राजनीति

नीतीश की आगे की राह कठिन

बिहार में अररिया जिले की जोकीहाट विधानसभा सीट उपचुनाव में जदयू से छिन गयी। सीमांचल में अपनीराजनीतिक धाक रखने वाले पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं अररिया के दिवगंत सांसद तस्लीमुद्दीन के परिवार काजोकीहाट पर प्रभुत्व रहा है। खुद तस्लीमुद्दीन इस  सीट से चार बार और उनके बेटे अररिया के राजदसांसद सरफराज आलम पांच बार जीते हैं। इस बार सरफराज अपने छोटे भाई शाहनवाज को विधायक बनाने में कामयाबरहे हैं।  मुस्लिम बहुल जोकीहाट विधानसभा क्षेत्र के इस उपचुनाव में राजद को इसका फायदा राजद–कांग्रेस से नाता तोड़भाजपा से सत्ता में साझेधारी के बाद जदयू को उपचुनाव में दूसरी बार हार का मुंह देखना पड़ा है। राजद के मुकाबलेपहले जहानाबाद में करारी शिकस्त हुई। इस बार जोकीहाट में भी हार का मुंह देखना पड़ा है। राजद को यादव–मुस्लिममतों की गोलबंदी के साथ भाजपा विरोधी दलों की एकजुटता का भी सीधा लाभ मिला है। 243 सदस्यीय विधानसभा मेंअकेले सबसे बड़ा दल  राजद के सदस्यों की संख्या 81 हो गयी है। विपक्ष की बढ़ती ताकत, विरोधियों की एकजुटता औरभाजपा के साथ दूसरी बार दोस्ती के बाद द्वंद्व में फंसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए आगे का रास्ता कठिन होतादिख रहा है। ⌈ महागठबंधन सरकार समाप्त होने के बाद राजद विशेष रूप से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर लगातार तीखा हमला बोल रहा है। ⌋ लग रहा था कयास विधानसभा के पिछले चुनाव के समय तस्लीमुद्दीन के अररिया से राजद का सांसद रहते उनके बेटे सरफराज आलमजोकीहाट से जदयू के टिकट पर जीते थे। लोकसभा के उपचुनाव में सरफराज ने जदयू के टिकट पर चुनाव लड़ने कीपेशकश यह कहते हुए ठुकरा दी थी कि तब मुसलमानों का वोट उन्हें नहीं मिलेगा और वे चुनाव नहीं जीत पायेंगें। इसीकारण उन्होंने जदयू छोड़ने के साथ विधानसभा से भी इस्तीफा कर सीट खाली कर दी थी। उपचुनाव में जहां राजद जीतनेमें कामयाब रहा वहीं जदयू के उम्मीदवार मुर्शिद आलम को लेकर पार्टी की किरकिरी भी होती रही। शुरू में पूर्व मंत्री मंजरआलम बागी बन निर्दलीय चुनावी दंगल में कूद गये। बाद में वे जदयू के पक्ष में चुनावी दंगल से हटने की भी घोषणा करदी। मंजर आलम  दो बार इस सीट से जीत चुके थे और इस बार टिकट के प्रबल दावेदार थे। जदयू ने दल विरोधी कामकरने के आरोप में  मंजर आलम की विधान परिषद की सदस्यता समाप्त कराने की जब कार्रवाई शुरू करवाई तब उन्होंनेखुद परिषद से इस्तीफा कर दिया था। जदयू की ओर से उपचुनाव में जीतने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई।मुख्यमंत्री की चुनावी सभा होने के साथ पार्टी महासचिव आरसीपी सिंह सहित कई मंत्री और अन्य नेता वहां डटे रहे। परतस्लीमुद्दीन परिवार की धाक के आगे जदयू अपना चमत्कार नहीं दिखा पाया। उपचुनाव का नतीजा आते ही विपक्ष नेमुख्यमंत्री नीतीश कुमार से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा मांगने की देर नहीं की। राजनीतिक घटनाक्रम में फिलहालविधानसभा में दूसरा बड़ा दल जदयू और तीसरी बड़ी पार्टी भाजपा सत्तासीन है। महागठबंधन सरकार समाप्त होने केबाद राजद विशेष रुप से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर लगातार तीखा हमला बोल रहा है। विशेष पैकेज का मुद्दा लोकसभा चुनाव नजदीक आते देख बिहार में  विशेष राज्य का दर्जा और विशेष पैकेज की मांग नये सिरे से बुलंद होनेलगी है। हालांकि यह सर्वदलीय मांग रही है। परंतु  नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी जदयू की ओर से इसे विधानसभा चुनावके समय भी प्रमुख मुद्दा बना कर पटना से दिल्ली तक अभियान चलाया था। 15वें वित्त आयोग का अध्यक्ष पद परबिहारी एनके सिंह के होने से बिहार के साथ न्याय की अपेक्षा के साथ फिर यह मांग तेजी से उठने लगी है। मुख्यमंत्रीनीतीश कुमार ने खुद और पार्टी की ओर से बिहार के साथ नाइंसाफी होने की शिकायत के साथ इस मांग को लेकर वित्तआयोग को पत्र लिखा गया है। बयानबाजी तेज हो गयी है। इसको लेकर भाजपा के नेता असहज है।

