भाषा तोड़ती नहीं जोड़ती है

01 Apr 2025 15:49:42

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दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में इन दिनों भाषा विवाद पर बहस हो रही है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और उनके पुत्र एवं उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन हिंदी विरोध के नाम पर इसे हवा दे रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित केंद्र सरकार के कई महत्वपूर्ण मंत्रियों ने आधिकारिक रूप से कहा है कि तमिलों जैसी प्राचीन संस्कृतियों पर पूरे देश को गर्व है। इसे न तो दबाया जा सकता है और न ही इनकी पहचान खत्म की जा सकती है। लेकिन स्टालिन (पिता-पुत्र) हिंदी विरोध के बहाने अपने राजनीतिक एजेंडे को मजबूत करना चाहते हैं। स्टालिन इस दिवास्वप्न में हैं कि हिंदी विरोध की अगुवाई करके वह पूरे दक्षिण भारत का राजनीतिक चेहरा बन सकते हैं। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव है। स्टालिन उत्तर और दक्षिण भारत का विवाद पैदा करके अपनी जीत सुनिश्चित कर लेना चाहते हैं। शायद इसीलिए कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री स्टालिन का हिंदी विरोध, तमिल प्रेम नहीं, बल्कि राजनीतिक एजेंडा है।
 इस बार तमिलनाडु में हिंदी का विरोध राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 में शामिल त्रि-भाषा सूत्र के कारण बताया जाता है। लेकिन नई शिक्षा नीति को हिंदी विरोध का सिर्फ हथियार बनाया गया है। इसका कारण यह है कि नई शिक्षा नीति 2020 में आई थी। वर्ष 2021 में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव हुआ था। उस चुनाव में नई शिक्षा नीति का त्रि-भाषा सूत्र मुद्दा नहीं था। आगामी चुनाव में स्टालिन को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है। शायद इसीलिए वह हिंदी विरोध जैसे भावनात्मक मुद्दे को हवा दे रहे हैं। मुख्यमंत्री स्टालिन आएदिन हिंदी विरोध में बयान दे रहे हैं और अपने हर कार्यक्रम में इस मुद्दे को उठा रहे हैं। उनकी पार्टी (डीएमके) के कार्यकर्ता हिंदी के पोस्टर फाड़ रहे हैं। सड़कों पर विरोध प्रदर्शन जारी है। यहां सवाल यह उठता है कि आखिर इतने वर्षों बाद इसका विरोध क्यों शुरू हुआ है? हालांकि, तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने राज्य में नई शिक्षा नीति लागू नहीं की है। इसे लेकर कुछ लोग उच्चतम न्यायालय भी गए हैं। अभी वहां सुनवाई हो रही है। लेकिन मुख्यमंत्री स्टालिन इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और भाजपा को घेर रहे हैं।
केंद्र सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री इस मामले पर कई बार स्पष्टीकरण दे चुके हैं। पिछले महीने 98वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इशारों-इशारों में इसका जवाब दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारतीय भाषाओं के बीच कभी कोई दुश्मनी नहीं रही है। भाषाओं ने हमेशा एक-दूसरे को प्रभावित और समृद्ध किया है। अक्सर जब भाषा के आधार पर विभाजन पैदा करने की कोशिश की गई, तो भारत की साझा भाषाई विरासत ने इसका माकूल जवाब दिया है। क्या एनईपी-2020 में हिंदी थोपी जा रही है? केंद्र का कहना है कि नई शिक्षा नीति किसी भी भाषा को नुकसान पहुंचाए बिना सभी भारतीय भाषाओं को खुले तौर पर प्रसारित होने का मौका देती है। एनईपी-2020 में कहा गया है कि संवैधानिक प्रावधानों, बहुभाषावाद के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए त्रि-भाषा सूत्र को लागू किया जाना चाहिए। इसमें किसी भी राज्य पर कोई भाषा विशेष थोपी नहीं जाएगी। न ही उसके लिए केंद्र की ओर से कोई दबाव बनाया जाएगा।

