दार्शनिक कार्ल पॉपर ने कहा है कि जिस समाज को आप मानते हैं, वह आपका है। बाकी का समाज, जो आपके अनुसार नहीं है, वह आपका विरोधी है। चाहे वह किसी देश में रहे। ‘डीप स्टेट’ का दर्शन कहीं न कहीं इसी थ्योरी पर टिका हुआ है। डीप स्टेट भी एक विशेष समूह के हितों की रक्षा के लिए बड़े से बड़े देश की सत्ता को कंट्रोल करती है, जो कंट्रोल नहीं होता, वह उसका दुश्मन हो जाता है। जैसे अभी भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जॉर्ज सोरोस के दुश्मन हैं। जबकि वह तो ‘डीप स्टेट’ के एक छोटे से प्यादे भर हैं।
अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की गहमागहमी थी। ट्रंप और उनके सामने थी कमला हैरिस। प्रचार जोरों पर था। ट्रंप दहाड़ रहे थे और हैरिस उन्हीं के अंदाज में जवाब दे रही थी। फिर अचानक एक ऐसी दुर्घटना घटी, जिसने पूरे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की दिशा बदल दी। 13 जुलाई 2024 को ट्रंप पेनसिल्वेनिया के बटलर में एक आम सभा को संबोधित कर रहे थे। तभी ट्रंप को निशाना बनाकर एक गोली चलती है। हालांकि ट्रंप बाल-बाल बच जाते हैं। यहां इस घटना का जिक्र इसलिए कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश के पूर्व राष्ट्रपति के ऊपर उन्हीं के देश में जानलेवा हमला होता है। और अभी तक अमेरिकी खुफिया विभाग एवं पुलिस यह नही पता कर पाई कि ट्रंप पर हमला किसने कराया? उस हमले के पीछे हाथ किसका था? कहीं ऐसा तो नहीं की हमला कराने वाला अमेरिका से भी ताकतवर है?
अब ट्रंप पर हुए हमले के एक साल पहले चलते हैं। मीडिया समूह एनबीसी की खबर के अनुसार मार्च 2023 में टेक्सास की एक रैली में ट्रंप ने पहली बार कहा था कि सत्ता में आने के बाद वह ‘डीप स्टेट’ को खत्म कर देंगे। तब उन्होंने कहा था, ‘या तो हम ‘डीप स्टेट’ को खत्म कर दें। नहीं तो अमेरिका को ‘डीप स्टेट’ खत्म कर देगा।’ कहा जाता है उसके बाद से वे लगातार ‘डीप स्टेट’ हमला करते रहे हैं। अब यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये ‘डीप स्टेट’ क्या है? क्या ‘डीप स्टेट’ इतना ताकतवर है कि वह अमेरिका को ही खत्म कर सकता है? ट्रंप पर कहीं ‘डीप स्टेट’ के इशारे पर तो हमला नहीं हुआ था? ट्रंप के समर्थक खुलकर तो नहीं लेकिन उनका इशारा इसी ओर है। अब जबकि अगले महीने ट्रंप राष्ट्रपति का शपथ ग्रहण करने जा रहे हैं। उससे पहले एक बार फिर ‘डीप स्टेट’ पर चर्चा होने लगी है।
इस रपट में ‘डीप स्टेट’ को समझने का प्रयास किया गया है। इसमें उपर्युक्त सवालों के साथ यह भी जानने और समझाने का प्रयास किया गया है कि ‘डीप स्टेट’ कैसे विश्व की राजनीति को कंट्रोल करता है? इसके पीछे कौन कौन से लोग हैं? इन पर वैश्विक परिदृश्य में किन-किन घटनाओं को अंजाम देने का आरोप है?
डीप स्टेट क्या है?
