म अब और अपने प्रतियोगियों को उनके शारीरिक मापदंडों के अनुसार जज नहीं कर सकते। यह सौंदर्य तमाशा नहीं, प्रतियोगिता है।’ मिस अमेरिका प्रतियोगिता से स्विमिंग सूट राउंड खत्म किए जाने की घोषणा करते हुए ग्रेचन कार्लसन ने यह बात कही। ग्रेचन कार्लसन मिस अमेरिका आॅर्गनाइजेशन की चेयरवुमन हैं। कार्लसन 1989 में मिस अमेरिका भी रह चुकी हैं और इस समय वे एक पत्रकार और टीवी प्रजेंटेटर के रूप में काम कर रही हैं। पूरे विश्व में यौन उत्पीड़न के विरोध में चला हैशटैग मीटू अभियान की वे प्रबल समर्थक रही हैं। और इस अभियान के प्रभाव से लगभग सौ वर्ष पुरानी मिस अमेरिका प्रतियोगिता से महिलाओं का वास्तुनिष्ठ प्रस्तुतिकरण की परिचायक स्विमिंगसूट राउंड हटाने के लिए उन्हें बल मिला। उन्होंने इस बारे में आगे कहा कि इस राउंड की जगह प्रतियोगियों से उनके पैशन, बुद्धिमत्ता और समझदारी दर्शाने वाले प्रश्न पूछे जाएंगे। कार्लसन कहती हैं कि उनसे कई लड़कियां इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की इच्छा जताती रही हैं। पर उन्हें हाई हील और स्विमिंग सूट राउंड पसंद नहीं होता है। दिसंबर, 2014 में मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता की चेयरवुमन जूलिया मोरली ने इस प्रतियोगिता से स्विमिंग सूट राउंड को खत्म किए जाने की घोषणा करते हुए कुछ ऐसी ही बातें कही थीं। उन्होंने कहा था कि यह (स्विमिंगसूट राउंड) महिलाओं के लिए कुछ नहीं करता है। और साथ ही यह हम में से किसी के लिए भी कुछ नहीं करता।

सौंदर्य प्रतियोगिताओं से स्विमिंग सूट राउंड खत्म किए जाना स्त्री अस्मिता के जागरुक होने का सबूत है। आखिर कब तक महिलाओं का एक वस्तु की तरह प्रदर्शन किया जाता रहेगा। पर सवाल यह है कि बस इस तरह की कवायद से ही महिलाओं का एक वस्तु के रूप प्रदर्शन रुक जाएगा?

मिस अमेरिका आॅर्गनाइजेशन ने यह निर्णय क्यों लिया? इससे पहले मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता से भी स्विमिंग सूट राउंड क्यों खत्म कर दिया गया? इसे समझने के लिए एक घटना को ध्यान से समझना होगा। दिसंबर, 2017 में हफिंगटन पोस्ट ने 2014 में मिस अमेरिका आॅर्गनाइजेशन के सीईओ सैम हस्केल के भेजे हुए लीक ईमेल छापे। इन ईमेल्स में प्रतियोगियों के विषय में अभद्र टिप्पणियां की गई थीं। ये ईमेल हस्केल के मिस अमेरिका प्रतियोगियों के प्रति उनके विचारों को दर्शाती है। जाहिर है कि ये महिलाओं की गरिमा के खिलाफ ही है। विभिन्न सौंदर्य प्रतियोगिताओं में एक सर्वसुंदरी चुनने के लिए महिलाओं के शारीरिक सौंदर्य के साथ-साथ उसकी जहनी सौंदर्य को भी जज किया जाता है। इसके बाद ही किसी प्रतियोगी को विश्व या ब्रम्हाण्ड सुंदरी घोषित किया जाता है। जब इस तरह की प्रतियोगिता से ताल्लुक रखने वाले हस्केल ही इस प्रतियोगिता की गरिमा नहीं बनाकर रख सके तो जनसाधारण की क्या बिसात? जनसाधारण इन प्रतियोगियों के विषय में अपनी क्या-क्या धारणाएं बनाए रखता होगा, इस पर ज्यादा सोचना नहीं पड़ेगा।

