हिंदी सिनेमा में भारतीय सेना से जुड़ी अनेक गाथाओं पर फिल्में बनी हैं, पर वास्तविक युद्धों में साहस और पराक्रम की कहानी कहने वाली फिल्में गिनी-चुनी ही हैं। सात दशकों के स्वतंत्र भारत में पड़ोसी देशों से युद्ध, झड़पों, घुसपैठ और तस्करी आदि की अनगिनत घटनाएं हैं और ऐसी हर घटना पर फिल्म बनायी जा सकती है या धारावाहिकों का निर्माण हो सकता है। इस कड़ी में जेपी दत्ता द्वारा निर्देशित ‘पलटन‘ कई मायनों में बेहद अहम है। अपनी फिल्मों के व्यापक कैनवास, कलाकारों की बड़ी सूची और भव्य लोकेशन फिल्माने के लिए दत्ता मशहूर हैं। सेना और उसके कुछ अभियानों पर वे पहले भी फिल्में बना चुके हैं। उनकी ‘बार्डर‘ और ‘एलओसी कारगिल‘ बड़ी कामयाब फिल्में रही हैं। ‘रिफ्यूजी‘ को भी इसी कड़ी में रखा जा सकता है। इनके अलावा वे एक्शन और बड़े स्टार कास्ट की अनेक फिल्में बना चुके हैं। मारपीट और बम-बारूद के बीच वे रोमांस और प्रेम को भी उम्दा सलीके से परदे पर रचते हैं। उनकी कला और उनके शिल्प के सभी विशिष्ट तत्व ‘पलटन‘ में भी हैं।

कुछ फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन या सिनेमाई स्तर पर नहीं देखा जाना चाहिए। कभी-कभार वे एक जीवंत दस्तावेज या इतिहास का कोई भूला-बिसरा पन्ना भी हो सकती हैं। आम भारतीय के जेहन से उतर चुके नायकों की बहादुरी और बलिदान को फिल्में अपने तरीके से दर्ज कर दंत-कथा की शक्ल भी दे सकती हैं। ‘पलटन‘ ऐसी ही एक फिल्म है। इसमें मनोरंजन के आयाम तो हैं, साथ में दशकों पहले भारत-भूमि पर शत्रु देश के कदमों को पड़ने से रोकने वाले एक बहादुर सैनिक अधिकारी और उसकी पलटन की स्मृति को भी सहेजा गया है।

जेपी दत्ता के निर्देशन कौशल से सुसज्जित ‘पलटन’ दर्शकों को पसंद आ रही है। ‘बॉर्डर’ और ‘एलओसी कारगिल’ के बाद भारतीय सेना के साहस और वीरता पर एक प्रशंसनीय फिल्म है।

साल 1967 में सिक्किम में भारत-चीन सीमा पर नाथूला के मोर्चे पर तैनात मेजर जनरल सगत सिंह और उनकी 17 माउंटेन डिवीजन ने ऊपरी आदेश के बावजूद अपनी चौकी से पीछे हटना मंजूर नहीं किया। उस समय बगल की एक चौकी पर तैनात भारतीय टुकड़ी वापस चली गयी। मेजर जनरल सगत सिंह ने न सिर्फ नाथु-ला में जीत हासिल की, बल्कि चीन के हाथों पराजय से निराश भारतीय सेना में आत्मविश्वास का संचार भी किया। इस अधिकारी ने 1961 में पुर्तगालियों के विरुद्ध गोवा के मुक्ति संग्राम तथा 1971 में बांग्लादेश को स्वतंत्र कराने के संघर्ष में भी अग्रणी भूमिका निभायी। सगत सिंह की जीवनी लिखने वाले सेवानिवृत मेजर जनरल रणधीर सिंह उन्हें युद्ध की स्थितियों में भारतीय सेना का सबसे सफल अधिकारी मानते हैं।

‘पलटन‘ में सगत सिंह का किरदार जैकी श्रॉफ ने निभाया है और अन्य भूमिकाओं में अर्जुन रामपाल, सोनू सूद, गुरमीत चौधरी, ईशा गुप्ता, सोनल चौहान आदि कई कलाकार हैं। फिल्म का कथानक निर्माता-निर्देशक जेपी दत्ता ने लिखा है। गीत जावेद अख्तर के हैं और संगीत अनु मलिक ने दिया है। पार्श्व संगीत संजॉय चौधरी ने रचा है। एक दिलचस्प बात यह है कि फिल्म के टाइटल गाने ‘पलटन‘ का संगीत 1957 में बनी हॉलीवुड की क्लासिक फिल्म ‘अ ब्रिज आॅन रिवर कवाई‘ से लिया गया है। वह फिल्म भी द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में बनी थी।

जहां तक अभिनय की बात है, सभी कलाकारों ने अच्छा काम किया है, पर चीनी सैनिकों की भूमिकाओं पर निर्देशक और कलाकारों ने कम मेहनत की है। कुछ झड़पों के दृश्य कमजोर हैं और कहीं-कहीं शोर भी जरूरत से अधिक है। पर अंतिम भाग में जो एक्शन है, वह निश्चित रूप से फिल्म का एक बड़ा हासिल है। कई दृश्यों में जैकी श्रॉफ ने जता दिया है कि वे भले ही कुछ सालों से बहुत कम फिल्में कर रहे हैं, पर बरसों के अनुभव को नयी भूमिका में रचाना-बसाना उन्हें बखूबी आता है। नये अभिनेता-अभिनेत्रियां वरिष्ठों के सामने बेहतर कर सके हैं और इसका श्रेय निश्चित रूप से जेपी दत्ता को जाता है।

हम आमतौर पर सैनिकों को देश की रक्षा में उनके बलिदान और उनकी बहादुरी के लिए सम्मान देते हैं, लेकिन उनसे हम यह भी सीख ले सकते हैं कि विपरीत समय में धीरज, वीरता, समझ बहुत जरूरी हैं। ‘पलटन‘ में मेजर जनरल सगत सिंह और उनके जांबाजों की कथा से हमें इस संदेश को आत्मसात करना चाहिए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here