कृष्णा सोबती के साक्षात्कारों के संग्रह ‘लेखक का जनतंत्र’ एक ऐसी ही किताब है। इसमें दर्ज संस्मरणों और विचारों को पढ़ते हुए पाठक इतिहास के प्रति सिर्फ सहृदय ही नहीं होता बल्कि वह भारतीय संस्कृति के घनत्व वजहों को भी समझ पाता है। इसी तरह समाजशास्त्री और पत्रकार रामशरण जोशी की आत्मकथा ‘मैं बोनसाई अपने समय का’ इस साल की चर्चित किताब है। इसमें उन्होंने अपने आपको कहीं बचाया नहीं है। बल्कि किताब में आजादी के बाद के इतिहास और राजनीति को खुली आंखों से देखा गया है। लेखक कृष्ण बलदेव वैद की डायरी ‘अब्र क्या चीज है? हवा क्या है?’ को पढ़ते हुए न केवल एक बड़े लेखक के बड़े रचना संसार का पता मिलता, बल्कि यह भी पता चलता है कि वह अपनी साधारणता में भी कितना असाधारण होता है।

बीतते हुए वर्ष में छपी किताबों का लेखा-जोखा करना एक मुश्किल भरा काम होता है। तमाम विधाओं में अनगनित किताबें वर्ष भर आती रहती हैं। इनमें कुछ को पढ़कर व्यक्ति का ज्ञान समृद्ध होता है, तो कुछ को पढ़कर उसे दीन-दुनिया में सही राह चलने-देखने का संतोष भी होता है। इस क्रम में प्रमुख किताबों की चर्चा करने की कोशिश यहां की गई है।

राधावल्लभ त्रिपाठी संस्कृत के प्रकांड विद्वान हैं। वे वेद, पुराण, आगम और तंत्र को हिंदू धर्म का मूलाधार मानते हैं। इन्हीं ग्रंथों को प्रतिमान मानते हुए ‘हमारे देवी-देवता’ किताब को चार खंडों में बांटकर सामाजिक रूढि़यों और किंवदंतियों पर विराम चिह्न प्रस्तुत करते हैं। शशि थरूर ‘अंधकार काल: भारत में ब्रिटिश साम्राज्य’ के बाद ‘मैं हिंदू क्यों हूं’ पुस्तक में हिंदू धर्म को एक ऐसे धर्म के रूप में देखते हैं, जो अपने अनुयायियों को जीवन का सच्चा अर्थ खोजने की पूरी स्वतंत्रता देता है। और जो व्यक्ति को समूह के अंग के रूप में न देखकर उसे समूह से ऊपर रखता है। कुंवर नारायण के न रहने के बाद आया उनका दूसरा कहानी संग्रह ‘बेचैन पत्तों का कोरस’ एक अलग ही भाव-बोध की किताब है। संग्रह की कहानियों में अंतर्वस्तु की विविधता ही नहीं, बल्कि भाषा, संरचना और रूप का वैविध्य भी उत्कृष्टता का प्रमाण लिए हुए है। ‘रेत किनारे का घर’ उदयन वाजपेयी का 1984 से लेकर 2012 तक की प्रकाशित कहानियों का संग्रह है। शशि भूषण द्विवेदी का दूसरा संग्रह ‘ कहीं कुछ नहीं’ लंबे अंतराल के बाद आया। संग्रह की सभी कहानियां भूमंडलीकरण के दौर में बाजार के हत्थे चढ़ गए आम आदमी के जीवन की कहानी है। वहीं प्रेम भारद्वाज का कहानी संग्रह ‘ फोटो अंकल’ पाठकों को उद्वेलित करने में सक्षम है। साल के महत्त्वपूर्ण उपन्यासों में गीतांजलि श्री का ‘रेत समाधि’ का कैनवास काफी बड़ा है। इसके दायरे में भारत-पाकिस्तान का विभाजन भी है। अलका सरावगी ने इक्कीसवीं सदी में एक स्त्री और एक पुरुष के बीच संवाद और आत्मालाप से ‘एक सच्ची-झूठी गाथा’ बुनी है।

