त्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले में बेतवा नदी किनारे ग्यारहवीं सदी का शिव मंदिर आज भी अपनी भव्यता और अलौकिक शक्ति के लिये पूरे क्षेत्र में विख्यात है। इस मंदिर के अलावा कई प्राचीन मंदिरों में बेश कीमती मूर्तियां विराजमान हैं। किसी जमाने में यह क्षेत्र अंग्रेजों का व्यापारिक केन्द्र रहा है। जिले के सरीला तहसील क्षेत्र में जलालपुर क्षेत्र ग्यारहवीं सदी में जलाल खां नाम के एक फकीर ने बसाया था। उनकी मजार आज भी बेतवा नदी किनारे महफूज है। भारत में जब व्यापार की शुरुआत हुयी थी तब अंग्रेजी हुकूमत में जलालपुर क्षेत्र व्यापारिक केन्द्र बना था। उस समय व्यापार भी केवल नदियों के रास्ते से ही होता था। जलालपुर क्षेत्र में बने मंदिर और महलों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय यहां के रहने वाले कितने अमीर रहे होंगे।

ऐतिहासिक मंदिर और महल इतने विशाल हैं कि उनके ऊपर नहाने के लिये तालाब भी बने हैं जो अब विलुप्त होने के मुहाने पर आ चुके हैं। यहां बड़ी संख्या में शिव मंदिर भी बने हैं। जिनकी बनावट और कारीगरी काशी के मंदिर से मिलती है। मंदिरों के घाट भी काशी के घाट की तरह दिखते हैं। मगर अब यहां की धरोहर और मंदिरों पर संकट के बादल मंडरा रहा हैं। बेतवा नदी की जलधारा रोककर मोरंग माफियाओं के मशीनों से खनन किये जाने के कारण अब इन मंदिरों में दरारें भी पड़ गयी हैं। क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी झांसी के डा.एसके दुबे ने बताया कि इस मंदिर के बारे में जानकारी मिली है कि यह हजार साल से ज्यादा प्राचीन है। इसके लिये टीम भेजकर सर्वे कराया जायेगा। सर्वे के बाद यहां की ऐतिहासिक धरोहरों को पुरातत्व में सम्मिलित करने के लिये कार्यवाही की जायेगी।

उस समय व्यापार भी केवल नदियों के रास्ते से ही होता था। जलालपुर क्षेत्र में बने मंदिर और महलों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय यहां के रहने वाले कितने अमीर रहे होंगे।

51 भव्य शिवमंदिर

जलालपुर गांव के प्रधान अरुण कुमार द्विवेदी ने बताया कि प्रशासन और शासन की अनदेखी के कारण अमीरों का यह शहर अब खंडहर में तब्दील होने के कगार पर आ गया है। बनारस (काशी के बाद यदि कहीं इतने भव्य शिवमंदिर हैं तो वह इसी क्षेत्र में है। प्रधान के मुताबिक जलालपुर क्षेत्र बेतवा नदी किनारे बसा है। करीब ढाई सौ साल पहले व्यापारी मन्नू अग्रवाल ने इस इलाके को उत्तर प्रदेश की दूसरी काशी बनाने का सपना देखा था। उन्होंने सपने को साकार करने के लिये अद्भुत नक्काशी व दुर्लभ पत्थरों से 51 भव्य शिवमंदिरों का निर्माण कराया था। शुरू में देश के कोने-कोने से लोग यहां मंदिरों की छटा और नक्काशी देखने आते थे मगर मौजूदा, में अब कोई परिंदा पर मारने भी नहीं आता है। जलालपुर को दूसरा काशी बनाने का सपना उनकी मौत के साथ ही मिट्टी में दफन हो गया।

क्षतिग्रस्त हो गये मंदिर

ग्राम प्रधान अरुण कुमार ने बताया कि जलालपुर में सैकड़ों विशालकाय महल खड़े हैं जो आज भी जलालपुर शहर होने के इतिहास की गवाही दे रहे है। तमाम महल ऐसे भी हैं जो बंद पड़े हैं जबकि महलों के दरवाजे चारो तरफ से चुनवा दिये गये हैं। खजाने के चक्कर में रात में लोगों ने मंदिरों और महलों की खुदाई तक करवा डाली जिससे अनेक धरोहर खंडहर में तब्दील हो गयी है। बदमाशों ने भी कई बार बेशकीमती भगवान की मूर्तियां व शिवालिंगों को निशाना बनाया है। प्रधान ने बताया कि क्षेत्र के मंदिरों व महलों में अटूट खजाना है जिसकी लालच में लोग खुदाई भी कर चुके हैं। जब कभी कहीं खुदाई होती है तो कुछ न कुछ धन लोगों को मिलता है। जलालपुर क्षेत्र के भेड़ी डांडा गांव निवासी लक्ष्मीनारायण मिश्रा ने बताया कि जलालपुर में बेतवा नदी किनारे स्थित हजार साल से भी ज्यादा प्राचीन पक्का घाट पर बने शिवमंदिर व हनुमान मंदिर में हर साल चमत्कार होता है। बाढ़ के समय बेतवा नदी में आधा मंदिर डूब जाता है लेकिन बाढ़ के बाद बेतवा का जलस्तर नीचे जाता है तब मंदिर के आसपास सोने और चांदी के सिक्के लोगों को मिलते हैं। उनका कहना है कि पिछली बार बाढ़ के बाद उन्हें नदी किनारे एक सोने के सिक्का मिला था। वर्ष 1978 व 1983 में बेतवा नदी में भयंकर बाढ़ आयी थी तब शिवमंदिर व हनुमान जी का मंदिर पूरा डूब गया था इसके बाद भी दोनों मंदिर सही सलामत रहे जबकि जलालपुर में भारी तबाही मची थी। इस मंदिर के दर्शन करने से लोगों की मुरादें भी पूरी होती है।

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