महिलाओं के सौंदर्य से साहित्य भरा पड़ा है। नख से शिख तक महिलाओं के सौंदर्य का वर्णन करने में तरह-तरह की उपमाएं रची गई हैं। ये सभी उपमाएं महिलाओं क शारीरिक सौंदर्य को लेकर ही है। आंख, नाक, ओठ, बाल, हाथ, कमर आदि सभी के लिए एक-एक मापदंड सेट किया गया है। यह सब अनायास नहीं है। यह उस ‘उपभोग’ का प्रस्तुतिकरण है जिसमें एक स्त्री स्त्री न होकर उपभोग करने की सामान होती हंै। इसलिए उसे एक मापदंड, एक आकार में ढली हुई होना ही चाहिए। कभी न कभी जब हम किसी को सुंदर मानते हैं तब हम उसका बाहरी रूप ही देख रहे होते हैं। हम उसे सौंदर्य के प्रचलित मापदंड पर कस रहे होते हैं। लगभग सौ वर्ष पुरानी मिस अमेरिका प्रतियोगिता भी यही कर रही थी और कुछ साल पहले मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता भी इसी रवायत को आगे बढ़ा रही थी। कमोवेश यह रवायतें महिलाओं पर भारी पड़ रही थी। उनका सुंदर होना सांस लेने जितना जरूरी हो गया है। सौंदर्य उत्पाद, ब्यूटी पार्लर, ब्यूटी सर्जरी और बोटेक्स इन्हीं रवायतों की आधुनिक उपज हैं। इसी कमजोरी को इलेक्ट्रानिक दुनिया बहुत अच्छे से भुना रही है। एक बहुत बड़ा धोखा जो मोबाइल कंपनियां ब्यूटी फीचर देकर कर हमारे साथ कर रही हैं।

इस सौंदर्य का दबाव ग्लैमर जगत में कितना होता है, इसे मशहूर और प्रतिभाशाली अभिनेत्री स्व. श्रीदेवी की मौत से समझा जा सकता है। सौंदर्य की मिथ बन चुकी अभिनेत्री रेखा के बारे में भी कुछ इसी तरह की बातें की जाती है। पर वे इसका श्रेय योग को देती हैं। कुछ दिन पहले अभिनेत्री सोनम कपूर ने एक सेलेब्रिटी को एक सेलेब्रिटी बनाने के पीछे कितनी जद्दोजहद होती है, इसका विवरण उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को बताया था। यह काफी चर्चित रहा। यह उन महिलाओं के लिए एक संदेश था कि जब वे एक अभिनेत्री या मॉडल की तरह दिखना चाहती हैं, तो उसका सौंदर्य कितना नकली होता है। इंस्टाग्राम पर स्टार की हैसियत रखने वाली सोफी ग्रे एक फिटनेस ट्रेनर के रूप में इंस्टाग्राम पर अपने परफेक्ट फिगर के फोटोग्राफ हेल्थ टिप्स के साथ शेयर करती थीं। एक दिन उन्होंने इस बात की घोषणा कर दी कि वे अब बिकनी में अपनी तस्वीरें नहीं लगाएंगीं। इस बात के खुलासे के बाद सत्तर हजार फालोवर उन्हें छोड़कर चले गए। इस पर सोफी का कहना था कि मुझे इस बात का कोई दुख नहीं है। हर महिला की तरह अपने आपको दूसरों के नजरिए से खुद को तौलना बुरा लगता है। मुझे अपने शरीर को लेकर शर्म क्यों हो? मुझे मेकअप क्यों करना चाहिए? मुझे क्यों वह बनना, जो मैं हूं ही नहीं।

महिलाओं वास्तविक विडंबना यही है। जो वह है नहीं हैं, वह उन्हें बनना होता है। इसके लिए चाहे मेकअप का सहारा लेना पड़े या फिर सर्जरी का। नहीं तो उन्हें स्वीकृति नहीं मिल सकती। यही बात ग्लैमर जगत और विभिन्न सौंदर्य प्रतियोगिताएं स्थापित करती रही हैं। मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता से स्विमिंग राउंड खत्म किये जाने पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए 1994 की विश्व सुंदरी ऐश्वर्या राय ने कहा था कि मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता के 87 प्रतियोगियों मे से मेरे पास स्विमिंग सूट पहनने वाली बॉडी सेप नहीं था, फिर भी मैं मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता जीत गई। वास्विकता भी यही है। आज भी ऐश्वर्या राय अपने तमाम कारणों से एक सफल विश्व सुंदरी हैं।

आज इन प्रतियोगिताओं से इवनिंग गाउन राउंड भी खत्म किए जाने पर विचार किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि प्रतियोगियों वह पहनना चाहिए जिसमें वे अपने आप को ठीक से व्यक्त कर सकें। सौंदर्य प्रतियोगिताओं में इस किस्म के बदलाव स्त्री अस्मिता की चेतना को दिखा रहे हैं। इसे अभी काफी आगे बढ़ाना होगा।

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