शाब्दिक अर्थ देखें तो कैंब्रिज डिक्शनरी के अनुसार, ऐसा संगठन जो बिना निर्वाचित हुए विशेष समूह के हितों की रक्षा के लिए सैन्य, पुलिस, राजनैतिक समूह, अर्थव्यवस्था आदि को कंट्रोल करे। अब आते हैं इसके व्यवहारिक अर्थ पर। जर्मन राजनीतिज्ञ और उद्योगपति वाल्टर रॉसेनाऊ ने 1909 में इसी विषय पर जर्मन भाषा में (अंग्रेजी में कुछ हिस्सा उपलब्ध है) एक लेख ‘न्यू फ्री प्रेस’ में लिखा था। इस लेख का जर्मन नाम ‘गेस्चैफ्टलिचर नचवुच्स’ है। इस लेख में उन्होंने बताया है कि कैसे कुछ सौ लोग पूरे यूरोप को अपने व्यावसायिक हित के लिए चला रहे हैं। वे हर तरह से सत्ता को कंट्रोल करते हैं। इस बात को और खुलकर रूसी जनरल और लेखक आर्थर सेरेप स्पिरिदोविख ने 1926 के अपने लेख ‘दि सीक्रेट गवर्नमेंट ऑर सीक्रेट हैंड’ में इस ग्रुप के लिए ‘हिडन हैंड’ नाम दिया। उन्होंने इसमें पहली बार रॉस चाइल्ड फैमली का नाम लिया। यह वही फैमिली है, जिसपर आज भी कई देशों में फंडिंग कर उन्हे अस्थिर करने के आरोप हैं।
इस परिवार का हाथ विश्व युद्ध में भी माना जाता है। यूरोप की अर्थव्यवस्था में रॉस चाइल्ड फैमली बड़ा नाम है। जैसे अमेरिका की अर्थव्यवस्था में रॉकफैलो फैमली का है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका को ‘डीप स्टेट’ का पर्याय माना जाने लगा है। इसके बारे में अब किये गए शोध से पता चलता है कि इसके लिए देश और उसकी सीमा कोई मायने नहीं रखता। अब सवाल उठता है कि फिर क्या मायने रखते हैं? जवाब है, सिर्फ और सिर्फ पूंजी और उसके मालिक इनके लिए मायने रखते हैं। इस क्लब में ऐसे कई और परिवार हैं, जो पूरी दुनिया में गुप्त रूप से अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए सरकार गिराना, युद्ध कराना, राष्ट्रपतियों को मरवाना, अर्थव्यवस्था कमजोर करने आदि का काम करते हैं। डीप स्टेट पर एक और पुस्तक 1992 में जॉन कोलमैन की आई। कोलमैन अपनी पुस्तक ‘दि कंस्पिरेटर हायरार्की: कमेटी ऑफ थ्री हंड्रेड’ के नाम से लिखा है। इस पुस्तक को अमेरिका की सीआईए ने बैन कर दिया था। हालांकि कुछ वर्षों पहले इस पर से बैन हटा लिया गया है। यह पुस्तक में भी इसी ‘डीप स्टेट’ के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। इसमें बताया गया है कि कैसे यह गुट (डीप स्टेट) दो देशों के बीच युद्ध कराने से लेकर उसके निर्माण में अपनी भागीदारी निभाता है। इसका ताजा उदाहरण यूक्रेन में देखा जा सकता है।
ऑकलैंड इंस्टीट्यूट की रिसर्च रिपोर्ट्स 'वॉर एंड थेफ्ट' के अनुसार यूक्रेन में अमेरिका और यूरोप की आधा दर्जन से अधिक कंपनियों ने यूक्रेन की खेतिहर भूमि में निवेश किया है। यूक्रेन में युद्ध से तबाही के बाद निर्माण का काम ब्लैक रॉक और अन्य हेज फंड मैनेज करने वाली कंपनी को दिया गया है। यह अमेरिकी कंपनी विश्व के लगभग सभी ताकतवर परिवारों का पैसा मैनेज करती है। इसकी ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ब्लैक रॉक लगभग 12 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति मैनेज करता है। यह फंड भारत की कुल जीडीपी 3.94 ट्रिलियन का तीन गुना है। अमेरिका यूरोप में ऐसी एक दर्जन से अधिक कंपनियां हैं। इन तथ्यों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि ‘डीप स्टेट’ कितना ताकतवर है।
