आम चुनाव में शेख हसीना की एकतरफा जीत हुई है और 300 में से उनके 288 सांसद चुने गए हैं। उनका प्रतिद्वंद्वी गठबंधन केवल सात जगह विजय प्राप्त कर सका। इस तरह के एकतरफा चुनाव परिणामों पर उंगली उठना स्वाभाविक है।

भारत को बांग्लादेश के आम चुनाव में शेख हसीना की विजय से संतोष होना स्वाभाविक है। आम चुनाव में उनकी एकतरफा जीत हुई है और 300 में से उनके 288 सांसद चुने गए हैं। उनकी पार्टी को कुल मतों में 80 प्रतिशत से अधिक मत मिले हैं। उनका प्रतिद्वंद्वी गठबंधन केवल सात जगह विजय प्राप्त कर सका। इस तरह के एकतरफा चुनाव परिणामों पर उंगली उठना स्वाभाविक है। लेकिन बांग्लादेश की विपक्षी पार्टियों का यह दावा सही नहीं है कि चुनाव धोखाधड़ी से जीता गया और उसे रद्द करके फिर से चुनाव करवाए जाने चाहिए। अपनी मांग न माने जाने पर उन्होंने संसद का बहिष्कार करने की घोषणा की है। शेख हसीना कीे विजय का बड़ा कारण उनके शासनकाल में बांग्लादेश की राजनीति में आई स्थिरता है। शेख हसीना के शासनकाल में ही बांग्लादेश ने तेज प्रगति की है और इन्हीं सब कारणों से उनकी लोकप्रियता शिखर पर है। उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी खालिदा जिया को बांग्लादेश की अदालत ने भ्रष्टाचार के आरोप में इस साल फरवरी में पांच साल की सजा देकर जेल भिजवा दिया था। बांग्लादेश के संविधान के अनुसार दो वर्ष से अधिक की सजा पाया व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता। इसलिए वे चुनाव नहीं लड़ पाईं। उनके बेटे पर भी भ्रष्टाचार के आरोप हैं, जिनसे बचने के लिए देश से बाहर हैं। विपक्ष में और कोई ऐसा नेता नहीं है, जो शेख हसीना को टक्कर दे सकता। इसलिए चुनाव परिणाम एकतरफा आए।

हिन्दुओं को भारत का हमदर्द कहकर निरंतर प्रताडि़त किया जाता रहा है। आज बांग्लादेश में हिन्दुओं की आबादी कुल आबादी का केवल 8.5 प्रतिशत रह गई है। अगले वर्षों में वह शायद इतनी भी न बचे।

इस तरह के चुनाव परिणाम अवसर भी होते हैं और एक चुनौती भी। शेख हसीना पिछले नौ साल से बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हैं। अभी तक वहां की जनता का उन पर विश्वास बना हुआ है। लेकिन कभी असंतोष भड़का तो वह व्यापक हिंसा का स्वरूप ले सकता है। क्योंकि उसको दिशा देने वाली कोई पार्टी विपक्ष में अभी दिखती नहीं है। शेख हसीना को इन सब बातों का ध्यान रखना पड़ेगा। शेख हसीना को भारत के अनुकूल माना जाता है। शेख हसीना ने पाकिस्तान के विरुद्ध हमेशा भारत का साथ दिया है। जबकि उनकी प्रतिद्वंद्वी खालिदा जिया न केवल पाकिस्तान समर्थक जमायत-ए-इस्लामी को साथ लेकर चल रही थी, बल्कि उनके शासनकाल में बांग्लादेश सभी तरह की भारत विरोधी शक्तियों को प्रश्रय देता रहा। इस बार के चुनाव में जमायत-ए-इस्लामी प्रतिबंधित होने के कारण स्वयं चुनाव नहीं लड़ रही थी। लेकिन उसके कुछ उम्मीदवार खालिदा जिया की पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे थे।

