हाल ही में पोलैण्ड के शहर काटोविस में संसार के 200 देशों की सरकारों के प्रतिनिधि इकट्ठा हुए, वे 2015 में पेरिस में जलपायु परिवर्तन को रोकने के लिए हुए समझौते की आगे की दिशा तय करने के लिए इकट्ठा हुए थे। लगभग दो सप्ताह की माथापच्ची के बाद वे एक विस्तृत नियम पुस्तिका पर सहमत हो गए। इन दो सौ देशों में फिलहाल अमेरिका शामिल है। लेकिन जिस तरह डोनाल्ड ट्रम्प ने पेरिस समझौते का मजाक उड़ाया था और अमेरिका ने उस समझौते से हाथ खींचने की कोशिश की थी, उसे देखते हुए भविष्य के बारे में कुछ भी कहना मुश्किल है। पेरिस समझौते को उस समय मील का पत्थर बताया गया था, क्योंकि उसमें कार्बन उत्सर्जन को औद्योगिक क्रांति के पूर्व के स्तर पर लाने का संकल्प लिया गया था। लेकिन यह कैसे संभव होगा, इसके बारे में काफी कुछ अनिश्चितता थी।

जलवायु परिवर्तन एक ऐसी समस्या है, जिसे दुनिया के सभी देश अनुभव कर रहे हैं। यह सीधे-सीधे औद्योगिक क्रांति का परिणाम है। काटोविस में इस बाबत एक नियम पुस्तिका बनी है, लेकिन सवाल उठता है कि क्या सिर्फ नियम बनाने से जलवायु परिवर्तन रुक सकेगा।

काफी कुछ समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देशों की इच्छा पर छोड़ दिया गया था। अब एक विस्तृत नियम पुस्तिका बना दी गई है। इसमें दर्ज नियमों पर भी काफी बहस हुई और अनेक किन्तु-परंतु सामने आए। लेकिन अंतत: सभी देश उस पुस्तिका में दर्ज नियमों पर अपनी सहमति देने के लिए तैयार हो गए। यह नियम पुस्तिका सभी देशों को कार्बन उत्सर्जन रोकने की अपनी रणनीति संबंधी व्यापक ब्यौरे देने से संबंधित है। अब देशों को बताना होगा कि उन्होंने किन सरकारी और निजी क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन रोकने के कौन से उपाय किए हैं और उससे वास्तव में कितना कार्बन उत्सर्जन रुकेगा। इससे कार्बन उत्सर्जन को रोकने की रणनीति को लेकर एक पारदर्शिता आएगी और यह समझना आसान होगा कि कार्बन उत्सर्जन को लेकर जो लक्ष्य रखे गए हैं, उन्हें पाने की दिशा में कितना आगे बढ़ा जा सका है। पेरिस समझौते को लेकर अब तक दो तरह की दुविधाएं थीं। असल में औद्योगिक देश अपने यहां कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने में एक हद तक सफल हुए हैं, क्योंकि उन्होंने ऊर्जा के कम प्रदूषण पैदा करने वाले साधनों पर अपनी निर्भरता बढ़ा दी है। इसके अलावा साधन संपन्न होने के कारण वे ऐसी प्रौद्योगिकी का विकास और उपयोग करने में सक्षम हैं, जो कार्बन को वायुमंडल में जाने से रोक सकें। जो देश औद्योगिक रूप से इतने संपन्न नहीं है, उनके पास न प्रौद्योगिकी है और न ऊर्जा के कम प्रदूषण फैलाने वाले साधनों के उपयोग की सुविधा, क्योंकि उसके लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय निवेश की आवश्यकता होती है। इस कठिनाई से पार पाने के लिए यह तय किया गया था कि संपन्न औद्योगिक देश सौ अरब डॉलर का एक कोष खड़ा करेंगे जिससे कार्बन उत्सर्जन रोकने की गैर-औद्योगिक देशों की कोशिशों को सहयोग और सहायता दी जा सकेगी। लेकिन औद्योगिक देश साधन जुटाने के मामले