कांग्रेस जिस सीट को पिछले चुनाव में केवल 20 हजार वोट से जीती थी, उसे राहुल गांधी के लिए सबसे सुरक्षित सीट कैसे माना जा सकता है, यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। यहां यह भी प्रश्न उठता है कि राहुल गांधी ने वायनाड को क्यों चुना?

केरल का संसदीय क्षेत्र वायनाड आसपास के जिलों के चार और विधानसभा क्षेत्रों को मिलाकर 2008 में अस्तित्व में आया था। उसमें कन्नूर और मल्लपुरम जिले के विधानसभा क्षेत्रों को मिलाया गया था। इससे उसका धार्मिक अनुपात बदल गया। वायनाड जिले में हिन्दू बहुसंख्या में थे। लेकिन वायनाड संसदीय क्षेत्र में वे अल्पसंख्या में हो गए। उसके बाद 2009 और 2014 में दो संसदीय चुनाव हुए। दोनों चुनावों में दोनों मुख्य मोर्चों के उम्मीदवार मुस्लिम समुदाय से थे। कांग्रेस दोनों चुनाव जीतने में सफल रही। लेकिन पहले चुनाव में जहां वह डेढ़ लाख से अधिक वोटों से जीती थी, दूसरे चुनाव में उसकी जीत केवल 20 हजार वोट से हुई।
इस चुनाव क्षेत्र में वाम मोर्चे की ओर से भाकपा का उम्मीदवार था। इस बार भी भाकपा का ही उम्मीदवार मैदान में है। कांग्रेस जिस सीट को पिछले चुनाव में केवल 20 हजार वोट से जीती थी, उसे राहुल गांधी के लिए सबसे सुरक्षित सीट कैसे माना जा सकता है, यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। वायनाड से राहुल गांधी की उम्मीदवारी पर वाम मोर्चे ने तीखी प्रतिक्रिया की है। वाम मोर्चे ने कहा है कि देश में विपक्ष का चुनावी गठबंधन तो भाजपा को हराने के लिए किया जा रहा था। लेकिन राहुल गांधी तो भाजपा को चुनौती देने के बजाय वाम दलों को ही चुनौती दे रहे हैं। वाम मोर्चे की यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक ही थी। केरल में वाम मोर्चे की सरकार है। देश में कम्युनिस्टों की अब यह अकेली सरकार बची है। उनका यह आखिरी किला हाथ से निकला तो उनके सामने अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा। इसलिए वे राहुल गांधी को वायनाड में हराने की भरपूर कोशिश करेंगे।
पर क्या भाकपा भी वायनाड में राहुल गांधी को हराने में उसी संकल्प से जुटेगी, कहना मुश्किल है। भाकपा हमेशा कांग्रेस के प्रति नरम रवैया रखती रही है। वायनाड संसदीय क्षेत्र से पिछले दो चुनावों में कांग्रेस के जिस उम्मीदवार को जीत मिली थी, पिछले वर्ष उसकी मृत्यु हो चुकी है। अगर वे जीवित होते तो भी शायद ही वह यह सीट बचा पाए होते। क्योंकि इस संसदीय क्षेत्र में उनकी छवि एक अप्रवासी नेता की बन गई थी। वे कभी लौटकर अपने क्षेत्र में नहीं झांकते थे। राहुल गांधी का जीतने पर इस संसदीय क्षेत्र की सुध लेते रहना तो और भी मुश्किल है।
अगर वे अमेठी से जीत जाते हैं तो शायद ही वायनाड को चुने। अमेठी की अपनी परंपरागत सीट पर बने रहने का मोह तो होगा ही, उनके निर्णय को यह बात भी प्रभावित करेगी कि अमेठी उत्तर भारत में है और राजनीतिक रूप से अमेठी का महत्व वायनाड से अधिक है। अगर वे अमेठी में हार गए और वायनाड में जीत गए तो भी वायनाड की ओर शायद ही ध्यान दे पाए। अमेठी से अब तक अधिकांश चुनाव कांग्रेस ने जीते हैं। 1980 में पहली बार यहां से नेहरू-इंदिरा परिवार का सदस्य चुनाव लड़ा था। संजय गांधी ने चुनाव लड़ा और जीता था, लेकिन कुछ ही समय बाद उनकी एक दुर्घटना में मृत्यु हो गई और 1981 में राजीव गांधी को इस सीट से लड़ाया गया।