गठबंधन नहीं रोक पाएगा मोदी की राह

कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा के उपचुनाव को भले ही अगले आम चुनावों का सेमीफाइनल बतायाजा रहा हो, लेकिन 2019 में गठबंधन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राह रोक पाना मुश्किल होगा।चुनाव परिणामों का बारीकी से विश्लेषण करने से पता चलता है कि विपक्षी दलों की तमाम घेरेबंदी के बादभी नूरपुर में 2017 के मुकाबले भाजपा ने 10,000 वोट अधिक हासिल किए। कैराना में भी ऐसे ही हालात रहे हैं। वहांकम मत प्रतिशत भाजपा की हार का कारण बन गया। विपक्ष मिलकर भी 2014 चुनावों में मिले वोट भी हासिल नहींकर पाया। ⌈ प्रदेश में उपचुनाव जीतकर विपक्षी दल खुश हैं। उनकी एकता विजयी जरूर हुई है, पर गठबंधन की राह इतनी आसान नहीं लग रही है। 2019 की जंग से पहले प्रदेश में सीटों के बंटवारे पर घमासान मचना तय है। ⌋ कैराना लोकसभा में शामिल पांच विधानसभाओं में से तीन शामली और दो सहारनपुर जनपद में पड़ती है। 2014 केलोकसभा चुनावों में 73 प्रतिशत मतदान के साथ सपा को 3,29,081, बसपा को 1,60,414 और रालोद को 42,706 वोट हासिल हुए थे। इन तीनों ने मिलकर 5,32,201 वोट जुटाए। जबकि अकेले भाजपा को उस समय 5,65,909 वोटमिले। जबकि 2018 के उपचुनाव में मतदान प्रतिशत गिर गया। इन चुनावों में रालोद गठबंधन को मात्र 4,81,182 वोट ही मिल पाए और भाजपा को 4,36,564 वोट मिले। इसी तरह से बिजनौर जनपद की नूरपुर विधानसभा में 2017 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन को 1,14,510 वोट हासिल हुए। इनमें रालोद के 2,172, सपा के 66,434 औरबसपा के 45,920 वोट शामिल थे। उस समय भाजपा को 79,172 वोट मिले। भाजपा की जीत का अंतर 12,736 रहा।उस समय 66 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि 2018 के उपचुनाव में कम मतदान प्रतिशत के बावजूद भाजपा को2017 के मुकाबले दस हजार अधिक मत मिले। 2018 में भाजपा को 89,213 वोट हासिल हुए। जबकि विपक्षी दल94,875 वोट हासिल कर पाए। कम मतदान बना मुसीबत आम जनमानस में भी धारणा है कि मतदान प्रतिशत ज्यादा होने पर ही भाजपा प्रत्याशियों को जीत मिलती है। कैरानालोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीटों पर इस बार पिछले चुनाव के मुकाबले कम मतदान हुआ। कैराना लोकसभा सीटपर इस बार केवल 54.17 प्रतिशत मतदान हुआ। वर्ष 2014 में 73.05 प्रतिशत मतदान हुआ था, जबकि बिजनौरजनपद की नूरपुर विधान सभा में इस बार 61 प्रतिशत वोट पड़े, जबकि 2017 में 66.82 प्रतिशत मतदान हुआ था।कम वोट पड़ने के कारण भी भाजपा प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा। ऐसे में अगर 2019 में मतदान प्रतिशतबढ़ गया, तो विपक्षी दलों के पास भाजपा को रोकने का कोई हथियार नहीं बचेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बढ़तीलोकप्रियता ने सपा, बसपा जैसे धुर–विरोधियों को एक मंच पर आने को मजबूर कर दिया। इनके साथ कांग्रेस, रालोदजैसे दल भी मिल गए। 2014 और 2017 के चुनावों में इन दलों को मिली करारी हार और 2019 के चुनावों में अपनीदुर्गति से बचने के लिए सभी दल गठबंधन का दिखावा करने में लगे हैं। बंटवारे से मचेगा बवाल भले ही उपचुनाव जीतकर विपक्षी दल इठला रहे हों, लेकिन 2019 की जंग से पहले यूपी में सीटों के बंटवारे पर उनमेंघमासान मचना तय है। बसपा मुखिया मायावती किसी भी कीमत पर कम सीटों पर समझौता नहीं करेगी। वह खुद कोप्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश कर रही हैं और 60 से कम सीटों पर समझौता नहीं करेगीं। ऐसी ही स्थिति सपाअध्यक्ष अखिलेश यादव की है। वह भी 80 लोकसभा सीटों में से 60 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेंगे। कांग्रेस अध्यक्ष राहुलगांधी ने जिस तरह से खुद को प्रधानमंत्री के दावेदार के रूप में पेश कर दिया है, उससे साफ लगता है कि कांग्रेस भी यूपीमें 20 सीटों की दावेदारी करेंगी। कैराना सीट जीतकर रालोद भी खुद को किंग मेकर मानकर चल रहा है। उसकी निगाहभी 2019 में वेस्ट यूपी की दस लोकसभा सीटों पर होगी। इससे साफ है कि भविष्य में सीटों के बंटवारे को लेकर इनसभी दलों में सियासी घमासान मचना तय है। इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को ही होगा। दूसरे इन सभी दलोंके सामाजिक समीकरण भी गठबंधन में बाधा पैदा करेंगे।