में हीला-हवाला करते हैं। डोनाल्ड ट्रम्प के आने के बाद अमेरिका ने तो अपनी जिम्मेदारी से सीधे हाथ झाड़ लिए थे। अब वह कितना सहयोग करेंगे, यह देखना होगा। काटोविस में जिस नियम पुस्तिका पर सहमति दर्ज की गई है, उसमें संपन्न देशों को भी वित्तीय साधन जुटाने की अपनी कोशिशों को निरंतर बताते रहना पड़ेगा। उन्हें भी यह स्पष्ट करना होगा कि वे कब और कितने वित्तीय साधन इस उद्देश्य के लिए उपलब्ध करने वाले हैं। अब तक का अनुभव कोई बहुत आश्वस्त करने वाला नहीं है। लेकिन देश अगर एक बार एक नियम पुस्तिका पर राजी हो जाते हैं तो उसके पालन का कुछ दबाव तो बनता ही है। इसी आधार पर हम काटोविस की नियम पुस्तिका को उपलब्धि कह सकते हैं। जलवायु परिवर्तन एक ऐसी समस्या है, जिसे दुनिया के सभी देश अनुभव कर रहे हैं। यह सीधे-सीधे औद्योगिक क्रांति का परिणाम है। औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन और उपभोग में एक तरफ अकूत ऊर्जा खर्च होती है और ऊर्जा के अधिकाधिक उपयोग ने कार्बन उत्सर्जन बढ़ाया है। दूसरी तरफ औद्योगिक वस्तुओं के उपभोग से भी काफी कार्बन उत्सर्जन होता है। अमेरिका में ताप को नियंत्रित करने की कोशिश में ही काफी कार्बन उत्सर्जन हो जाता है। इसलिए इस समस्या से निपटने की प्राथमिक जिम्मेदारी औद्योगिक देशों की ही है। लेकिन अगर सचमुच कार्बन उत्सर्जन को औद्योगिक क्रांति के पूर्व के स्तर तक ले जाना है तो औद्योगिक देशों को अपना रहन-सहन बदलना पड़ेगा। इसके लिए वे तैयार नहीं है। वे यह चाहते हैं कि जो देश अपने औद्योगीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, वे अब ऐसी रणनीति अपनाएं, जिससे कार्बन उत्सर्जन नियंत्रित रहे। इसका सीधा-सा अर्थ यह हुआ कि वे अपनी जिम्मेदारी गैर-औद्योगिक देशों के सिर पर डाल देना चाहते हैं। भारत समेत औद्योगीकरण की दिशा में बढ़ रहे सभी देशों का यह मानना है कि यह सरासर अन्याय है। वे जलवायु परिवर्तन को रोकने या ओजोन की परत का संरक्षण करने के लिए अपने भौतिक ताने-बाने के आवश्यक परिवर्तन को विराम नहीं दे सकते। बहरहाल मध्य मार्ग यह निकला है कि औद्योगिक देश प्रदूषण नियंत्रण की प्रौद्योगिकी उपलब्ध करवाएंगे और कम संपन्न देशों को ऊर्जा के कम प्रदूषण वाले साधनों पर स्थानांतरण के लिए वित्तीय सहयोग भी देंगे। अब चूंकि इसकी नियमावली बन गई है इसलिए आशा की जानी चाहिए कि सभी देश अपनी जिम्मेदारी समझेंगे। इस तरह के समझौतों को लागू होने में अनेक तरह की समस्याएं आती हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका सबसे समृद्ध और औद्योगिक रूप से विकसित देश है, लेकिन 2008 से वहां जो मंदी का दौर शुरू हुआ, उसने अमेरिका को यह सोचने पर बाध्य कर दिया कि वह उद्योग धंधों के प्रदूषण से बचने के लिए उन्हें चीन या दूसरे देशों में स्थानांतरित करता रहा है, इसके बुरे आर्थिक परिणाम उसके नागरिकों पर पड़े हैं। उसे अपनी रणनीति पर फिर से सोचना पड़ रहा है और अपने यहां के औद्योगिक तंत्र का विस्तार करना पड़ रहा है। लेकिन अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा को देखते हुए वह ऊर्जा के महंगे साधनों पर निर्भर नहीं रह सकता। इसलिए डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनने के बाद कहा कि वे कोयले को ऊर्जा के साधन के तौर पर इस्तेमाल करेंगे। अमेरिका में कोयले के पर्याप्त भंडार है, जिन्हें प्रदूषण नियंत्रित करने के उद्देश्य से छोड़ दिया गया था। अब अगर अमेरिका जैसा अमीर और संपन्न देश कोयले के इस्तेमाल पर लौटेगा तो आप दूसरे देशों को ऐसा करने से कैसे रोक सकते हैं। इसी तरह से औद्योगिक रूप से संपन्न देशों ने अपने नागरिकों को उपभोग का एक ऊंचा स्तर अवश्य उपलब्ध करवा दिया है, पर अधिकांश औद्योगिक देशों की आंतरिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। उनके यहां कार्यक्षम जनसंख्या घट रही है और उन्हें आए दिन बाजार के सिकुड़ने का खतरा भी सताता रहता है। ऐसी स्थिति में वे संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए बनाए जा रहे कोष में कितना सहयोग दे पाएंगे इसे लेकर शंका बने रहना स्वाभाविक है। अधिकांश यूरोपीय देश इस समय आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। अब तक केवल जर्मनी इससे बचा हुआ था, अब वह भी समस्याओं से घिर गया है। आज यह कहना मुश्किल है कि अगले एक या दो दशक बाद क्या स्थिति होगी। अर्थशास्त्री जो कागजी खाका खींचकर भविष्य की सुनहरी तस्वीर बनाते हैं, वह अब तक अवास्तविक ही सिद्ध होती रही है। औद्योगिक देशों का कायाकल्प दूसरे महायुद्ध के बाद होना शुरू हुआ था। उच्च स्तर के औद्योगिक जीवन स्तर को पाने में यूरोप- अमेरिका को 1950 से 1970 तक 20 वर्ष लगे। लेकिन उस शिखर तक पहुंचने के बाद से ही उन्हें समस्याएं महसूस होना शुरू हो गईं। ऊंचे औद्योगिक जीवन स्तर का अर्थ महंगा रहन-सहन निकला। 1970 के बाद अमेरिका और यूरोप में परिवार का खर्च उठाने के लिए पति-पत्नी दोनों का काम करना आवश्यक हो गया। रोजगार सिकुड़ना शुरू हुआ तो परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो गया। सामाजिक कलह बढ़ी और परिवार टूटने शुरू हो गए। आज अमेरिका में 40 प्रतिशत विवाह विच्छेद में बदल रहे हैं। इससे बच्चों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। जलवायु परिवर्तन का फिर भी कोई उपाय ढूंढ़ा जा सकता है, लेकिन सामाजिक जीवन में जो उथल-पुथल होती जा रही है, उसका उपाय ढूंढ़ना और मुश्किल होगा। इसलिए यूरोप- अमेरिका में जो जीवनशैली और उपभोग का ऊंचा स्तर विकसित हुआ है, उसे आदर्श मानने की भूल से बचना चाहिए। आज भारत सहित दुनियाभर में उसी का अनुकरण हो रहा है। लेकिन औद्योगिक देशों के भीतर झांककर देखें तो समझ में आएगा कि वह उतना अनुकरणीय है नहीं। भारत को अपनी सभ्यता के अनुभव से ही अपना रास्ता खोजना चाहिए और विकास की अंधी दौड़ में नहीं पड़ना चाहिए। औद्योगिक क्रांति ने अप्राकृतिक जीवन को बढ़ावा दिया है और ऐसे नाभिकीय अस्त्र विकसित कर दिए हैं, जो पूरी धरती को एक बार में ही समतल कर सकते हैं। ऐसी औद्योगिक क्रांति वरदान तो नहीं कही जा सकती। 

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