानों ने अचानक हमला बोल दिया। उस समय उस चौकी पर सिर्फ 21 सिख सैनिक थे। इन सैनिकों ने हवलदार ईशर सिंह की अगुवाई में पठानों का जमकर मुकाबला किया। इस लड़ाई को सैनिक इतिहास में मर-मिटने के अद्भुत उदाहरण के रूप में देखा जाता है। सैनिक कर्तव्य के निर्वाह में असाधारण वीरता के इस उदाहरण पर किताबें लिखी जा चुकी हैं। एक तो फिल्म की कहानी ऐसी है, जो सुनने में अविश्वसनीय लगती है। आखिर 21 सैनिक हजारों लड़ाकों का मुकाबला करने के लिए सोच भी कैसे सकते हैं।
वे चाहते, तो भाग सकते थे। अगर वे चौकी छोड़ देते, तो पख्तून किले पर भी काबिज हो जाते और ब्रिटिश सेना के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी हो जातीं। इतिहास के इस अनोखे अध्याय का यह आयाम दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच कर ला रहा है। तकनीक के शानदार इस्तेमाल और कलाकारों के सधे हुए अभिनय ने कहानी को जीवंत कर दिया है। सैनिक जीवन से परे उन 21 रणबांकुरों के जीवन को कहानी में पिरोकर निर्देशक ने उनमें और दर्शकों के बीच एक मजबूत संबंध स्थापित कर दिया है। लड़ाई और लड़ाई के तनाव के दृश्य निर्देशक की पकड़ को इंगित करते हैं। कामयाबी के सेहरे में उनके सह-लेखक गिरीश कोहली, संपादक मनीष मोरे और छायाकार अंशुल चौबे को बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए। ‘केसरी’ देखकर कहा जा सकता है कि एक बेहतरीन फिल्म बनाने के लिए निर्माता करण जौहर ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। उनका निवेश अब दर्शकों की पसंद के रूप में वापस मिल रहा है।
अक्षय कुमार ने तीन दशकों में विभिन्न भूमिकाओं में अपनी अदाकारी दिखायी है और ईशर सिंह के रूप में भी वे खरे उतरे हैं। गीत-संगीत कथानक के तेवर के साथ पूरा न्याय करते हैं और उनके प्रभाव को सघन बना देते हैं। इन तत्वों के कारण दर्शक फिल्म से पूरी तरह संतुष्ट हैं। बहरहाल, इस फिल्म के लिए जहां इससे जुड़े लोगों की सराहना की जानी चाहिए, पर इसकी कमियों को भी इंगित किया जाना चाहिए। पहली बात, इस लड़ाई में 21 सैनिकों के साथ एक आम सहयोगी भी मारा गया था। दूसरी बात, इस लड़ाई को इससे पहले के 150 सालों के सिखअफगान संघर्ष की कड़ी में देखा जाना चाहिए, जिसमें बाद में ब्रिटिश पहलू जुड़ गया।
तीसरी बात, इस लड़ाई से चार साल पहले अंग्रेजों ने भारत और अफगानिस्तान के बीच सीमा का एकतरफा निर्धारण किया था, जो अफगानों को मंजूर नहीं था। फिल्म के पास कुछ अन्य बातों को नकारने का मौका भी था, जो सारागढ़ी से जुड़ी हुई हैं। सिख सैनिकों की सही पोशाक दिखानी चाहिए थी, जैसे केसरिया की जगह खाकी पगड़ी हुआ करती थी। सैनिकों को लड़ाई में कृपाण ले जाने की अनुमति भी नहीं होती थी। फिर भी, वीरता की अद्भुत गाथा को परदे पर उतारकर इतिहास-आधारित फिल्मों की परंपरा में ‘केसरी’ का महत्वपूर्ण स्थान होगा।

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