ईवीएम को बदनाम करने की मुहिम

चार लोकसभा और दस विधानसभा उपचुनावों में मतदान के दिन से लेकर उसके बाद तक राजनीतिक दलोंने जिस तरह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन या ईवीएम को खलनायक बनाने की कोशिश की है, वहनिश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है। हालांकि इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। पिछले काफी समय से भाजपाविरोधी दल ईवीएम की शिकायतें करते रहे हैं। उसे हैक करने से लेकर उसमें छेड़छाड़ किए जाने तक का दावा भी करदिया। दुष्प्रचार इतना किया गया कि जो लोग ईवीएम की कार्यप्रणाली को नहीं जानते उन्हेंने भी संदेह हो जाए कि कुछ नकुछ गड़बड़ी अवश्य है। इन उपचुनावों के दौरान इसे जितने जोर–शोर से उठाया गया, उससे लगा कि वाकई ईवीएम मेंइतने व्यापक पैमाने पर यदि गड़बड़ी हुई है, तो फिर इससे लोकसभा चुनाव कराना कैसे संभव होगा? कैराना लोकसभाक्षेत्र में तो सैंकड़ों की संख्या में ईवीएम खराब होने की शिकायत की गई। महाराष्ट्र के गोंदिया भंडारा से भी ऐसी हीशिकायत की जाने लगी। मतदान कितना हो रहा है, किस तरह वहां सुरक्षा व्यवस्था है आदि पर चर्चा ही खत्म। चर्चाकेवल ईवीएम की। टीवी चैनलों पर भी बहस आरंभ और यह रात तक चलती रही। अंत में यह निष्कर्ष दिया गया किकरीब 25 प्रतिशत ईवीएम में कोई न कोई गड़बड़ी हुई और इससे मतदान प्रभावित हुआ। चुनाव आयोग के दिल्ली स्थितमुख्यालय से लेकर राज्य चुनाव आयोगों के दफ्तरों तक नेताओं के प्रतिनिधिमंडल ने ईवीएम की शिकायत की। इसमेंभाजपा का प्रतिनिधिमंडल भी शामिल था। यह शोर अब भी जारी है कि ईवीएम में निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित नहीं हो सकते, इसलिए इसे हटाकर मतपत्रों वालीप्रणाली अपनाई जाए। पहली नजर में ऐसा लगता भी है। अगर वाकई 25 प्रतिशत ईवीएम में गड़बड़ी हुई तो फिर इस परपुनर्विचार करना पड़ेगा। किंतु क्या यही सच है? इसका सीधा उत्तर है, नहीं। मीडिया में मचे हंगामें तथा राजनीतिक दलोंकी शिकायतों के बाद चुनाव आयोग ने तत्काल कोई बयान देने की बजाय पूरी स्थिति की सही जानकारी की प्रतीक्षा की।जो जानकारी आई उससे सारा बावेला व्यर्थ का साबित हुआ। चुनाव आयोग ने 28 मई की शाम को इस संबंध में विस्तृतबयान जारी किया। इसमें कहा गया कि ईवीएम में खराबी और मतदान में बाधा उत्पन्न किए जाने संबंधी मीडिया रिपोर्टोंमें स्थिति को काफी बढ़ा–चढ़ाकर बताया जा रहा है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकसभा या विधानसभा केप्रत्येक चुनाव अथवा उपचुनाव में ईवीएम और वीवीपीएटी मशीनों की 20 से 25 प्रतिशत अतिरिक्त संख्या उपलब्धरहती है जिससे मशीनों के खराब होने की स्थिति में तत्काल अतिरिक्त मशीनें लगाई जा सकें। अतिरिक्त मशीनें सेक्टरअधिकारी की निगरानी में रखी जाती हैं, जिन्हें वह मशीनों के खराब होने पर बदलता है। प्रत्येक सेक्टर अधिकारी केक्षेत्राधिकार में लगभग दर्जन भर