राजीव गांधी ने 1991 तक इस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। उनकी मृत्यु के बाद 1991 से 1998 तक नेहरू-इंदिरा परिवार के स्वामीभक्त सतीश शर्मा इस परिवार के लिए यह सीट संभाले रहे। 1998- 99 में भाजपा के संजय सिंह ने इस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। उसके बाद यह सीट फिर नेहरू-इंदिरा परिवार के पास आ गई। 1999 में सोनिया गांधी दो जगह से चुनाव लड़ी थी। वे दोनों जगह से चुनाव जीतीं पर बेल्लारी को छोड़कर उन्होंने अमेठी का प्रतिनिधित्व किया। 2004 से राहुल गांधी यह सीट जीतते रहे हैं। इतने लंबे समय तक राहुल गांधी ही नहीं, नेहरू-इंदिरा परिवार के हाथ में रहा यह संसदीय क्षेत्र आज भी उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है। हमारे अधिकांश सांसदों का अपने संसदीय क्षेत्र के प्रति यही व्यवहार रहता है। कम ही सांसद ऐसे हैं जो जीतने के बाद अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों की समस्याओं की तरफ ध्यान देते हैं।
शहरी क्षेत्रों के मतदाता तो फिर भी मुखर होने के कारण अपने सांसद से जवाब मांग सकते हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाता सामान्यत: अपनी स्थिति से समझौता किए रहते हैं। यही कारण है कि नेहरू-इंदिरा परिवार के लगभग सभी सदस्यों ने सुरक्षित चुनाव क्षेत्र की तलाश में अत्यंत पिछड़े और ग्रामीण क्षेत्रों को ही चुना। जवाहर लाल नेहरू का राजनैतिक कैरियर इलाहाबाद के मेयर के रूप में शुरू हुआ था। लेकिन संसदीय चुनाव लड़ने की स्थिति आई तो वे इलाहाबाद से नहीं उससे सटे ग्रामीण क्षेत्र फूलपुर से चुनाव लड़े। इंदिरा गांधी ने उत्तर प्रदेश के पिछड़े संसदीय क्षेत्र रायबरेली को चुना। 1977 में जब वे वहां समाजवादी राज नारायण के हाथों परास्त हुईं तो अगला चुनाव कर्नाटक जाकर चिकमंगलूर से लड़ा। 1980 में वे कर्नाटक से आंध्र पहुंचीं और मेडक से चुनाव लड़ी। मेडक की गिनती भी आंध्र के सबसे पिछड़े जिलों में होती थी। सोनिया गांधी ने 1999 में चुनाव में उतरने का फैसला किया तो वे अमेठी के साथ-साथ कर्नाटक में बेल्लारी से चुनाव लड़ी।
वे भी दोनों जगह से जीतीं और उन्होंने अमेठी अपने पास रखी और बेल्लारी छोड़ दीं। उसके बाद वे अमेठी अपने पुत्र राहुल गांधी के लिए छोड़कर स्वयं रायबरेली चुनाव लड़ने चली गईं। पिछले चुनाव में स्मृति ईरानी ने अमेठी में राहुल गांधी को कड़ी टक्कर दी थी। चुनाव में हारने के बाद भी वे अपने चुनाव क्षेत्र से संपर्क बनाए रहीं और उन्होंने राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के मन में अमेठी में फिर से जीत के प्रति आशंका पैदा कर दी। राहुल गांधी के लिए एक दूसरी सुरक्षित सीट की तलाश हुई और वह वायनाड पर जाकर पूरी हुई। वायनाड हर मामले में केरल का सबसे पिछड़ा और पूरी तरह से ग्रामीण जिला है। राहुल गांधी ने अटल बिहारी वाजपेयी की तरह लखनऊ और नरेंद्र मोदी की तरह वाराणसी जैसे क्षेत्र से लड़ने का जोखिम नहीं उठाया। वायनाड संसदीय क्षेत्र की आबादी मिश्रित है।
