चुनावी प्रतिस्पधा हमारी आर्थिक नीतियों को दिशा हीन बना रही है। इसका सबसे ताजा उदाहरण राहुल गांधी की यह घोषणा है कि सत्ता में पहुंचने परवे देश के हर गरीब परिवार को न्यूनतम आय उपलब्ध करवाएंगे। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद राहुल गांधी के हौसले बढ़ गए हैं। उन्हें लग रहाहै कि देश में उनकी और कांग्रेस की स्वीकार्यता बढ़ गई है। अगर वे कुछ लोक-लुभावन घोषणा एंकर दें तो लगभग दो महीने बाद होने वाले आम चुनाव में वे सत्ता के करीब पहुंच सकते हैं। इस समय सभी दल मतदाताओं को आकर्षित करने की रणनीति बना रहे हैं। केंद्र सरकार ने हाल ही में सामान्य वर्ग के गरीब परिवारों के लिए सरकारी नौकरी और शिक्षा में दस प्रतिशत की आरक्षण की घोषणा की थी। संसद में इस विधेयक परचर्चा के समय कांग्रेस इसका विरोध नहीं कर सकती थी। ऐसा करना मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को नाराज करना होता। उसने यह अवश्य कहा कि ठीक चुनाव से पहले यह विधेयक लानेका उद्देश्य राजनीतिक है।

लोक-लुभावन घोषणाओं के बल पर मध्य प्रदेश, राजस्थान और
छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद राहुल गांधी
के हौसले बढ़ गए हैं। आगामी आम चुनाव के मद्देनजर राहुल
गांधी ने घोषणा की है कि सत्ता में पहुंचने पर वे देश के हर गरीब
परिवार को न्यूनतम आय उपलब्ध करवाएंगे। ऐसी घोषणाएं भले
ही राहुल को सत्ता में पहुंचा दें लेकिन ये चुनावी प्रतिस्पर्द्धा हमारी
आर्थिक नीतियों को दिशाहीन बना रही है।