मतदान केन्द्रों में मशीनों के रखरखाव की जिम्मेदारी होती है। आयोग ने साफ किया कि25 प्रतिशत मतदान केन्द्रों पर ईवीएम के खराब होने की खबर बिल्कुल गलत है। ⌈ हमारा चुनाव आयोग पूरी तरह निष्पक्ष एवं कुशल है तथा उसके मातहत मतदान के लिए उपयोग की जानी वाली ईवीएम बिल्कुल सुरक्षित। इसके साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ संभव ही नहीं। इसके विरुद्ध केवल अनैतिक दुष्प्रचार है। ⌋ चुनाव आयोग ने जो जानकारी दी उसके अनुसार कुल मिलाकर 10,365 मतदान केन्द्रों पर मतदान हुआ। इस तरह कुल10,365 ईवीएम का प्रयोग हुआ। इनमें से सिर्फ 96 को खराबी की वजह से बदलना पड़ा। यानी यह संख्या एक प्रतिशतसे भी कम है। जिस कैराना में सबसे ज्यादा शिकायत हुई वहां के बारे में मुख्य निर्वाचन अधिकारी एल. वेंकटेश्वर लू नेबताया कि गड़बड़ी ईवीएम में नहीं, बल्कि वीवीपैट में हुई। उन्होंने साफ किया कि कैराना लोकसभा एवं नूरपुर विधानसभाको मिलाकर केवल छह ईवीएम में खराबी आई। यह एक सामान्य स्थिति है। जहां–जहां मतदान में बाधाएं आईं, वहां देरतक मतदान कराया गया। उदाहरण के लिए कैराना उपचुनाव क्षेत्र के ग्राम मुबारकपुर में रात करीब दस बजे तक मतदानहुआ। गंगोह के गांव बिलासपुर के मतदान केन्द्र संख्या 237 व 238 पर पर भी रात दस बजे तक मतदान हुआ। तलसी, हरपाली व छावड़ी समेत आठ मतदान केन्द्रों पर भी रात नौ से दस बजे तक मतदान हुआ। नूरपुर विधानसभा क्षेत्र में भीदो मतदान केन्द्रों पर रात 8 बजे तक वोटिंग हुई। विरोधी दलों ने तो यहां तक आरोप लगाना आरंभ कर दिया कि जिनजगहों पर भाजपा विरोधी मत पड़ने हैं, वहां ईवीएम में खराबी पैदा की गई ताकि मतदान बाधित हो सके। आरोप लगानेवाले अपने संकुचित राजनीतिक स्वार्थ में यह भूल गए कि ऐसा करके वे भाजपा को नहीं चुनाव आयोग जैसी स्वायत्तसंस्था की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर प्रश्न खड़ा कर रहे हैं। राजनीतिक दलों का दायित्व है कि इसे स्वाभाविक रूप से लें। पहले तो केवल ईवीएम से ही चुनाव होता था। 2001 सेचुनाव आयोग इसका उपयोग कर रहा है। 2014 तक इसे लेकर इस तरह का हंगामा नहीं हुआ। जैसे–जैसे विपक्षी दलचुनाव हारने लगे वैसे–वैसे ईवीएम को बदनाम करने का खेल आरंभ हो गया। ये चुनाव आयोग की भाजपा से मिलीभगतका भी आरोप लगाने लगे। ईवीएम जब इंटरनेट से जुड़ा होता ही नहीं, तो फिर इसके हैक किए जाने का प्रश्न कहां सेउठता है। उसमें गड़बड़ी की जा सकती है, यह दावा करने वाले दलों, नेताओं और संगठनों को चुनाव आयोग ने बाजाब्ताचुनौती दी कि आइए और साबित करिए। कोई साबित करने आयोग नहीं गया। क्यों? क्योंकि ये केवल सुनी–सुनाई बातोंपर आरोप लगाते हैं। इनके संदेह को दूर करने के लिए ही चुनाव आयोग ने वीवीपैट की व्यवस्था की। वीवीपैट यानी वोटरवेरीफिएबल पेपर आॅडिट ट्रेल। यह एक ऐसी मशीन है जिसे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के साथ जोड़ा जाता है। मतदानकरने