एक बार फिर केरल के उच्च न्यायालय ने सबरीमाला मंदिर की परंपराओं की रक्षा का आदेश दिया है। श्री अयप्पा के भक्तों की ओर से दायर याचिकाओं की सुनवाई करते हुए केरल उच्च न्यायालय ने 19 नवंबर को केरल सरकार को लगभग फटकारते हुए कहा कि वह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन करने की आड़ में श्री अयप्पा के भक्तों पर अत्याचार नहीं कर सकती और उन्हें उनके उचित धार्मिक अधिकारों से वंचित नहीं कर सकती। केरल उच्च न्यायालय ने आरंभ से ही सबरीमाला मंदिर की परंपराओं की रक्षा के पक्ष में अपना अभिमत दिया है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने सबरीमाला की परंपराओं की अनदेखी करके 28 सितंबर को अपना निर्णय सुनाया था और उसमें 10 से 50 वर्ष की स्त्रियों के प्रवेश को हरी झंडी दे दी थी। लेकिन पुलिस की तमाम ज्यादतियों और मार्क्सवादी सरकार के सर्वोच्च न्यायालय का फैसला लागू करने के राजनीतिक संकल्प के बावजूद पिछले सात सप्ताह में वह किसी ऐसी महिला को श्री अयप्पा के दर्शन नहीं करवा पाई, जो 10 से 50 वर्ष के वय की हो। सबरीमाला आंदोलन के राजनीतिक और कानूनी पहलुओं पर अब तक काफी बहस हुई है। सबरीमाला मंदिर में दस से पचास वर्ष की स्त्रियों के प्रवेश को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, वह कुछ सभ्यतागत प्रश्न भी पैदा करता है।

पहला प्रश्न हमारी राजनीतिक व्यवस्था विशेषकर डेमोक्रेसी की अवधारणा को लेकर पैदा होता है और दूसरा प्रश्न विधि के स्वरूप को लेकर। हमने देश में जो व्यवस्था लागू की है, वह पश्चिमी धारणाओं पर आधारित है। पश्चिम में डेमोक्रेसी का अर्थ जनता का शासन है, पर केरल में जो कुछ हो रहा है, उसे देखें, तो क्या वहां की सरकार जनता की इच्छा के अनुरूप चलती दिखाई देती है? केरल में मार्क्सवादी सरकार है। मार्क्सवादी न लोकतंत्र में निष्ठा रखते हैं न धर्म में। डेमोक्रेसी में भाग लेना उनका एक रणनीतिक नर्णय है। वह उसका उपयोग कम्युनिस्ट पार्टी का एकतंत्रीय शासन लाने के लिए करना चाहते हैं। भारत में यह संभव दिखाई नहीं देता। इसलिए मार्क्सवादी राजनीतिक रूप से सिकुड़ते जा रहे हैं। डेमोक्रेसी अगर जनता का शासन है, तो उसे जनभावनाओं के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए। लेकिन केरल के मार्क्सवादी मानते हैं कि वे जनभावनाओं से नहीं, अपने राजनीतिक विचार से बंधे हैं।

उनका राजनीतिक विचार उन्हें धर्मतंत्र के विरुद्ध खड़ा होने की प्रेरणा देता है। उसी के आधार पर उन्होंने केरल के सभी मंदिरों के देवस्थान बोर्डो पर नियंत्रण किया और उनमें अपनी पार्टी के उन लोगों को भर दिया जो घोषित रूप से नास्तिक हैं। सबरीमाला मंदिर का देवस्थानम बोर्ड भी मार्क्सवादियों द्वारा ही नियंत्रित है। क्या डेमोक्रेसी में सरकार को यह अधिकार है कि वह जनभावनाओं और सांस्थानिक मर्यादाओं की उपेक्षा करके केवल वैचारिक आधार पर विभिन्न संस्थाओं को नियंत्रित करे? यह प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि सबरीमाला केरल का बहुत लोकप्रिय देवस्थान है। भारत में परम सत्ता निर्गुण निराकार होते हुए भी देशकाल के अनुरूप विभिन्न सगुण रूपों में ग्रहण की जाती है। इस आधार पर सभी देव शक्तियां परमात्मा का स्वरूप होते हुए भी देशकाल के अनुसार अलगअलग विशेषता लिए हुए हैं। इसी के आधार पर भारतीय सभ्यता का निरूपण होता रहा है।

सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की स्त्रियों के प्रवेश को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, वह कुछ सभ्यतागत प्रश्न भी पैदा करता है। पहला प्रश्न हमारी राजनीतिक व्यवस्था विशेषकर डेमोक्रेसी की अवधारणा को लेकर पैदा होता है और दूसरा प्रश्न विधि के स्वरूप को लेकर।

इसलिए उसने कुछ एनजीओ से जुड़ी महिलाओं से यह विवाद उठवाया कि यह नियम महिलाओं की समानता के अधिकार का उल्लंघन है। यह प्रश्न केरल उच्च न्यायालय में गया। उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि सबरीमाला मंदिर की परंपराओं का ही पालन किया जाना चाहिए। उसके बाद यह विवाद सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। सर्वोच्च न्यायालय ने उसे स्त्री-पुरुष के बीच समानता के अधिकार के रूप में देखा जाना स्वीकार किया और इस नियम को निरस्त कर दिया। केरल सरकार ने उसका सहारा लेकर मंदिर में राज्य के बाहर की कुछ आंदोलनकारी स्त्रियों को प्रवेश दिलाने की कोशिश की, लेकिन वह सफल नहीं हुई।

उसने सबरीमाला की मर्यादा की रक्षा के लिए उमड़े लोगों पर निर्ममता से कार्रवाई की। मामला फिर उच्च न्यायालय गया और उसने सरकार को फटकारते हुए कहा कि उसका व्यवहार ठीक नहीं है। केरल सरकार ने सबरीमाला की परंपराओं की रक्षा के लिए जुटने वाले लोगों को हतोत्साहित करने के लिए न केवल अतिशय बल प्रयोग किया, उन पर लाठी चलवाई, बल्कि बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां भी की गई। जब इससे भी बात नहीं बनी, तो उसने मंदिर से जुड़ी सन्निधि में पानी भरवाकर वहां लोगों के रात में रुकने को असंभव बनवा दिया।

इससे नैयाभिषेक के लिए वहां आने वाले भक्तों के दर्शन के अधिकार का हनन हुआ। इस अभिषेक में भगवान अयप्पा के विग्रह का घी से अभिषेक किया जाता है। इन्हीं सबको लेकर केरल उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने सरकार को फटकार लगाई है। दूसरी तरफ केरल की मार्क्सवादी सरकार द्वारा नियंत्रित त्रावणकोर देवस्थानम बोर्ड को दोबारा सर्वोच्च न्यायालय के पास जाकर यह आवेदन देना पड़ा है कि केरल की परिस्थितियों को देखते हुए वह अपने आदेश को लागू करने के लिए समय की कुछ और छूट दे दे। ऐसी किसी छूट का अर्थ होगा सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को अव्यवहार्य स्वीकार कर लिया जाना।

क्योंकि अगली सरकार गैर-मार्क्सवादी हुई तो वह सर्वोच्च न्यायालय से कहेगी कि उसके निर्णय को लागू नहीं किया जा सकता। इस समय केरल की दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस और नई उभरती राजनीतिक शक्ति बीजेपी दोनों सबरीमाला की परंपराओं की रक्षा किए जाने के पक्ष में हैं। इसी से यह प्रश्न खड़ा होता है कि जो राजनीतिक प्रणाली हमने चुनी है, वह विचारों की जगह जनभावनाओं से चले, इसके लिए कौन से प्रबंध आवश्यक है। यही उसे डेमोक्रेसी से लोकतंत्र बना सकता है। दूसरा प्रश्न विधि के स्वरूप को लेकर उठता है।