बांग्लादेश में जब-जब खालिदा जिया की पार्टी भारी बहुमत से जीती, जमायत-ए-इस्लामी का वोट प्रतिशत बढ़कर 20 के पार चला गया। अन्यथा उसका मत प्रतिशत पांच प्रतिशत से कम ही रहा है। बांग्लादेश में रह रहे हिन्दुओं पर जमायत-एइस्लामी निरंतर हमले करवाती रही है। फरवरी 2013 में जब बांग्लादेश के 1971 और 75 में हुए नरसंहार के अपराधियों को सजा देने के लिए बनाए गए ट्रिब्यूनल ने जमायत-ए-इस्लामी के कुछ लोगों को फांसी की सजा सुनाई तो जमायत-ए-इस्लामी के छात्र संगठन इस्लामी छात्र शिविर का कहर हिन्दुओं पर ही फूटा। बांग्लादेश में लगभग 50 मंदिरों को तोड़ा गया। जमायत के नेताओं ने संगठित तरीके से हिन्दू व्यवसायियों और अन्य लगभग 1500 लोगों के घर जला डाले। उनके द्वारा करवाई गई हिंसा इतनी व्यापक थी कि बांग्लादेश की पुलिस को अनेक जगह गोली चलानी पड़ी। उपद्रव को शांत करने के लिए की गई कार्रवाई में 87 लोगों की जान गई थी। इस सबके बावजूद खालिदा जिया जमायत-ए-इस्लामी का साथ देती रही है। इस चुनाव से पहले उनकी पार्टी ने भारत सरकार से सम्पर्क साधकर अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की थी, लेकिन भारत ने उसमें कोई रुचि नहीं ली। शेख हसीना के सत्ता में होने के बावजूद हिन्दू वहां आज भी अपने आपको सुरक्षित अनुभव नहीं करते। उनका पलायन निरंतर होता रहा है। भारत सरकार पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से प्रताडि़त होकर भारत आए हिन्दुओं को नागरिकता देने के लिए विदेशी नागरिकता कानून में संशोधन करना चाहती है, लेकिन असम उसकी बाधा बना हुआ है। असम के राजनैतिक दल अपने यहां बांग्लादेश से आकर बसे हिन्दू और मुसलमान दोनों को एक तराजू पर रखते हैं और उन्हें असम से बाहर करने का दबाव बना रहे हैं। बांग्लादेश में बंटवारे से पहले हिन्दुओं की आबादी काफी थी।

1941 की जनगणना के समय बांग्लादेश में आने वाले जिलों में 28 प्रतिशत हिन्दू आबादी थी। उसके बाद बंटवारे के समय उनके खिलाफ व्यापक हिंसा हुई। महात्मा गांधी की नोआखाली यात्रा ने उस समय के पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दू कितने असुरक्षित थे, इसका ऐतिहासिक वृतांत उपलब्ध कर रखा है। 1951 में पूर्वी पाकिस्तान में हिन्दुओं की संख्या घटकर 22 प्रतिशत रह गई थी, लेकिन उसके बाद उन पर और भी जुर्म ढाए गए। ऐसी परिस्थितियां पैदा की गईं कि वे पूर्वी पाकिस्तान में अपनी संपत्ति छोड़कर पलायन कर जाएं। बाद में उनकी संपत्ति हड़पने के लिए सरकार ने शत्रु संपत्ति कानून बनाया। विशेषज्ञों का मानना है कि उस कानून का सहारा लेकर उन लोगों की संपत्ति भी हड़प ली गई, जो आज भी वहां बसे हुए हैं। हिन्दुओं को भारत का हमदर्द कहकर निरंतर प्रताडि़त किया जाता रहा है। आज बांग्लादेश में हिन्दुओं की आबादी कुल आबादी का केवल 8.5 प्रतिशत रह गई है। अगले वर्षों में वह शायद इतनी भी न बचे। इस समय बांग्लादेश में एक करोड़ 40 लाख हिन्दू रह रहे हैं। बांग्लादेश की राजनीति में यों भी काफी हिंसा रही है। जब तक वह पाकिस्तान का अंग था, पाकिस्तान के शासक यहां के लोगों के साथ सौतेला व्यवहार करते थे। उसी ने मुजीबुर रहमान के आंदोलन को जन्म दिया था। भारत सैनिक हस्तक्षेप न करता तो पाकिस्तानी सेना ने और बड़े पैमाने पर नरसंहार किया होता। आंदोलन को दबाने के नाम पर सेना द्वारा स्थानीय लोगों का काफी दमन किया गया था। बांग्लादेश बनने के बाद भी सेना का एक वर्ग पाकिस्तान से हमदर्दी दिखाता रहा। उसी के द्वारा 15 अगस्त 1975 को मुजीबुर रहमान और उनके परिवार के अधिकांश सदस्यों की हत्या कर दी गई। उनकी दो बेटियां भर बची, जो उस समय जर्मनी में थी। सैनिक उथल-पुथल के एक दौर के बाद सत्ता सेनाध्यक्ष जिया उर रहमान के हाथ में आई। उनकी भी 1981 में हत्या कर दी गई। उनके बाद इरशाद को सत्ता मिली। सैनिक शासन के इस दौर का अंत खालिदा जिया और शेख हसीना द्वारा किए गए राजनैतिक संघर्ष से हुआ। इरशाद ने मॉर्शल लॉ के अंतर्गत जो चुनाव करवाए थे, उसमें शेख हसीना ने हिस्सा लिया था। इसकी काफी आलोचना हुई थी और उसका खामियाजा उन्हें अगले चुनाव में उठाना पड़ा था। व्यापक जनांदोलन के बाद बांग्लादेश में लोकतंत्र बहाल हुआ, तो 1991 के चुनाव में खालिदा जिया और जमायत-ए-इस्लामी के गठबंधन को भारी जीत मिली।