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त्रि-भाषा सूत्र स्पष्ट रूप से राज्य और छात्रों पर छोड़ा गया है। एनईपी-2020 त्रि-भाषा सूत्र पर कोई विवाद न हो या कोई अस्पष्टता न रह जाए, इसलिए इसमें आगे कहा गया है कि बच्चों (छात्रों) द्वारा सीखी जाने वाली तीन भाषाएं राज्यों, क्षेत्रों और पूरी तरह से उनकी पसंद की होंगी। किसी और की न तो पसंद होगी और न ही प्राथमिकता रहेगी। हां, इसमें इतनी शर्त जरूर रखी गई है कि तीन भाषाओं में से कम से कम दो भाषाएं भारत की मूल भाषा हों। अर्थात यदि तमिलनाडु के संदर्भ में बात की जाए तो वहां के बच्चे अपनी मातृभाषा तमिल के साथ दक्षिण भारत की कोई अन्य (मलयालम, तेलुगु, कन्नड़ आदि) भाषा सीख सकते हैं। उसी प्रकार केरल के बच्चे अपनी मातृभाषा मलयालम के साथ अन्य दक्षिण राज्यों की भाषाएं सीख या पढ़ सकते हैं। इस त्रि-भाषा सूत्र से यह सुनिश्चित होता है कि नई शिक्षा नीति भाषाई विविधता को बढ़ावा देती है। किसी अन्य भाषा को थोपती नहीं है। साथ ही सभी राज्य अपनी भाषा वरीयताओं में स्वायत्तता बनाए रखते हैं।
 
