नि श्चित रूप से केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के दो शिखर अफसरों के बीच कुत्ते-बिल्ली की तरह एक दूसरे पर सरेआम आक्रमण करने से देश की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई की छवि तार-तार हो गई है। अगर इनमें आपस में कोई विवाद और टकराव के बिन्दु थे, तब भी उन्हें मिल-बैठकर आसानी से सुलझाया जा सकता था। इसके विपरीत इन्होंने ‘अहं’ के टकराव में सरकारी अधिकारी की सीमाओं, मयार्दाओं और आचार संहिता को नहीं समझा। इनके आचरण के कारण सीबीआई की साख मिट्टी में मिल गई है। क्या कभी इन दोनों ने यह भी सोचा कि इनकी ‘महाभारत’ से सीबीआई की साख किस हद तक गिर जाएगी? सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने एक-दूसरे
पर जमकर करप्शन के आरोप लगाए। आरोप लगाना सबसे आसान और उसे सिद्ध करना सबसे कठिन होता है। यह टेढ़ी खीर सीबीआई के शीर्ष अफसर कैसे भूल गए। दोनों में शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा था। इस बार तो विवाद सारी हदों को पार कर गया। ये सड़क छाप ‘टुच्चे मवालियों’ के अंदाज में लड़ते रहे। जाहिर है कि इनके इस रवैये के कारण सीबीआई का पूरा कामकाज महीनों तक प्रभावित होता रहा। इस बीच के घटनाक्रम में सीबीआई ने राकेश अस्थाना के खिलाफ घूस लेने के मामले में एफआईआर तक दर्ज कर दी। सीबीआई में आरसी यानी रेगुलर केस या एफआईआर दर्ज
करने की एक जटिल प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में कई बार तो वर्षों लग जाते हैं। पहले आरोप सीबीआई के संज्ञान में आने पर ‘पीई’ या प्रिलिमिनरी इंक्वायरी (प्राथमिक जांच) की प्रक्रिया शुरू होती है। टीम गठित होती है। जांच के हर स्टेज पर मिले साक्ष्य को सीबीआई का लीगल सेल ठोक-ठोठाकर पक्की तरह जब संतुष्ट हो जाता है, तभी आरसी होता है। राकेश अस्थाना पर मीट कारोबारी मोईन कुरैशी से रिश्वत लेने का आरोप है। वैसे जांच की प्रक्रिया पूरी किये बिना एक वरिष्ठ अधिकारी पर आरसी लाना शर्मनाक है। दूसरी तरफ, सरकार ने आलोक वर्मा और अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया है।

सीबीआई के दो आला अफसरों के बीच हुए विवाद की वजह से इस प्रमुख जांच एजेंसी की छवि पर काफी असर पड़ा है। इन दोनों अधिकारियों को लंबी छुट्टी पर जरूर भेज दिया गया है, लेकिन इस वजह से एजेंसी का काम लंबे समय तक
प्रभावित होते रहेगा।

इसी घमासान से जुड़े एक अन्य घटनाक्रम में खुद सीबीआई ने अपनी ही एसआईटी यानी विशेष जांच दल के डीसीपी को सीबीआई दफ्तर में ही उनके खुद के चेम्बर से गिरफ्तार कर लिया। उनके कमरे से सात मोबाइल फोन भी बरामद किए। कहा जाता है कि इन फोनों के जरिए वो मोइन कुरैशी से बात किया करते थे। ये सारी घटनाएं अकल्पनीय हैं। सीबीआई को
इस भयावह स्थिति से निकलने की जरूरत है।