अमेरिका में मीडिया समूह सीएनएन ने एक सर्वे कराया। उस सर्वे में ‘डीप स्टेट’ को लेकर सवाल पूछे गए। इस सर्वे के आधार पर वरिष्ठ पत्रकार डेविड राइट बताते हैं कि 27 प्रतिशत लोग ‘डीप स्टेट’ को लेकर आश्वस्त हैं। वहीं 47 प्रतिशत लोग इसको अच्छी तरह से जानते हैं। बाकी लोग इस तरह के अस्तित्व को लेकर शंका जाहिर करते हैं। अमेरिका के कई मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिकी प्रेसिडेंट अब्राहम लिंकन से लेकर जॉन एफ. कैनेडी तक को इसी ग्रुप ने मरवाया। ट्रंप अगला नाम हो सकते थे। पर वे किस्मत के धनी निकले और हमले में बच गए। हालांकि सुबूत के अभाव में इसे एक कॉन्सपिरेसी थ्योरी ही माना जाता है।
जॉर्ज सोरोस की भूमिका
जॉर्ज सोरस का असली नाम ग्योर्गी स्योट्स है । सोरोस यानी ग्योर्गी भी ‘डीप स्टेट’ का ही एक हिस्सा हैं लेकिन सिर्फ एक मोहरे के रूप में। इनकी नजर अभी भारत पर है। प्यू रिसर्च सेंटर ने हाल में ही एक रिपोर्ट जारी की है। उस रिपोर्ट में बताया गया है कि इस वर्ष (2024 में) लगभग 60 से अधिक देशों में चुनाव हुए हैं। इनमें से लगभग 50 देशों में सरकारें बदल गई। लेकिन भारत में ये सरकार नहीं बदल पाए। बेशक यहां भाजपा पहले की तुलना में थोड़ा कमजोर हुई है। पिछले कुछ समय से अब भारत में भी लोग जॉर्ज सोरस को जानने लगे हैं।
नरेन्द्र मोदी सरकार का आरोप है कि विपक्ष खासकर कांग्रेस एवं राहुल गांधी जॉर्ज सोरस से मिलकर भारत की वर्तमान सरकार को गिराना चाहते हैं। इनका आरोप तथ्यों के आधार पर है। जिसका जवाब कांग्रेस को देना चाहिए। जॉर्ज सोरस को डीप स्टेट का मेंबर माना जाता है। जॉर्ज पर वैसे कई आरोप हैं कि उन्होंने कई देशों की अर्थव्यवस्था को बर्बाद किया है। मसलन, उन पर यूरोपीय यूनियन में अस्थिरता लाना और अरब स्प्रिंग की फंडिंग का आरोप है। 1997 में एशिया में वित्तीय संकट, मलेशिया और थाईलैंड में करेंसी मैनिपुलेशन का भी इन पर आरोप है।
सोरोस लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमी से पढ़ाई कर बैंक ऑफ इंग्लैंड को ही बर्बाद कर दिया। उस समय की कई मीडिया रिपोर्ट्स बताती है कि इंग्लैंड का पाउंड सोरोस की वजह से बर्बाद हो गया था। ब्लूमबर्ग कि एक रिपोर्ट में कहा गया है कि करेंसी मैनिपुलेशन की वजह से एशिया के कई देशों में सत्ता परिवर्तन हो गया। हद तो तब हो गई, जब सोरोस पर अमेरिका में भी सत्ता परिवर्तन के आरोप लगे। साल 2011 में अमेरिका में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। इन प्रदर्शनों के फंडिंग का आरोप सोरोस पर ही लगा था। कुछ समय पहले सोरोस ने मोदी को सत्ता से हटाने को लेकर सार्वजनिक रूप से बयान दिया था। उसी तरह 2003 में सोरोस ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को लेकर बयान दिया था कि उनके जीवन का उद्देश्य बुश को सत्ता से हटाना है। 2017 में उन्होंने ट्रम्प को एक ठग बताया था।
दार्शनिक कार्ल पॉपर की एक किताब है, ‘एनिमी ऑफ ओपन सोसाइटी’। इसमें पॉपर ने कहा है कि जिस समाज को आप मानते हैं, वह आपका है। बाकी का समाज, जो आपके अनुसार नहीं है, वह आपका विरोधी है। चाहे वह किसी देश में रहे। ‘डीप स्टेट’ का दर्शन कहीं न कहीं इसी थ्योरी पर टिका हुआ है। वह जिसकी पूंजी को मैनेज करता है। उनका समाज बस उतना भर ही है। उसकी पूंजी को बढ़ाने और प्रबंधन में जो कोई भी बाधा आता है, उसे वह अपना विरोधी मानता है। उसे हटाने के लिए यह किसी भी हद तक जा सकता है। सोरोस भी यही कर रहा है।