के बाद इससे एक कागज की पर्ची निकलती है। इस पर्ची में जिसे वोट दिया गया हो उस उम्मीदवार का नाम औरचुनाव चिह्न छपा होता है। वीवीपैट में लगी शीशे के स्क्रीन पर यह पर्ची सात सेकंड तक दिखाई देती है। यह मशीन वर्ष2013 में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन आॅफ इंडिया लिमिटेड ने बनाई थी। यह व्यवस्थाइसलिए है कि किसी तरह का विवाद होने पर ईवीएम में पड़े वोट के साथ पर्ची का मिलान किया जा सके। वास्तव में हमें चुनाव आयोग की निष्पक्षता एंव ईमानदारी पर विश्वास करना चाहिए था। वैसी स्थिति में इसकी जरूरतनहीं पड़ती। केवल राजनीतिक दलों के संदेह करने के कारण मतदान पर वीवीपैट के अतिरिक्त खर्च का बोझ पड़ा है।हालांकि जितनी संख्या में वीवीपैट के खराब होने की शिकायतें आईं वो थोड़ी चिंताजनक हैं। लेकिन इसकी अतिरिक्तव्यवस्था पहले से थी, इसलिए तुरंत बदल दिया गया। वैसे अभी तक यह साफ नहीं है कि वाकई मशीनों में खराबी आईया उसके संचालन करने वालों से भूलें हुईं। लेकिन इनकी कुल संख्या भी 384 बताई गई हैं। आयोग ने कहा कि वीवीपैटखराबी की तकनीकी जांच कराई जाएगी। उसके बाद ही पता चलेगा कि इसके वास्तविक कारण क्या थे। वैसे आयोग कामानना है कि मतदान कर्मचारी वीवीपैट मशीनों का ठीक से इस्तेमाल नहीं कर सके। यही कारण सबसे प्रबल नजर आताहै। हां, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि शायद कहीं–कहीं भीषण गर्मी के कारण वीवीपैट में लगे सेंसर ने काम करना बंदकर दिया हो। इस कारण वीवीपैट हैंग हो गई हो।  वैसे चुनाव आयोग ने यह घोषणा कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में2019 के लोकसभा चुनावों में सभी जगह नए वीवीपैट मशीनें लगाई जाएंगी। इसके लिए कंपनी ने निर्माण आरंभ करदिया है। जो भी हो इस तरह के हंगामे का कोई तार्किक और नैतिक कारण नजर नहीं आता है। हर चुनाव में ईवीएम का मामलाउठा दिया जाता है। यह बात अलग है कि जहां भाजपा हारी वहां बाद में विपक्षी दल और मीडिया में उनके समर्थक शांतहो जाते हैं। कर्नाटक चुनाव परिणाम के दौरान जब तक भाजपा बहुमत से आगे थी, हर चैनल पर भाजपा विरोधी पार्टियोंके प्रवक्ता ईवीएम को निशाना बनाने लगे। जैसे ही परिणाम पलटा, भाजपा बहुमत से पीछे हो गई उनका सुर बदलगया। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ईवीएम पर हंगामे का जवाब देते हुए कहा था कि अगर इसमें गड़बड़ी की जासकती तो आज हम सरकार में नहीं होते। यही सच है। वास्तव में ईवीएम को बदनाम करने और उसके माध्यम से चुनावआयोग को कठघरे में खड़ा करने वाली पार्टियां और नेता किसी का भला नहीं कर रहे। इनका पुरजोर विरोध होना चाहिए।हमारा चुनाव आयोग पूरी तरह निष्पक्ष एवं कुशल है तथा उसके मातहत मतदान के लिए उपयोग की जानी वाली ईवीएममशीनें बिल्कुल सुरक्षित। इसके साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ संभव ही नहीं। इसके विरुद्ध केवल अनैतिक दुष्प्रचार है।