सीबीआई के दो हाई प्रोफाइल अफसरों आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना की आपसी खुन्नस से जुड़े इस केस का भी शीघ्र समाधान होना चाहिए। देश को आखिर यह तो पता चलना ही चाहिए कि असली गुनहगार कौन है? गुनहगार को किसी भी स्थिति में बख्शा भी नहीं जाना चाहिए। तभी सीबीआई अपनी साख कायम
कर पायेगा। जरा सोचिए कि तमाम सरकारी अफसरों, मंत्रियों से जुड़े करप्शन के मामलों को उजागर करने वालों पर ही घूस खाने के आरोप लगना अपने आप में कितना अप्रत्याशित है। वर्मा और अस्थाना साहबानों के बीच चले विवाद से अब समझ में आ रहा है कि आखिर क्यों कॉमनवेल्थ खेल घोटाला और आदर्श हाउसिंग घोटालों की फाइलें बरसों से आगे नहीं
बढ़ पा रहीं? इन दोनों घोटालों में खरबों रुपये की रिश्वत खाई गई। इन घोटालों में कई बड़े नामी गिरामी, भारी-भरकम नाम शामिल हैं। इसके बावजूद कुछ पता ही नहीं चल रहा है कि इन मामलों की जांच कहां तक पहुंची? ये दो केस
तो उदाहरण मात्र हैं। इन दोनों घोटालों ने देश को हिलाकर रख दिया था। इसके पहले बोफोर्स केस और यूनियन कार्बाइड केस की लीपापोती जग-जाहिर है। इन दोनों मामलों में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की संलिप्तता और सीबीआई पर
अनावश्यक दबाव के आरोप लगते रहे हैं। जब सरकार ने इन केसों की जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंपी तो लगा कि चलो अब दूध का दूध और पानी का पानी हो ही जाएगा। यानी जांच से सीबीआई इन केसों के दोषियों के नाम उजागर कर देगी पर यदि देश की आला जांच एजेंसी के नंबर एक और दो अफसर ही आपस में भिड़ते रहेंगे तो जांच क्या खाक होगी? इस स्थिति में कॉमनवेल्थ खेलों और आदर्श घोटालों के गुनहगार तो दिल से खुश होंगे। वे तो यही चाहते हैं कि जब तक सीबीआई के अफसर आपस में लड़ते रहेंगे, तब तक तो वे सुरक्षित ही हैं। दरअसल वर्मा और अस्थाना साहबानों के
बीच का विवाद सीबीआई के भीतर फैली भयानक संड़ाध को ही सिद्ध कर रहा है। यह दुर्गन्ध बता रही है कि सीबीआई में सब कुछ सही नहीं है। इसका सबसे पहले पता तब चला था, जब इसके तत्कालीन डायरेक्टर रंजीत सिन्हा पर टू-जी केस में अनिल धीरूभाई अंबानी समूह के आला अफसरों से बार-बार मिलने के सीधे आरोप लगे थे। यह भी आरोप है कि ये अफसर रंजीत सिन्हा के दो जनपथ स्थित सरकारी आवास में जाकर उनसे मिलते थे। सघन जांच से पता चला था कि रंजीत
सिन्हा से अनिल अंबानी समूह के अफसरों ने 50 बार मुलाकात की थी। बहुचर्चित टू-जी घोटाले में अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस टेलीकॉम की भूमिका की सीबीआई जांच कर रही थी, अभी भी कर ही रही है और न जाने कब तक करती
रहेगी। आपको याद ही होगा कि फरवरी, 2015 में शारदा घोटाले में गिरफ्तार  किए गए पूर्व सांसद मतंग सिंह के मसले में ‘ऊपर से’ दखलअंदाजी के कारण अनिल गोस्वामी को केंद्रीय गृह सचिव पद से हटा दिया गया था। अनिल गोस्वामी पर
पूर्व केंद्रीय मंत्री मतंग सिंह की गिरμतारी रोकने के लिए सीबीआई को प्रभावित करने का आरोप लगा था। वे भी सीबीआई के अपने कुछ खास अफसरों से लगातार बात कर रहे थे, ताकि मतंग सिंह को मदद मिले। तो कहीं न कहीं लगता है
कि सीबीआई के भीतर कुछ अफसर घूस के बदले बहुत कुछ देने को तैयार और तत्पर रहते हैं। अब नोएडा के आरुषि तलवार के कत्ल के केस को ही ले लें। इस केस में भी सीबीआई की जांच सवालों के घेरे में ही रही। सीबीआई टूजी
केस में किसी भी आरोपी के खिलाफ आरोप सिद्ध करने में अब तक तो नाकाम ही रही है। दरअसल, सीबीआई में कई स्तरों पर सुधार की आवश्यकता है। सीबीआई में स्टाफ की भी घोर किल्लत बताई जाती है। इन हालातों में सीबीआई
किस तरह से व्यापमं फर्जीवाड़े जैसे हजारों केसों की जांच कर सकेगी? व्यापमं घोटाले में तो हजारों आरोपी बताये जाते हैं। इनमें से 400 तो फरार हैं। जाहिर है कि इतने बड़े केस की जांच करना कोई बच्चों का खेल तो नहीं है। सीबीआई
पर शारदा घोटाले के कारण भी काम का बहुत दबाव है। वर्तमान में सीबीआई के पास करीब नौ हजार केस पेंडिंग हैं, जिनकी वह छानबीन कर रही है। इन सभी मामलों को सुलझाने के लिए उसे 1400 और पेशेवर अनुसंधानकर्ताओं की
जरूरत है। ताजा स्थिति तो यह है कि उसके पास करीब 20 फीसद स्टाफ की कमी है। सीबीआई को जांच अधिकारियों और विधि विशेषज्ञों की सख्त कमी महसूस हो रही है। स्टाफ की भारी कमी के कारण ही सीबीआई का काम सही तरह
से नहीं हो रहा है। हाई प्रोफाइल केस लटके पड़े हुए हैं। उनकी रμतार से जांच नहीं हो पा रही है। जब देश की प्रमुख जांच एजेंसी के ऊपर ही भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगेंगे, तो फिर देश की जनता किसके ऊपर यकीन करेगी। निर्विवाद रूप से सीबीआई को पटरी पर लाना ही होगा। आखिर ये भारत सरकार की प्रमुख जांच एजेंसी है। इसकी छवि की बहाली के लिए हरसंभव प्रयास करने होंगे। हालांकि इसमें लंबा वक्त लगेगा। फिलहाल तो समझ में ही नहीं आ रहा है कि जिस सीबीआई पर पंजाब नेशनल बैंक के 12,000 करोड़ रुपये से अधिक के घोटाले की जांच करने की भी जिम्मेदारी है, वह किस तरह से अपना काम कर रही होगी। इस केस में गीतांजलि जेम्स के मालिक मेहुल चोकसी भी फंसे हुये हैं। ये भी पता लगाया
जाना चाहिए कि किसके इशारे पर सीबीआई में यह उथल-पुथल मचवाई जा रही है और इससे किसको राजनीतिक लाभ मिल रहा है? 

(लेखक राज्यसभा सदस्य व बहुभाषी न्यूज एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार के अध्यक्ष हैं)

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