अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या आधी करने के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के फैसले ने पाकिस्तान को उत्साहित कर दिया है। अफगानिस्तान में अपने सैनिकों की संख्या आधी करने की घोषणा से दो दिन पहले डोनाल्ड ट्रम्प सीरिया से अपने दो हजार सैनिक वापस बुलाने की घोषणा कर चुके थे। इसलिए पाकिस्तान को लग रहा है कि अमेरिका अफगानिस्तान से जल्द ही अपने बाकी सैनिक भी वापस बुला सकता है। इससे अफगानिस्तान में पाकिस्तान समर्थित तालिबान की सरकार बन सकती है। इस संभावना के पैदा होते ही पाकिस्तान ने अपने विदेश मंत्री शाह मोहम्मद कुरैशी को ईरान, अफगानिस्तान और चीन की यात्रा पर भेज दिया। ईरान भी अमेरिका से त्रस्त है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ईरान और अमेरिका के बीच हुए नाभिकीय समझौते से हाथ खींच चुके हैं और ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। इसलिए ईरान में अमेरिका विरोधी भावनाएं होना स्वाभाविक है। ईरान को अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार बनने के बारे में कुछ आशंकाएं हो सकती हैं, उन्हीं को दूर करने के लिए पाकिस्तान ने शाह मोहम्मद कुरैशी को ईरान भेजने का निर्णय किया। इसी तरह पाकिस्तान अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार की थाह लेना चाहता है कि वह इस फैसले को किस दृष्टि से देख रही है। अफगानिस्तान के वर्तमान शासक पाकिस्तान और तालिबान दोनों के गठजोड़ को हमेशा आशंका की दृष्टि से देखते रहते हैं। इसलिए वे हरसंभव कोशिश करेंगे कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी जितनी टलवाई जा सके, उतना अच्छा है। इसके अलावा अफगानिस्तान में तालिबान से इतर शक्तियों को भी इकट्ठा करने की कोशिश की जाएगी। पाकिस्तान इसी सब की थाह लेना चाहता है। अमेरिका अफगानिस्तान की 17 साल से चल रही लड़ाई से थक चुका है। यह बात बराक ओबामा के शासनकाल में ही स्पष्ट हो गई थी। बराक ओबामा ने अमेरिकी सैनिकों की वापसी की समय-सीमा तय कर दी थी।

राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रंप लगातार यह कहते रहे हैं कि अमेरिका दुनिया की चौकीदारी नहीं कर सकता। उसे अपने सैनिकों का नाहक खून बहाने और अमेरिकी पैसा बर्बाद करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए यह खतरा तो था ही कि वे देर-सबेर अफगानिस्तान से अपने हाथ खींच सकते हैं। लेकिन ऐसा इतनी जल्दी और अचानक हो जाएगा, इसकी उम्मीद अमेरिकी प्रतिष्ठान में बैठे उनके सहयोगियों को भी नहीं थी।

लेकिन सत्ता में पहुंचने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प को यह समझाया गया कि अफगानिस्तान को अधर में छोड़ना अमेरिकी प्रतिष्ठा के लिए अच्छा नहीं होगा। जब तक अफगानिस्तान में शांति नहीं हो जाती, अमेरिकी सैनिकों का वहां से वापस आना अमेरिकी सेना की हार माना जाएगा। इस तर्क ने डोनाल्ड ट्रम्प को शुरू में प्रभावित किया। इसलिए अमेरिकी सैनिकों की वापसी का निर्णय स्थगित रखा गया। लेकिन अपने चुनाव अभियान के दौरान स्वयं डोनाल्ड ट्रम्प ने दुनियाभर के स्थानीय संघर्षों में अमेरिका के फंसने की नीति का विरोध किया था। राष्ट्रपति बनने के बाद भी वे लगातार यह कहते रहे हैं कि अमेरिका दुनिया