ग्रामीण बंगाल पर कब्जे का कातिलाना संग्राम

पंचायत चुनावों में जहां तृणमूल नंबर वन पार्टी बनकर उभरी, वहीं भाजपा ने वाम मोर्चा को पछाड़ते हुए दूसरा स्थान हासिल किया। पश्चिम बंगाल में चुनाव हो और खून–खराबा न हो, यह कतई मुमकिन नहीं है। यहां चुनावी हिंसा का पुराना इतिहास रहाहै। दिलचस्प तथ्य यह है कि बंगाल में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तुलना में स्थानीय निकाय चुनावों मेंअधिक हिंसा होती रही है। इस बार के पंचायत चुनाव में जिस तरह से हिंसा का तांडव मचाया गया उसकी आशंका पहलेसे ही थी। चुनाव की अधिसूचना जारी होने के साथ खून–खराबे का जो सिलसिला शुरू हुआ वह नतीजे आने के बाद तकचलता रहा। चुनावी हिंसा में दो दर्जन से अधिक लोगों की मौत हुई जबकि सैकड़ों घायल हुए। इतने बड़े पैमाने पर हुएखून–खराबे को लेकर विपक्षी पार्टियों के साथ समाज की चिन्ता करने वाले बुद्धिजीवियों ने भी काफी हो–हंगामा किया, लेकिन राज्य सरकार ऐसे अंजान बनी रही जैसे कुछ हुआ ही न हो। सरकार और प्रशासन ने तो हिंसा से जुड़े सच्चाई कोकबूल करने की हिम्मत भी नहीं दिखाई, उल्टे यह जताने की कोशिश करती रही कि इस बार जो हिंसा हुई वह पहले केचुनावों की तुलना में काफी कम थी। पंचायत चुनाव में किसी भी तरह अपना वर्चस्व कायम रखने की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की पिपाशा से विपक्षी पार्टियांपहले से ही आशंकित थी। नामांकन दाखिल करने के दौरान विपक्षी उम्मीदवारों पर हमले की घटनाओं और सरकारीमशीनरी के दुरुपयोग के दर्जनों उदाहरण सामने आने के बाद विपक्षी पार्टियों ने अदालत की शरण ली। मामला सुप्रीमकोर्ट तक जा पहुंचा जिसके चलते चुनाव आयोग को तीन चरणों में चुनाव मतदान करवाने के अपने पूर्व निर्धारितकार्यसूची में फेरबदल करना पड़ा और लंबी कानूनी जद्दोजहद के बाद 14 मई को एक ही चरण में पूरे राज्य में मतदानकरवाया जा सका। हालांकि सत्ता में होने का लाभ उठाते हुए तृणमूल कांग्रेस ने लगभग 34 प्रतिशत सीटें पहले हीनिर्विरोध जीत ली।  कुल 58 हजार 692 में से 20 हजार 76 सीटों पर प्रत्याशियों को निर्विरोध निर्वाचित घोषित करदिया गया। 14 मई को हुए मतदान के दौरान राज्य के प्रत्येक जिले से हिंसा की खबरें आई। इस दौरान बम और बंदूकों से लैसअपराधियों ने बूथ कैप्चरिंग, वोटरों को धमकाने और बैलेट बाक्स उठाने अथवा जलाने की दर्जनों घटनाओं को अंजामदिया। जाहिर तौर पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस हिंसा के केंद्र में रही। तृणमूल समर्थकों ने राज्य भर में जम कर तांडवमचाया। कुछ स्थानों पर अन्य दलों की ओर से उन्हें प्रतिरोध का सामना भी करना पड़ा। 14 मई को दिन भर चलीराज्यव्यापी हिंसा में 18 लोग मारे गये। चुनावी हिंसा में  मारे गये लोगों में विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों तरफ के लोगशामिल थे। राज्य चुनाव आयोग ने मतदान से पूर्व पुख्ता सुरक्षा इंतजाम किये जाने के जो दावे किये थे वे खोखले साबितहुए। कई मतदान केंद्रों पर पुलिस नजर ही नहीं आई। मतदान में हुई व्यापक खून–खराबे से विपक्षी पार्टियां उबल पड़ी। वहीं तृणमूल के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन नेपिछले चुनावों से हिंसा की तुलना करते हुए कहा कि इस बार  जो हिंसक घटनायें हुई हैं वे 1990 की हिंसा तुलना मेंबेहद मामूली हैं। राज्य  के पुलिस महानिदेशक (डीजी) सुरजीत करपुरकायस्थ ने भी सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं के सुर मेंसुर मिलाते हुए बयान दिया कि मतदान के दौरान हुई हिंसा पिछली बार यानी 2013 के पंचायत चुनाव के मुकाबलेकाफी कम रही। उधर मतदान के दिन कलकत्ता हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश ज्योतिर्मय भट्टाचार्य ने चुनावी हिंसा कालाईव फुटेज देखने के बाद  राज्य चुनाव आयुक्त और गृह सचिव को समन जारी किया। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने भीराज्य सरकार से रिपोर्ट तलब किया। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष को फोन करहालात की जानकारी ली। भाजपा ने केंद्रीय गृहमंत्री के अलावा राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी और राज्य चुनाव आयुक्तअमरेन्द्र सिंह से भी सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ शिकायत की। जंगलमहल में भाजपा की सेंध भाजपा ने लंबे समय तक नक्सल आंदोलन से प्रभावित रहे जंगलमहल की तीन-चार जिलों में भी उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया। जंगल महल के आदिवासी...