सोरोस की ओपन सोसाइटी, ऑर्गेनाइज क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (ओसीसीआरपी) को फंड करती है। इसके फाउंडर ड्यू सुल्लीवन से जब सवाल किया गया कि यह एजेंसी अमेरिका के खिलाफ करप्शन क्यों नहीं छापता। इसपर सुल्लीवन ने साफ तौर पर कहा, ‘इसके पीछे का कारण है कि इस पब्लिकेशन को सबसे ज्यादा फंडिंग अमेरिका से ही आ रही है। मतलब साफ है कि यह उन्ही देशों को टारगेट करता है, जिन्हे ‘डीप स्टेट’ या सोरोस की तरफ से संकेत होता है।
मोदी सरकार का जॉर्ज सोरोस को लेकर आरोप
2015 मोदी सरकार को आये एक साल हो चुके थे। तब भारत में एनजीओ का जाल हुआ करता था। सोरोस के द्वारा फंडेड ‘इंडिया- न्यू इकोनॉमिक थिंकिंग’ (आई-नेट) को भारत में स्थापित किया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इसका मुख्य काम भारत में मोदी विरोधी गतिविधियों को अंजाम देना था। इस एनजीओ के द्वारा भारत की तमाम छोटी-बड़ी एनजीओ को फंडिंग कर देश के कई हिस्सों में सरकारी नीतिओं के खिलाफ गतिरोध पैदा करना था। एक साल के अंदर भारत सरकार ने इसकी चाल को समझ लिया। और 2016 में 6677 एनजीओ को बैन कर दिया। कथित तौर पर मोदी सरकार का यह सोरोस पर पहला हमला था। इस पर चोट कर मोदी सरकार ने सोरोस की मंशा को असफल कर दिया था।
इसके बाद सोरोस और उनकी संस्था ने ‘प्लान बी’ पर काम करना शुरू किया। वह था, विभिन्न संगठनों को फंड कर भारत की सरकार पर सीधा आरोप लगाना। इन्हीं में से एक है, फोरम ऑफ डेमोक्रेटिक लीडर एशिया-पैसिफिक (एफडीसीएपी)। इसकी सह अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। यह संस्था आजाद कश्मीर का हिमायती है। आजाद कश्मीर को लेकर इस संस्था ने दुनिया भर में खुलकर अपनी बात रखी। दूसरी संस्था है, हिंडनबर्ग। अडानी और सेबी को लेकर इस संस्था ने दो बड़े खुलासे किये थे। जिसकी वजह से अडानी और सरकार दोनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घिर गयी थी। लेकिन मोदी और अडानी के मजबूत जोड़ ने इसे भी ख़ारिज कर दिया। भाजपा का आरोप है कि सोरोस से राहुल गांधी भी मिल चुके हैं। वह विदेशी ताकतों के सहारे भारत सरकार को गिराना चाहते हैं। भाजपा ने इस आरोप को सिद्ध करने के लिए कई प्रमाण भी दिए हैं। मसलन, कैसे संसद शुरू होने से पहले एक रिपोर्ट इन संगठनों द्वारा आती है। और फिर उस रिपोर्ट के आधार पर सरकार को घेरा जाता है।
भाजपा के आरोपों में दम भी दिखता है और उसमे भी तथ्य हैं। अब यहां सवाल उठता है कि वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? सोरोस का इस पर जवाब होता है, लोकतंत्र के लिए। पर यह परिभाषा इतनी सरल नहीं है। यहीं आता है, डीप स्टेट यानी कुछ समूहों का हित। जो कोई भी सरकार इनकी विचारधारा से सहमत नहीं हैं या उन्हें लगता है कि उनकी विचारधारा ही पूरी दुनिया में होनी चाहिए। इस बात की पुष्टि पश्चिमी दार्शनिक और जॉर्ज सोरोस के आइडियल कार्ल पॉपर की बातों से होती हैं। जहां वे यथार्थवाद (रियलइजम) का हवाला देते हुए कहते हैं कि 'स्ट्रोंग शैल डू व्हाट दे कैन' अर्थात जिसके पास ताकत है वो हर वो काम करेगा जो कर सकता है। शायद सोरोस की टीम को यह नहीं पता है की इसी यथार्थवाद के अनुयायी नरेंद्र मोदी भी हैं।