1995 में खालिदा जिया के शासन से असंतोष के कारण 200 दिन की आम हड़ताल रही। फरवरी 1996 में आम चुनाव करवाए गए, जिनका शेख हसीना ने बहिष्कार किया। मजबूर होकर खालिदा जिया को संविधान में सुधार करके चुनाव करवाने के लिए एक कामचलाऊ सरकार की व्यवस्था करनी पड़ी। इस नई व्यवस्था के अंतर्गत जून 1996 में फिर चुनाव हुए तो शेख हसीना जीत गई। उसके बाद 2001 से 2006 तक फिर खालिदा जिया का शासन रहा। 2006 में चुनाव करवाने के लिए जो कामचलाऊ व्यवस्था बनी, उसने अनेक कारणों से चुनाव टाले और 2009 में चुनाव के बाद फिर शेख हसीना सत्ता में पहुंच गई। तब से बांग्लादेश की सत्ता उन्हीं के पास है। शेख हसीना ने 2009 में सत्ता में आते ही एक ट्रिब्यूनल का गठन कर दिया, ताकि 1971 और 75 में हुए नरसंहार के अपराधियों को सजा दिलवाई जा सके। जब जमाएत-एइस्लामी के कुछ नेताओं को ट्रिब्यूनल ने फांसी की सजा सुनाई तो व्यापक हिंसा हुई। बाद में बांग्लादेश के उच्च न्यायालय ने जमायत-एइस्लामी को चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित कर दिया। 2012 में सेना के मध्यक्रम के कुछ अफसरों ने शेख हसीना का तख्ता पलटने की कोशिश की थी। लेकिन भारत ने इसकी खुफिया सूचना बांग्लादेश सरकार को दे दी थी और समय पर उस विद्रोह को कुचल दिया गया। 2011 में शेख हसीना ने संविधान में संशोधन करके चुनाव के लिए कामचलाऊ सरकार की व्यवस्था यह कहते हुए खत्म करवा दी कि 2006 से 2008 तक का कामचलाऊ सरकार का अनुभव अच्छा नहीं था। उस सरकार में बैठे लोग ही सत्ता का दुरुपयोग कर रहे थे। इसके अलावा संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने पर रोक लगा दी गई और दलबदल को गैर-कानूनी बना दिया गया। इस सबके बाद शेख हसीना पर निरंकुश होने के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन मुस्लिम देशों की राजनीति में जिस तरह की हिंसा और असहिष्णुता देखने को मिलती है, उसमें या तो सेना के हाथ में सत्ता चली जाती है या कोई ताकतवर नेता एकतंत्रीय शासन की ओर जाता दिखाई देता है। आज बांग्लादेश में ऐसी ही स्थिति है। लेकिन उसका दोष अकेले शेख हसीना को नहीं दिया जा सकता।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here