मातृभाषा पर क्यों दिया जोर
केंद्र सरकार का स्पष्ट मानना है कि मातृभाषा से ही बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव है। इससे सभी बच्चों को आसानी से एक समान शिक्षा का अधिकार मिल जाता है। यही बात एनईपी-2020 में भी कही गई है। एनईपी का तर्क है कि मातृभाषा में सीखने से बच्चों की समझ में सुधार होता है। बच्चे नई से नई चीजें आसानी से शीघ्रता से ग्रहण कर लेते हैं। बच्चों के शैक्षणिक प्रदर्शन में तेजी से वृद्धि होती है। राज्यों एवं क्षेत्रों की सांस्कृतिक विरासत संरक्षित होती है। बच्चे अपनी घरेलू या मातृभाषा में अधिक तेजी से सीखते और समझते हैं। यह उस राज्य और देश के लिए लाभकारी होता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूनेस्को भी नई शिक्षा नीति के इस त्रि-भाषा सूत्र का समर्थन करती है। भाषा पर नीति के इस मूल दृष्टिकोण को वह सही मानती है। यूनेस्को ने भाषा को लेकर एक रिपोर्ट तैयार की है। यूनेस्को की रिपोर्ट ‘बहुभाषी दुनिया में शिक्षा’ में कहा गया है कि प्रारंभिक शिक्षा और साक्षरता के लिए मातृभाषा आवश्यक है। मातृभाषा को शिक्षा में यथासंभव अंतिम चरण यानी उच्च शिक्षा तक बढ़ाया जाना चाहिए। यही बात नई शिक्षा नीति में भी कही गई है।
भाषा शिक्षा पर बनी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा भी त्रि-भाषा की मूल अवधारणा का आधार है। वर्ष 2000 के बाद बनी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (एनसीएफ) ने भी लगातार तीन-भाषा सूत्र का समर्थन किया है। मसलन, एनसीएफ 2023 में कहा गया है कि संवैधानिक प्रावधानों, बहुभाषावाद और राष्ट्रीय एकता को ध्यान में रखते हुए त्रि-भाषा सूत्र को लागू करना जारी रखना चाहिए। वहीं, वर्ष 2005 के एनसीएफ में कहा गया है कि भारतीय समाज के बहुभाषी चरित्र को स्कूली जीवन में समृद्ध बनाने के लिए एक संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए। एनसीएफ 2000 में भी त्रि-भाषा सूत्र को ही बढ़ावा दिया गया है। उसमें कहा गया है कि त्रि-भाषा सूत्र राष्ट्रीय सहमति का परिणाम है। इसे बहुभाषावाद और राष्ट्रीय सद्भाव को बढ़ावा देने वाली इसकी सच्ची भावना में लागू किया जाना चाहिए।
जब भी त्रि-भाषा नीति लागू करने की बात आती है तो इसे विवादित कर लोगों की भावनाओं से जोड़ दिया जाता है। इस बार भी ऐसा ही डीएमके नेता एवं मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और उनके बेटे एवं उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन कर रहे हैं। स्टालिन और उदयनिधि त्रि-भाषा सूत्र को हिंदी विरोध से आगे बढ़ाकर उत्तर-दक्षिण भारत के बीच खाई बनाने में लगे हैं। उन्होंने इसे एक जटिल राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ ओपन स्कूल के पूर्व निदेशक डॉ. राजेश कुमार कहते हैं, ‘जब भी केंद्र की तरफ से हिंदी भाषा में काम करने या त्रि-भाषा सूत्र की बात होती है तो दक्षिण के राज्यों को लगता है कि यह हमारी भाषा और संस्कृति पर आक्रमण कर रहे हैं। ऐसे भी यह पुराना और जटिल मुद्दा है। राजनेता इसे आपसी समझदारी से खत्म करने के बजाय भड़काने में लगे रहते हैं।
डीएमके जिस प्रकार इस मुद्दे पर आक्रामक है, भाजपा की तमिलनाडु इकाई ने उसी प्रकार जवाब देने की भी तैयारी कर ली है। पिछले दिनों ही प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अन्नामलाई ने स्टालिन और उदयनिधि को इस मुद्दे पर घेरा। उन्होंने कहा कि ये लोग थ्री लैंग्वेज फॉर्मूले के विरोध में हैं। जबकि इनके बच्चे जिन प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने जाते हैं, वहां थ्री लैंग्वेज पढ़ाई जाती हैं। इनके बच्चों के पास त्रि-भाषा का विकल्प है। वे इसका उपयोग भी करते हैं। जबकि गरीबों के बच्चे सरकारी स्कूल में जाते हैं। वहां दो भाषाएं ही पढ़ाई जाती हैं। आखिर गरीबों के बच्चों को भी त्रि-भाषा का विकल्प क्यों नहीं मिलना चाहिए। तमिलनाडु भाजपा ने डीएमके के इस नैरेटिव को काउंटर करने की रणनीति बनाई है। इसके लिए भाजपा राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के समर्थन और डीएमके के नैरेटिव का जवाब देने के लिए पूरे प्रदेश में हस्ताक्षर अभियान चलाएगी। इसके तहत भाजपा ने राज्य में एक करोड़ लोगों तक पहुंचने की रणनीति बनाई है। भाजपा घर-घर जाकर बताएगी कि कैसे तीसरी भाषा कोई भी भारतीय भाषा हो सकती है। जबकि डीएमके हिंदी को लेकर जानबूझ कर राजनीतिक फायदे के लिए भ्रम फैला रही है।
इस दौरान तमिलनाडु भाजपा के नेता और कार्यकर्ता जनता के बीच रहेंगे और लोगों से संपर्क स्थापित करेंगे। भाजपा का स्पष्ट मानना है कि डीएमके सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए चुनाव के पहले पुराने हिंदी विरोध को फिर से उभारने की कोशिश कर रही है। भाजपा इस मुद्दे पर हस्ताक्षर अभियान के बाद पूरे प्रदेश में रैलियां करेगी। तमिलनाडु भाजपा इकाई के एक नेता ने बताया कि रैली की शुरुआत 23 मार्च को तिरुचिरापल्ली से होगी। 11 मई को कोयम्बटूर में इस मुद्दे पर आखिरी रैली होगी। राष्ट्रीय स्तर पर इन सभी रिपोटर््स के बावजूद दक्षिण भारत के कुछ राज्यों ने इसका विरोध किया है। तमिलनाडु में भाषा विवाद कोई नया नहीं है। इसकी जड़ें स्वतंत्रता से पहले की हैं। लेकिन आजादी के बाद 1960 के दशक में तमिलनाडु ने अनिवार्य भाषा के रूप में हिंदी को थोपने का जमकर विरोध किया था। जबकि केंद्र इस नीति का बचाव बहुभाषावाद की दिशा में एक कदम के रूप में करता है। तमिलनाडु का शुरू से तर्क रहा है कि यह गैर-हिंदी भाषी राज्यों पर अनुचित रूप से भाषा दबाव है।
 