लेकिन वह सरकार को उसे पारित करवाने से रोक नहीं पाई। तभी से कांग्रेस के रणनीतिकार भारतीय जनता पार्टी के इस कदम की काट करने की योजना बना रहे थे। अंतत: राहुल गांधी को यह सुझाव स्वीकार हुआ कि वे कांग्रेस सरकार की ओर से हर गरीबपरिवार को न्यूनतम आय दिए जाने की घोषणा करें। उनकी इस घोषणा की अब तक सबसे तीखीआलोचना बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने की है। उन्होंने राहुल गांधी पर झूठे वादे करने का आरोप लगाते हुए पूछा कि क्या उनकी यह घोषणा इंदिरा गांधी के गरीबी हटाओ के नारे की तरह का एक क्रूर मजाक नहीं है? अगरवे अपनी इस घोषणा को व्यावहारिक समझते हैं तो उसे कांग्रेस शासित राज्यों में लागू करवाने के लिए कदम क्यों नहीं उठाते? विपक्ष के ही एक महत्वपूर्ण नेता द्वारा राहुल गांधी की घोषणा की इतनी तीखी आलोचना से विपक्षी महागठबंधन की भी कलई खुल जाती है। उनकी जीत राजनैतिक अराजकता का मार्ग ही प्रशस्त करेगी। हमने जो राज्य व्यवस्था स्वीकार की है, उसमें राज्य ने सामाजिक कल्याण की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले रखी है। इसलिए यह देखना उसी का दायित्व है कि देश के सभी नागरिकों के पास अपने भरण-पोषण के साधन हैं या नहीं। इसमें संदेह नहीं कि पराधीनता के काल में हमारे उत्पादक साधनों की काफी क्षति हुई थी और देश  के काफी बड़े वर्ग को गरीबी में धकेल दिया गया था। उस गरीबी को हम स्वतंत्रता के सात दशकों बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाए। समय समय पर ऐसे सभी लोगों को लेकर चिंता व्यक्तकी जाती रही है और अब तक की सभी सरकारें उन्हें गरीबी से उबारने के कुछ न कुछ प्रयत्न करती रही हैं। जिन परिवारों के पास अपने भरण-पोषण के साधन नहीं हैं, उन्हें उत्पादक काम उपलब्ध करवाकर इस असमर्थता से निकालने का संवैधानिक दायित्व सरकारों का है। लेकिन ऐसे परिवारों को उत्पादक काम उपलब्ध करवाना एक बात है और उन्हें खैरात बांटना दूसरी बात है। जो लोग शरीर से असमर्थ हंै या वयोवृद्ध होनेके कारण काम नहीं कर सकते, उनके भरण-पोषण की जिम्मेदारी राज्य लें, इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती। लेकिन गरीब लोगों को काम-धंधे उपलब्ध करवाने की जगह खैरात के रूप में पैसे बांटना सामाजिक कल्याण की जगह सामाजिक अकल्याण ही होगा। इस तरह की किसी योजना पर अब तक कोई गंभीर विचार हुआ हो, ऐसी बात भी नहीं है। राहुल गांधी कोयह घोषणा करने से पहले अपनी पार्टी के भीतर ही उसके सभी पहलुओं पर विचार करवा लेना चाहिए था। उसके बिना उनकी घोषणा चुनावी नारे से अधिक महत्व नहीं रखती। मायावती का यह आक्षेप सही है कि राहुल गांधी ने चुनाव जीतने केलिए एक झूठा वायदा भर किया है, जो गरीब लोगोंके साथ किया गया मजाक ही है। हमारे नेताओं को इस तरह की चुनावी प्रतिस्पर्द्धा से बचना चाहिए। पश्चिमी देशों में इस तरह के उपाय किएजाते रहे हैं। अधिकांश पश्चिमी देशों में उन लोगोंको बेरोजगारी भत्ता दिया जाता है, जिन्हें किसी कालावधि में रोजगार प्राप्त नहीं होता। इसी तरहजो अपना भरण-पोषण और अपनी देखभाल स्वयं नहीं कर सकते, उन्हें भी राज्याश्रित रहने की व्यवस्था है। इन सब व्यवस्थाओं के लिए पश्चिमी औद्योगिक देशों की सरकारें अपनेनागरिकों पर भारी कराधान का सहारा लेती है। वहां सामान्यत: हर नागरिक को अपनी आय का40 से 45 प्रतिशत कर देना पड़ता है। औद्योगिक देशों में संपन्नता का वह स्तर छू लिया गया है, जहां इतना कराधान भी अखरता नहीं है। यह संपन्नता उन्हें अपने औद्योगिक विकास से ही नहींमिल गई। उसकी नींव उस औपनिवेशिक काल में पड़ी थी, जब पश्चिमी देश अधिकांश विश्व कोअपना उपनिवेश बनाए हुए थे। भारत जैसे देशों में न ऐसी संपन्नता है और न यहां इतना कराधानसंभव है। समाज कल्याण की इन व्यवस्थाओं काएक दूसरा पहलू भी है। पश्चिमी देशों में सामान्य आय और बेरोजगारी भत्ते के बीच तो इतना अंतरहै कि कोई नागरिक बेरोजगारी भत्ते पर रहने के बजाय रोजगार पाना अधिक पसंद करेगा। इसके अलावा वहां रोजगार के अवसर उपलब्ध हैं। औद्योगिक देशों में बेरोजगारी की दर दस प्रतिशततक पहुंच जाए तो उपद्रव होने शुरू हो जाते हैं। अपने यहां साधन हीन लोगों का अनुपात इससे कहीं अधिक है। इसके अलावा गरीबी अगर लंबेसमय तक रहे तो वह अक र्मण्यता पैदा करती है।

भारतीय समाज में खैरात की जो अवमानना है वह दुर्भाग्य से आज के अर्थशास्त्रियों में नहीं है। अर्थशास्त्रियों को जिस तरह सिखाया-पढ़ाया जाता है, उसमें हर मनुष्य को उत्पादक और उपभोक्ता के रूप में ही देखा जाता है।

