मनोज मोहन

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एक मर्मस्पर्शी उपन्यास

अ रुंधति रॉय भारतीय बौद्धिक जगत में सक्रियता का एक स्थायी भाव है। 1997 में अपने पहले ही उपन्यास 'गॉड आॅफ स्माल थिंग्स' के लिए उन्हें बुकर जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला। इसके बाद वे सामाजिक जनआंदोलनों में ज़्यादा सक्रिय रहीं। अब अपने पहले उपन्यास के इक्कीस साल बाद 'द...

पर्यावरण खतरे में…

महात्मा गांधी ने अपनी आवश्यकताओं को घटाकर आम आदमी के जीवन-स्तर पर ही जीने का अभ्यास साधा था। लोगों को संसाधनों के विवेकशील उपयोग और अपव्यय की प्रवृत्ति से बचने को कहा था। आज हम महात्मा के विचारों से कोसों दूर हटते हुए जीवन के हर क्षेत्र में उपभोगवाद...

परंपरावादी आलोचना

हिंदी के साहित्यिक वृत्त में डॉ. उदय प्रताप सिंह की छवि समीक्षक, निबंधकार, संस्कृतिकर्मी और भक्ति साहित्य के आधिकारिक विद्वान की रही है। उनका चिंतन स्वामी रामानंद के बारह शिष्यों के साहित्य में सामाजिक समरसता के तत्व का वर्तमान समय में उपयोग पर आधारित रहा है। उनकी किताब आलोचना...

भारतीय संस्कृति की एकरूपता

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा की त्रैमासिक पत्रिका बहुवचन का ताजा अंक मराठी साहित्य विशेषांक है। संपादन के आतिथेय का गुरुतर भार दामोदर खड़से ने उठाया है। इस अंक के लिए उन्होंने मराठी साहित्य का हिंदी में अनुवाद उपलब्ध कराया। इसके लिए हिंदी समाज को उनका ऋणी होना चाहिए।...

बचा हुआ गांव

श्री भगवान सिंह की ख्याति एक गांधीवादी विचारक की है। साहित्य और राजनीति को गांधीवादी नजरिये के विश्लेषण स्वरूप उनके लगभग दस आलोचना ग्रंथ हैं। उन्होंने नाटक भी लिखा है। यहां समीक्षित पुस्तक 'गांव मेरा देस' को पढ़ते हुए प्रश्नों का उठना लाजिमी है कि आजादी के बाद बढ़ते...

अपने समय से मुखातिब

प श्चिम में साक्षात्कार एक गंभीर विधा के रूप में स्वीकृत है जबकि हमारे यहां मित्र-संलाप की तरह रहा है। कृष्णा सोबती से अलग-अलग आयु के लेखकों, पत्रकारोंऔर विचारकों द्वारा लिए गए साक्षात्कारों का संग्रह लेखक काजनतंत्र इससे अलग हटकर है। पिछले दो दशकों के बीच लिए गए उनके...

सीधी सच्ची बातें

र वींद्र किशोर सिन्हा का पहला परिचय एक पत्रकार के तौर पर ही दिया जा सकता है। उसके बाद ही वे उद्योगपति हैं और सजग एवं सचेत राजनीतिज्ञ। उनकी पत्रकारिता का मूलाधार शुरू से ही राष्ट्रीयता का भाव रहा है। 'समय का सच' में उनके लिखे छियासठ लेखों को...

समय पर एक दृष्टि

अशोक  वाजपेयी हिंदी के एक ऐसे बुद्धिजीवी हैं, जो अपने अच्छे विचारों के लिए आलोचकों और समालोचकों के बीच चर्चा में बने रहते हैं। वे वैचारिक विचलन के कभी शिकार न हुए। साथ ही वे अपने विचारों के दोनों अतियों से अपने को अलग कर रखते हुए उन छोरों...

ग्रामीण बाबा: नागार्जुन कवि

‘नागार्जुन दिल्ली में’ संस्मरणों की एक दिलचस्प किताब है। जवाहरलाल नेहरू, विश्वविद्यालय के शोधार्थी जाहिदुल दीवान ने इसका संपादन किया है। इस पुस्तक की विशेषता यह है कि पूर्व प्रकाशित सामग्री से बचा गया है। बाबा नागार्जुन के दिल्ली से जुड़े टटके संस्मरणों को जुटाने के लिए जाहिदुल ने...

अनुभव के स्पंदन से रचे नोट्स

अरविंद दास एक संवेदनशील पत्रकार हैं। ‘बेखुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्स’ उनकी पहली किताब है। इसे बेहद सुरुचि के साथ अनुज्ञा बुक्स ने प्रकाशित किया है। इस किताब में दर्ज हैं समाज, प्रकृति, लोकरंग, कला-साहित्य और यात्राओं आदि में जीवन के स्पंदन जिन्हें वे अपनी जीवन...