की चौकीदारी नहीं कर सकता। उसे अपने सैनिकों का नाहक खून बहाने और अमेरिकी पैसा बर्बाद करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए यह खतरा तो था ही कि वे देर-सबेर अफगानिस्तान से अपने हाथ खींच सकते हैं। लेकिन ऐसा इतनी जल्दी और अचानक हो जाएगा, इसकी उम्मीद अमेरिकी प्रतिष्ठान में बैठे उनके सहयोगियों ने भी नहीं की थी। डोनाल्ड ट्रम्प की घोषणा से स्वयं उनके रक्षामंत्री जिम मैटिस इतने आहत हुए कि उन्होंने सीरिया से अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाए जाने की घोषणा के समय ही अपना इस्तीफा भेज दिया। अपने इस्तीफे में उन्होंने डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों की सीधे आलोचना की है। वे अफगानिस्तान में भी अमेरिकी सैनिकों की उपस्थिति बनाए रखने के पक्ष में रहे हैं। अब तक अमेरिका पाकिस्तान पर दबाव बना रहा था कि वह अपने आतंकवादी तंत्र का अफगानिस्तान को अशांत बनाए रखने के लिए इस्तेमाल न करे।
पाकिस्तान अमेरिका को तालिबान से समझौता करके शांति की संभावनाएं तलाशने की नसीहत दे रहा था। पिछले दिनों अमेरिका ने तालिबान से बातचीत की प्रक्रिया शुरू की थी। लेकिन वह कोई शक्ल ले पाती, इस बीच डोनाल्ड ट्रम्प का सीरिया से अमेरिकी सैनिकों की विदाई और अफगानिस्तान में उनकी संख्या आधी करने का फैसला आ गया। इसके बाद बातचीत में तालिबान की कोई रुचि नहीं रहने वाली है। वे अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों के बने रहने में मुश्किल खड़े करने की कोशिश करेंगे। हो सकता है इसकी प्रतिक्रिया में अमेरिकी सैनिकों की वापसी लंबी ही खिंचे। तालिबान अब उतनी संगठित शक्ति नहीं है। पाकिस्तान किसी भी तरह भारत को अफगानिस्तान से बाहर करना चाहता है। ऐसा तभी हो सकता है जब सत्ता पूरी तरह तालिबान के हाथ में आ जाए। चीन इस पूरे मामले में पाकिस्तान के साथ रहा अवश्य है, लेकिन उसकी दिलचस्पी आतंकवादी तंत्र को निष्क्रिय करवाने में ही रही है। वह अपनी औद्योगिक कॉरिडोर की कुछ परियोजनाएं अफगानिस्तान में भी शुरू करने के लिए उत्सुक था।
उसने भारत से भी यह प्रस्ताव किया था कि भारत और चीन मिलकर अफगानिस्तान में कुछ परियोजनाएं शुरू कर सकते हैं। लेकिन इस दिशा में बात विशेष आगे नहीं बढ़ी। पाकिस्तान चीन की इस पहल से प्रसन्न नहीं था। लेकिन वह सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी करने से बचता रहा। अब नई परिस्थितियों में वह चीन को आश्वस्त करना चाहता है कि तालिबान सत्ता में आए तो चीन के हितों को खतरा नहीं होगा। पाकिस्तान और चीन के विदेश मंत्रियों की बातचीत का कोई ठोस नतीजा निकला हो, अभी ऐसा नहीं लगता। चीन अफगानिस्तान से अमेरिका की विदाई का स्वागत ही करेगा। लेकिन तालिबान के बारे में उसकी आशंकाएं बनी रहने वाली हैं। अफगानिस्तान में तालिबान के शासन का अर्थ इस पूरे क्षेत्र में इस्लामी कट्टरवाद को बढ़ावा मिलना है। चीन इसे अपने हित में नहीं मानता।
अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने से उसकी उईगर समस्या भी जटिल हो सकती है। चीन जानता है कि सत्ता में आने के बाद तालिबान पाकिस्तान के नियंत्रण में नहीं रहेंगे। पिछली बार अफगानिस्तान से रूस की विदाई के बाद जब वहां तालिबान की सरकार बनी थी तो उसने अपनी स्वतंत्र नीति अपनाई थी। तालिबान चीन के बारे में भी अपनी स्वतंत्र नीति ही रखेंगे। शिनजियांग प्रांत को नियंत्रित करने में चीन को काफी मेहनत करनी पड़ रही है। अगर तालिबान शिनजियांग के उईगर आतंकवादी संगठनों की हिमायत करते हैं तो चीन की मुश्किल बढ़ सकती है। इसलिए अभी चीन इन नई परिस्थितियों के बारे में कोई स्थिर राय नहीं बनाना चाहेगा। उसने पाकिस्तान के विदेश मंत्री से यही कहा है कि चीन अफगानिस्तान में शांति स्थापित होते देखना चाहता है। इस दिशा में जो भी पहल होगी, चीन उसका स्वागत करेगा। स्पष्ट है कि पाकिस्तान इतने भर से संतुष्ट नहीं होगा। वह चाहेगा कि चीन अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी का सक्रिय समर्थन करे। बहरहाल अभी नहीं लगता कि अपने उस उद्देश्य में शाह मुहम्मद कुरैशी को कोई बड़ी सफलता मिली है। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी भारत के लिए बुरी खबर ही है।
उसे उम्मीद थी कि अमेरिका पाकिस्तान पर आतंकवादी तंत्र से हाथ खींचने के लिए दबाव बनाता रहेगा और वह अफगानिस्तान में शांति बहाली के लिए प्रयत्न करता रहेगा। भारत ने अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत का भी विरोध किया था। भारत का तर्क था कि इस्लामी आतंकवाद सबके लिए खतरा है और आतंकवादियों के बीच अच्छे और बुरे का फर्क नहीं किया जा सकता। अब तक अफगानिस्तान की शांति प्रक्रिया में भारत को हिस्सेदार रखा गया है। भारत की सकारात्मक भूमिका को अमेरिका और चीन दोनों स्वीकार करते रहे हैं। लेकिन अब जो परिस्थितियां पनप रही है, उसमें भारत का अफगानिस्तान में निवेश भी खतरे में पड़ जाएगा और उसे अपनी भूमिका भी सीमित करनी पड़ेगी। यह सही है कि अमेरिकी सैनिकों की पूरी विदाई तक भारत इंतजार करेगा और जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेगा। भारत को इस मामले में ईरान और रूस दोनों को भी टटोलना होगा। भारत, ईरान और रूस मिलकर जो उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर बना रहे हैं, उसके बारे में भी कुछ पुनर्विचार की नौबत आ सकती है। नई परिस्थितियों में रूस क्या रुख अपनाता है, यह भी देखना होगा। उसने सीरिया से अमेरिकी सैनिकों की विदाई पर अपनी प्रसन्नता जाहिर की। ईरान और रूस सीरिया के मामले में एकसी नीति अपना रहे हैं। अफगानिस्तान के मामले में भी उनमें बातचीत हो सकती है। भारत को इन सब परिस्थितियों पर नजर रखे रहनी होगी। अमेरिका ने अफगानिस्तान को अभी तो अधर में लटका ही दिया है।
पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में तेजी से परिवर्तन हुए हैं। हिंद- प्रशांत क्षेत्र में भी भारत और अमेरिका के बीच निकटता पैदा होने के कारण एक नई रणनीति पर काम शुरू हुआ था। उसके बारे में भी अब कुछ अनिश्चितता पैदा होगी, इन सब परिवर्तनों से चीन कुछ उत्साहित ही अनुभव करेगा। अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय भूमिका जितनी कम होगी, चीन अपनी अंतरराष्ट्रीय भूमिका उतनी ही बढ़ाएगा। भारत को इन बदलती हुई परिस्थितियों में फिर से अपनी रणनीति पर विचार करना होगा। आने वाले वर्ष में भारत में जो सरकार बनेगी, उसे इन सब परिस्थितियों पर माथापच्ची करनी पड़ेगी।

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