जो हमसे बिछड़ गए

  • तीसरे सप्तक के अंतिम कवि केदारनाथ सिंह 19 मार्च 2018 को विदा हो गए। केदारनाथ सिंह हिन्दी
    कविता के स्थायी नागरिक के रूप में अपनी पहचान पुख्ता कर हमसे विदा हुए। यह सौभाग्य है कि
    जिस भाषा के वे कवि हुए, उसी भाषा में शिक्षित होकर अध्यापन कार्य भी किया।
  • बीसवीं सदी में हिंदी कविता में अपनी धुन और आत्महानि की सीमा तक जाकर लिखने वाले कवि
    विष्णु खरे 19 सितंबर को हमें अलविदा कह गये। हिंदी कविता के अलावा आलोचना तथा अन्य
    विधाओं में भी उन्होंने पर्याप्त लिखा। सिनेमा के भी अध्येता रहे विष्णु खरे अपने विरल प्रतिभा के
    लिए याद किए जाएंगे।
  •  वरिष्ठ लेखक और पत्रकार राजकिशोर 71 वर्ष की उम्र में 4 जून 2018 को मस्तिष्क संक्रमण के
    आघात के कारण नहीं रहे। भारत की आजादी वर्ष में जन्मे राजकिशोर आजीवन सामाजिक बदलाव
    के पक्षधर बने रहे। आज के प्रश्न श्रृंखला की बीसियों पुस्तकों का

हिन्द युग्म ने मीरा कांत के उपन्यास ‘हम आवाज दिल्लियां’ प्रकाशित किया है। इस उपन्यास की डोर इतिहास और कल्पना के दो छोरों के बीच 1826 से लेकर 1927, लगभग सौ वर्ष की दूरी तक नापती है। सुधीश पचौरी का ‘मिस काउ: ए लव स्टोरी’ उपन्यास एक नया एडवेंचर है। मृणाल पांडे का उपन् यास ‘सहेला रे’ शास्त्रीय संगीत की छीजती परंपरा का विस्तार से वर्णन करता है, वहीं गीताश्री ने ‘हसीनाबाद’ में नायिका को आम्रपाली के बरअक्स खड़ा करने की कोशिश की है। छात्र-युवा राजनीति पर केंद्रित ‘अशोक राजपथ’ अवधेश प्रीत का पहला उपन्यास है। यह उपन्यास बिहार के उस राजनीतिक दौर को कलमबंद करता है, जिस समय बिहार में आरक्षण की राजनीति चरम पर थी। स्वतंत्रता के बाद जिन कुछ हिंदी कवियों ने अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिष्ठा पायी और विश्व की अनेक भाषाओं में जिनकी कविताओं के अनुवाद हुए उनमें कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह प्रमुख हैं। इन दोनों का मृत्योपरांत अंतिम संग्रह ‘सब इतना असमाप्त’ और ‘मतदान केंद्र में झपकी’ को राजकमल प्रकाशन ने बेहद सुरुचि के साथ छापा है। जाबिर हुसेन समाज की विसंगतियों को लेकर लगातार संवेदनशील कविताएं लिख रहे हैं। वे कविता के फार्म को लेकर बेहद सजग कवि हैं। ‘ओक में बूँदें’ राजकमल से और ‘कातर आँखों ने देखा’ और ‘आधे चाँद के नौहा को दोआबा प्रकाशन ने छापा है। हिन्दी में अब पर्यावरण और गैर साहित्येतर विषयों पर भी अच्छी किताबें आन लगी हैं। सोपान जोशी पर्यावरण को लेकर काम कर रहे हैं। अपनी पहली किताब ‘जल थल मल’ में उन्होंने वेस्ट मैनजमेंट के वैज्ञानिक, आर्थिक और समाजशास्त्रीय पहलुओं पर अलग से रोशनी डाली है। सस्ता साहित्य मंडल से आई अभय कुमार दुबे की पुस्तक ‘साहित्य में अनामंत्रित’ में उनके पंद्रह ऐसे लेख शामिल हैं जिनमें हिंदी के साहित्येतिहास की समस्याओं से लेकर साहित्य की दुनिया में विचारधारा, राजनीति और प्रतिबद्धता के नाम पर होने वाले बौद्धिक संघर्षों की विस्तृत मीमांसा की गयी है। दूसरी तरफ समाज वैज्ञानिक सतेंद्र कुमार ने ‘बदलता गांव बदलता देहात’ में पिछले तीन दशकों में गांव के बदलने या न बदलने की समाजशास्त्रीय जांच-पड़ताल की है। सीरज सक्सेना की कला संबंधी छोटी-छोटी टीपों का संग्रह है ‘आकाश एक ताल है।’ सीरज चित्रकार हैं लेकिन उनकी ख्याति दिनोंदिन एक शिल्पकार के रूप में बढ़ती जा रही है। अशोक कुमार पांडेय की ‘कश्मीरनामा’ जैसी महत्वपूर्ण किताब का आना और चर्चित होना, इस किताब की महत्ता को बताती है। हिंदी के शायद वे पहले कवि हैं जिन्होंने परंपरागत साहित्यिक विधाओं से अलग लिखकर अपनी उपस्थिति का अहसास कराया है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here