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एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (एएसईआर)-2024 के कुछ आंकड़े मुख्यमंत्री एमके स्टालिन सरकार की नाकामी को उजागर करते हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि सरकार राज्य के युवाओं को अपनी मातृभाषा (तमिल) सिखाने में नाकाम रही है। मसलन, सिर्फ 12 प्रतिशत तीसरी कक्षा के बच्चे ही दूसरी कक्षा के स्तर की किताबें पढ़ सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में तमिलनाडु नीचे से दूसरे स्थान पर है। सबसे खराब स्थिति (6.2 प्रतिशत) तेलंगाना की है। बिहार और उत्तर प्रदेश में ये आंकड़े क्रमश: 26.1 और 23 प्रतिशत हैं।
एक अन्य तथ्य, तमिलनाडु में सिर्फ 35.6 प्रतिशत पांचवीं कक्षा के बच्चे दूसरी कक्षा तक की किताबें पढ़ सकते हैं। यहां भी तमिलनाडु नीचे से दूसरे पायदान पर है। तेलंगाना सबसे नीचे है। तमिलनाडु में करीब 35 प्रतिशत आठवीं कक्षा के बच्चे दूसरी कक्षा की पुस्तक नहीं पढ़ पाते। यह पुस्तक तमिल भाषा की है।
 
त्रि-भाषा सूत्र की शुरुआत
त्रि-भाषा सूत्र सबसे पहले शिक्षा आयोग (1964-66) द्वारा प्रस्तावित किया गया था। इसे आधिकारिक तौर पर कोठारी आयोग के रूप में जानते हैं। इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई) 1968 में औपचारिक रूप से अपनाया था। फिर इसे राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल (1986) में भी एनपीई में शामिल किया गया। उनके बाद दक्षिण भारत से पहली बार प्रधानमंत्री बने पीवी नरसिम्हाराव के कार्यकाल (1992) में भी उनकी सरकार द्वारा भाषाई विविधता और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए इसे संशोधित किया गया।
यदि कोठारी आयोग की बात करें तो भौतिक विज्ञानी डॉ. दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता वाले आयोग ने छात्रों को कई चीजें सीखने की सिफारिश की थी। इसके अंतर्गत उन्होंने अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, संघ की आधिकारिक भाषा और उसके साथ एक आधुनिक भारतीय या यूरोपीय भाषा को सीखना जरूरी बताया था। इसके पीछे उनका भी तर्क था कि बहुभाषा से पूरा देश एकता के एक सूत्र में बंधेगा। साथ ही दुनिया की आधुनिकता और विकास को भारत तेजी से ग्रहण कर पाएगा। एनपीई 1968 के मुताबिक, हिंदी भाषी राज्यों को हिंदी और अंग्रेजी के साथ-साथ एक आधुनिक भारतीय भाषा, जिसमें एक दक्षिणी भाषा सिखानी चाहिए। गैर-हिंदी भाषी राज्यों को हिंदी, उनकी क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी को शामिल करना था। इस नीति को एनपीई 1986 और इसके 1992 के संशोधन में सुदृढ़ किया गया। इसका उद्देश्य हिंदी को एक संपर्क भाषा के रूप में राष्ट्रीय सहमति बनाना था। हालांकि, 1992 की नीति में यह भी स्वीकार किया गया कि 1968 की नीति के इस भाग (त्रि-भाषा) का कार्यान्वयन असमान रहा है। यानी ठीक से लागू नहीं हो सका। इसलिए इस नीति को और अधिक बेहतर तरीके से लागू किया जाएगा।
 
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