चुनावी मूड सब पर भारी

आम बजट, आर्थिक सर्वेक्षण और राष्ट्रपति के अभिभाषण जैसे महत्वपूर्ण विषयों के साथ संसद के बजट सत्र के पहले चरण की समाप्ति हो गई। आम बजट, राष्ट्रपति के अभिभाषण और सत्ताधारी एनडीए के दो सबसे प्रमुख नेताओं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के संसद में दिए...

अब रामराज्य रथयात्रा!

रामराज्य रथयात्रा छह राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु से होकर गुजरेगी और 41 दिनों का सफर तय कर रामनवमी के दिन तमिलनाडु के रामेश्वरम पहुंचेगी। रामेश्वरम से होती हुई यात्रा उसी दिन तिरुवनंतपुरम पहुंचेगी। यहां स्थित सुप्रसिद्ध पद्मनाभ मंदिर के सामने रामराज्य सम्मेलन के...

कहां से मिलता है दलों को धन?

चु नाव में पारदर्शिता लाने के लिए आईसीएआई का यह दिशा निर्देश  है कि राजनीतिक दलों के आॅडिट रिपोर्ट की इन्कम टैक्स डिपार्टमेंट द्वारा छानबीन की जानी चाहिए किन्तु इसका पालन नहीं होता है। लोकतंत्र के उत्सव चुनाव                  में पारदर्शिता और पार्टियों...

औंधे मुंह गिरे चुनाव विरोधी तंत्र

किसी भी लोकतंत्र में संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों को कोई भी संगठन छीन नहीं सकता है। किसी भी लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व चुनाव होता है। नगालैंड में लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व पर कुछ संगठनों द्वारा ग्रहण लगाने की कोशिश की गई। लेकिन संविधान और लोकतंत्र की...

विकास विरोधी होने की तोहमत

पहाड़ी राज्य मेघालय में पांच वर्ष बाद फिर से विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। राज्य की सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस एक बार फिर मतदाताओं से पांच वर्ष के लिए जनमत मांग रही है। गत 15 वर्षों से सत्ता पर बैठी कांग्रेस के कामकाज को लेकर जनता में भारी...

साम्यवाद के नाम पर जातिवाद

साम्यवाद के नाम पर जातिवाद के खेल ने त्रिपुरा के मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की सरकार के मुखौटे को हटाकर उसकी असलियत को बेनकाब कर दिया है। चालू माह की 17 तारीख को होने जा रहे विधानसभा चुनाव में यूं तो विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला बड़े...