उत्तरी क्षेत्र में कन्नड़भाषी आबादी है। मल्लपुरम के जो तीन विधानसभा क्षेत्र इस संसदीय क्षेत्र में मिलाए गए हैं, उनमें मुस्लिम मतदाताओं की बहुलता है। इन विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम लीग का काफी प्रभाव रहा है। वायनाड संसदीय क्षेत्र में तीस प्रतिशत मतदाता मुसलमान हैं और 20 प्रतिशत से अधिक ईसाई। इस संसदीय क्षेत्र में अनुसूचित जाति और जनजाति के मतदाताओं की भी बड़ी संख्या है। कॉफी के बागानों के साथसाथ काली मिर्च और अदरक के लिए भी यह क्षेत्र जाना जाता है और उनमें काम करने वाले मजदूरों के बीच वामपंथी दलों का काफी प्रभाव है। इस संसदीय क्षेत्र में जीत के लिए राहुल गांधी को मुस्लिम लीग के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ेगा। आजादी के बाद मुस्लिम लीग को कांग्रेस का ही समर्थन मिलता रहा है। भारत के किसी राज्य में मुस्लिम लीग की सरकार बनवाने का श्रेय भी कांग्रेस को ही है। उसके समर्थन से केरल में मुस्लिम लीग के नेता सी.एच. मोहम्मद कोया की सरकार बनी थी।
हालांकि वह कुछ महीने ही चल पाई थी। उसके बाद से केरल की इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का ही अंग है। केरल के अलावा पश्चिम बंगाल और कुछ अन्य राज्यों में भी कांग्रेस मुस्लिम लीग को सहारा देती रही है। जो पार्टी देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार थी, उसका भारतीय संस्करण अब तक कांग्रेस के सहारे फलता-फूलता रहा है यह अपने आपमें कांग्रेस की राजनैतिक दिशा स्पष्ट कर देता है। बताया जाता है कि वायनाड से राहुल गांधी को लड़ाने का फैसला मुस्लिम लीग के नेता पनकड़ हैदर अली तंगल से सलाह करके ही किया गया है। कांग्रेस की ओर से यह कहा गया है कि पार्टी केंद्र में अपनी अगली सरकार बनाने के अभियान में दक्षिण से पर्याप्त संख्या में सांसद जिताना चाहती है। इसी बात को ध्यान में रखकर राहुल गांधी को वायनाड से लड़वाया जा रहा है जिसकी सीमाएं दक्षिण की तीन राज्यों से मिलती है। दक्षिण से कुल मिलाकर 130 सांसद चुने जाते हैं। आंध्र और तेलंगाना में कांग्रेस की अब कोई हैसियत नहीं रह गई है।
तमिलनाडु में 1967 के बाद कांग्रेस की कोई सरकार नहीं बनी और इस बार द्रमुक से समझौते में उसे केवल दस सीटें मिली हैं। कर्नाटक में उसका जनता दल (सेक्यूलर) से समझौता है। पर इन दोनों पार्टियों के बीच इतनी चौड़ी खाई है कि बार-बार कांग्रेस के केंद्रीय नेताओं को अपने कार्यकर्ताओं से सहयोग करने की अपील करनी पड़ रही है। यही कारण है कि राहुल गांधी के लिए सुरक्षित सीट तलाशते समय कर्नाटक की ओर नहीं देखा गया। केरल में वाम सरकार दबाव में है, लेकिन उसका लाभ कांग्रेस को नहीं भारतीय जनता पार्टी को मिलने वाला है। 2009 के आम चुनाव से पहले वाम मोर्चे ने पिनारयी विजयन के प्रभाव में आतंकवादी घटनाओं के लिए आरोपित अब्दुल नासर मदनी की पार्टी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी को अपने साथ लिया था। मतदाताओं पर इसका विपरीत प्रभाव हुआ और चुनाव में वाम मोर्चे को केवल चार सीटें मिली। इस बार विजयन ने शबरीमला मामले में हिन्दू विरोधी रवैया अपनाकर एक बड़े वर्ग को नाराज कर दिया है। लेकिन शबरीमला आंदोलन का नेतृत्व भाजपा के हाथ में था।
बाद में कांग्रेस ने उसे समर्थन अवश्य दिया, पर वह उसका श्रेय लेने की स्थिति में नहीं है। भाजपा ने गठबंधन में वायनाड सीट भारत धर्म जनसेना के लिए छोड़ दी है और उसके अध्यक्ष तुषार बेलापल्ली मैदान में हैं। कांग्रेस को अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक वर्ग के अपने पुराने चुनावी समीकरण पर भरोसा है जो इस संसदीय क्षेत्र में बहुसंख्या में हैं। अलबत्ता अपने आपको शिवभक्त बताते-बताते राहुल गांधी अंतत: मुस्लिम लीग की शरण में पहुंच गए हैं।

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