उसे काम-धंधे बढ़ाकर ही दूर किया जा सकताहै। खैरात बांटने से वह अकर्मण्यता तो बढ़ती ही है और फिर उसके काफी बुरे परिणाम पूरे समाज को उठाने पड़ते हैं। हमारा ध्येय नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए। उन्हें पराश्रित बनाकर हम उनके आत्मसम्मान और क्रियाशीलता से खिलवाड़ ही कर रहे होंगे। क्या राहुल गांधी को सत्ता मिले तो वे सचमुच ऐसा करना चाहेंगे ? भारतीय समाज में खैरात की जो अवमाननाहै वह दुर्भाग्य से आज के अर्थशास्त्रियों में नहीं है। अर्थशास्त्रियों को जिस तरह सिखाया-पढ़ाया जाता है, उसमें हर मनुष्य को उत्पादक और उपभोक्ता के रूप में ही देखा जाता है। औद्योगिक क्रांति के बाद अर्थशास्त्रियों में यह भ्रामक धारणा फैली कि उत्पादन को मनुष्य की बजाय मशीनों से करवाना अधिक लाभप्रद है। मनुष्य की उपयोगिता उसके उपभोक्ता होने में ही है। वह उपभोग नहीं करेगा तो वस्तुओं की मांग नहीं पैदा होगी और तब उत्पादन तंत्र को चलाना कठिन हो जाएगा। क्योंकि मशीनीकरण बड़े पैमाने के उत्पादन में ही लाभप्रद साबित होता है। हमारे यहां पचास वर्ष पहले बी.एम. दांडेकर ने एक किताब लिखी थी, जिसका शीर्षक था ‘पॉवर्टी इन इंडिया’। उसमें उन्होंने यह तर्क दिया था कि देश में बड़े पैमाने पर मशीनीकरण होना चाहिए। उससे जो बेरोजगारी पैदा होगी उसकी समस्या सबको र्प्याप्त धनबांटकर की जा सकती है। इस धन को व्यय करके वे वस्तुओं की मांग पैदा कर सकते हैं। मशीनी उत्पादन तंत्र को इस तरह संभाला जा सकता है। यह तर्क असल में पूंजीवादी अर्थशास्त्रियों के बीचअधिक प्रचलित है, पर उसकी नींव कार्ल मार्क्स की इस उक्ति से पड़ गई थी कि औद्योगिक प्रगति के अंतिम दौर में मशीन इतना उत्पादन कर देंगी कि लोग काम करने के लिए मजबूर न हो। वेइच्छा हो तो काम करें वरना उनकी आवश्यकताकी प्रचुर सामग्री मशीनें ही पैदा कर देंगी। यह एक तरह का रोमांटिक विचार था। पर आज भी बहुत से अर्थशास्त्री उससे चिपके हुए हैं। मनुष्य को उत्पादक से मात्र उपभोक्ता बनाना उसकी क्रियाशीलता को समाप्त कर देना ही होगा और ऐसा समाज विकृतियां पैदा करेगा। यह देखने-समझने की कोशिश हमारे अर्थशास्त्रियों को नहीं लगती। राहुल गांधी को अगर सचमुच गरीब परिवारों की चिंता होती तो सबसे पहले वे ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को और विस्तार देने की वकालत करते। यह योजना कांग्रेस के शासनकाल में ही शुरू हुई थी। 2008 में महात्मा गांधी का नाम इस योजना से जोड़कर उसे और अधिक सार्थक बनाने की कोशिश की गई। इस योजना के अंतर्गत पंचायतों के माध्यम से हर परिवार को वर्ष में कम से कम सौ दिन न्यूनतम वेतन के आधार पर काम उपलब्ध करने की व्यवस्था है। उसे और बढ़ाकर वर्षपर्यंत किया जा सकता है। इसके अलावा कामों का स्वरूप तय करने के बजाय गांवों के आधारभूत ढांचे को विकसित करकेउनका कायाकल्प करने की योजना में इस रोजगार देने की योजना को समाहित किया जा सकता है। जब से यह योजना आरंभ हुई है किसानी खतरे में पड़ गई है क्योंकि समय पर किसानों को अपनी खेती बाड़ी में सहायता के लिए मजदूर नहीं मिलते। इस समस्या के समाधान के लिए इस योजना को लचीला और व्यावहारिक बनाते हुए कृषि की उन्नति से भी जोड़ा जा सकता है। इस योजना के बारे में यह शिकायत भी मिलती रही है कि योजना के अंतर्गत करवाए जाने वाले काम अनुत्पादक होते हैं। योजनाओं को लागू करने का खर्च गरीब लोगों को मिलने वाले लाभ से पांचगुना अधिक है। इन सब पहलुओं की जांच होनी चाहिए और यह योजना ऐसी बननी चाहिए कि वह देश को एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ानेके काम आ सके। कांग्रेस अपने द्वारा शासित राज्यों में इस योजना का स्वरूप सुधारने और विस्तार करने का काम करे तो उसे अधिक राजनैतिक लाभ होगा। चुनावी प्रतिस्पर्द्धा में देश की आर्थिक नीतियों को दिशाहीन बना देना कालांतर में उसे भी नुकसान पहुंचाएगा। यह बात कांग्रेस के नेताओं को समझनी चाहिए।

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