भारत में धर्म को कभी सांस्थानिक स्वरूप देने की कोशिश नहीं हुई। धर्म का अर्थ धारण करने वाला किया गया है। धर्म सब व्यवस्थाओं के मूल में है। उसी के आधार पर सभी तरह की विधियों का निर्माण होना चाहिए। राज्य भी धर्म के अनुरूप व्यवहार करने के लिए बाध्य है और लोक भी। धर्म का स्वरूप देशकाल में ही निर्धारित होता है और शुद्ध मन से कोई भी धर्म के स्वरूप को पहचान सकता है। उसके आधार पर बनाई गई विधियों के लिए यह आवश्यक किया गया कि उन्हें पूरे समाज की स्वीकृति होनी चाहिए।

पश्चिम में जहां से हमने अपनी अभी की व्यवथाएं ली है, जीवन को दो भागों में बांटकर देखा जाता रहा है। जीवन का एक भाग लौकिक है और उसके बारे में विधि बनाने का अधिकार राज्य का है। दूसरा भाग पारलौकिक है और उसके बारे में विधि बनाने का अधिकार चर्च या उसकी जैसी संस्थाओं का है। यूरोपीय इतिहास में राज्य और चर्च के अधिकार क्षेत्र को लेकर निरंतर संघर्ष होते रहे हैं। आधुनिक काल में जीवन का यह विभाजन तो स्वीकार कर लिया गया, लेकिन सार्वजनिक जीवन को चलाने वाली विधियों के लिए कुछ नए विचार ग्रहण हुए।

उन्हीं में से एक स्त्री-पुरुष की समानता का विचार है। लेकिन उसे लेकर भी अनेक मर्यादाओं का ध्यान रखा जाता है। कोई यह मांग नहीं करता कि कैथलिक चर्च में पोप के पद पर कोई स्त्री होनी चाहिए। आधुनिक विचारों का मूल राजनीतिक है और स्त्री-पुरुष की बराबरी उसी क्षेत्र में देखी जाती रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 28 सितंबर के आदेश में एक राजनीतिक विचार को धार्मिक क्षेत्र पर लागू करने की कोशिश की। पर ऐसा न लगे कि वह धार्मिक क्षेत्र का अतिक्रमण कर रहा है, इसलिए अपने बहुमत से दिए गए आदेश में उसने तर्क दिया कि हिन्दू धर्म के मूल सिद्धांतों में स्त्री-पुरुष के बीच भेद दिखाई नहीं देता। लेकिन एक मंदिर में देवता के स्वरूप के आधार पर उस मंदिर के विधि-विधान निर्धारित होते हैं, इस बात पर सर्वोच्च न्यायालय के मान्य न्यायाधीशों ने विचार करने की आवश्यकता ही नहीं समझी। उन्होंने माना कि सबरीमाला का यह नियम एक अनावश्यक रूढि़ है और उसे हटाकर वे समाज सुधार का कोई बड़ा काम कर रहे हैं।

लेकिन ऐसा करके वे समाज सुधार करने के बजाय हिन्दू समाज का चर्च जैसा सांस्थानिक कायाकल्प किए दे रहे हैं। इस बात की तरफ खंडपीठ की एकमात्र महिला न्यायाधीश इंदू मल्होत्रा ने ही ध्यान आकर्षित किया। लेकिन खंडपीठ के अन्य न्यायाधीश उनसे सहमत नहीं हुए और उन्होंने अपना निर्णय सुना दिया। यह समस्या सर्वोच्च न्यायालय की ही नहीं, हमारे पूरे आधुनिक तंत्र की है। हम व्यवस्था बनाते हुए या विवादों का निपटारा करते हुए यह देखने की कोशिश नहीं करते कि उनके बारे में हमारी सभ्यता दृष्टि क्या है। हम केवल पश्चिमी विचारों का अंधानुकरण करते चले जाते हैं।

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