मशहूर हिंदी साहित्यकार कृष्णा सोबती का25 जनवरी सुबह, दिल्ली में 94 वर्ष कीअवस्था में देहांत हो गया। ज्ञानपीठ पुरस्कारसे सम्मानित कृष्णा सोबती अपने साहसपूर्णऔर निर्भीक लेखन के लिए जानी जाती थीं।साथ ही वे अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए भीपहचानी जाती थीं। वे जिंदगी के आखिरी सालोंतक साहित्यसृजन में सक्रिय रहीं। राजनीतिऔर सामाजिक मुद्दों पर खुलकर अपनी रायरखती थीं। इसी के चलते 2015 मेंउन्होंने नाराज होकर साहित्य अकादमीपुरस्कार वापस कर दिया था। 1950में ‘लामा’ कहानी लिखकर उन्होंनेलेखन की शुरुआत की। उन्होंने अपनेलेखन में स्त्री अस्मिता को मजबूती सेसामने लाई। 1966 में आया उनकाउपन्यास ‘मित्रो मरजानी’ स्त्री कीआजाद अस्मिता का चित्रण करता है।‘मित्रो मरजानी’ और ‘जिंदगीनामा’हिंदी साहित्य की कालजयी रचनाओंमें शामिल है। 1925, गुजरात (अबपाकिस्तान में) में जन्मीं कृष्ण सोबती नेआजीवन लेखनकार्य किया। उनकी प्रमुखरचनाओं में ए लड़की, जैनी मेहरबान सिंह,सूरजमुखी अंधेरे के, समय सरगम, गुजरातपाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान, लेखक काजनतंत्र, मार्फत दिल्ली जैसी रचनाएं शामिलहैं। 2017 में ज्ञानपीठ के अतिरिक्त उन्हेंसाहित्य अकादमी फेलोशिप, श्लाका पुरस्कार,हिंदी अकादमी अवार्ड मिल चुका है।

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