मीटू पर बात अभी थमी नहीं है। जहां एक ओर मीटू के आरोपियों पर अपने स्तर पर कार्यवाहियां हो रही हैं, वहीं कार्यस्थलों पर महिलाओं के यौन शोषण और दूसरे प्रकार के शोषण पर भी बहस जारी है। यह हो भी क्यों नहीं, क्योंकि कार्यस् थल पर महिलाओं का यौन उत् पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 के बावजूद महिलाओं को शारीरिक और मानसिक शोषण से राहत नहीं मिल पाई है। मीटू इंडिया कंपेन के बाद राष्ट्रीय महिला आयोग ने मीटू पर शिकायतें दर्ज करने के लिए अपनी एक नई मेल आई-डी (www.ncw. metoo@gmail.com) दी है। महिला आयोग के आंकड़ों के अनुसार मीटू कंपेन के दौरान ही 14 शिकायतें प्राप्त हुईं। इसके अतिरिक्त आयोग के अनुसार 2015 से अब तक कार्यस्थल पर यौन शोषण की 2,383 शिकायतें प्राप्त हुई हैं। अगर इन आंकड़ों को वार्षिक क्रम में देखें, तो यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। इसलिए यह चिंता का विषय है। देश में अलग से इस प्रकार के आंकड़ों को इकट्ठा नहीं किया जाता है। नहीं तो इसकी वास्तविक संख्या कहीं अधिक होने की संभावना है। महिला आयोग की राष्ट्रीय अध्यक्षा रेखा शर्मा के अनुसार इन बढ़ते हुए आंकड़ों का कारण कार्यस् थल पर महिलाओं का यौन उत् पीड़न संबंधी कानूनों की जानकारी का कम होना है। उन्होंने इन बढ़े हुए आंकड़ों के बारे एक महत्वपूर्ण बात यह भी बताई कि इन शिकायतों में मुख्यता वहीं शिकायतें अधिक हैं जिन्हें महिलाओं ने अपने संस्थानों में आईसीसी के तहत दर्ज कराई थीं। चूंकि महिलाकर्मी वहां की जांच से संतुष्ट नहीं थीं, इसलिए आयोग में पुन: अपनी शिकायतें दर्ज करा रही हैं। यह एक गंभीर समस्या है कि इतना पुख्ता कानून होने के बावजूद आरोपित सहकर्मी किसी न किसी कारण से बच निकल रहे हैं। इसी तरह की एक पहल महिला और बाल विकास मंत्रालय ने महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से राहत देने के लिए शी-बाक्स के जरिए की थी। पर समस्या यह है कि महिलाओं को इसके बारे में जानकारी काफी कम है। शायद इसलिए महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने #मीटूइंडिया कंपेन के दौरान ट्वीट के जरिए शी-बाक्स के बारे में महिलाओं को बताती रहीं। उन्होंने वीडियो और लिखकर इसके बारे महिलाओं को शिक्षित किया। शी-बॉक् स महिलाओं के यौन उत्पीड़न संबंधित अधिनियम के अंतर्गत की गई एक डिजीटल परिकल् पना है। यह कार्यस् थल पर यौन उत् पीड़न का सामना कर रही महिलाओं को त् वरित राहत पहुंचाने का एक उपाय है। इस पोर्टल में शिकायत दर्ज होते ही, उसे सीधे संबंधित मंत्रालय, विभाग, पीएसयू, स् वायत् त निकाय आदि की आंतरिक शिकायत समिति के पास भेजा जाता है, जिसे शिकायत की जांच करने का अधिकार है। इस पोर्टल के माध् यम से महिला और बाल विकास मंत्रालय साथ शिकायतकर्ता भी आंतरिक शिकायत समिति यानी आईसीसी के तहत की जाने वाली पड़ताल की प्रगति पर नजर रख सकेगीं। देश में उदारीकरण के बाद रोजगार में महिला अनुपात बढ़ता गया। बड़े स्तर पर छोटे-बड़े शहरों की महिलाएं जॉब के लिए अपना शहर छोड़कर दूसरे शहरों में भी गईं। पर सरकारी या प्राइवेट ोनों तरह के संस्थानों ने खुद को महिलाओं के अनुकूल नहीं बदला। इन कार्यस्थलों का माहौल पुरुषोचित ही रहा, क्योंकि वहां पुरुषों की उपस्थिति कामोबेश महिलाओं से अधिक थी। यहीं कारण है कि महिलाओं को अपने संस्थानों में अपने लिए अलग वाशरूम और बच्चों के लिए एक अदद क्रेच के लिए लड़ना पड़ रहा है। हाल ही में झांसी पुलिस स्टेशन में एक महिला कांस्टेबल की अपनी छह महीने की बच्ची के साथ एक फोटो इसलिए वायरल हो गई कि क्रेच जैसी सुविधा न होने के कारण वे अपनी बच्ची को काम करने की मेज पर सुलाकर अपने काम में तल्लीन थीं। जबकि इससे पहले अपने ट्रांसफर के लिए उन्होंने खूब कोशिश भी की थी, ताकि बच्ची को परिवार के साथ रखा जा सके। तो देश में ऐसे माहौल में काम करना महिलाओं की मजबूरी रही है। जब महिलाएं ऐसे माहौल को झेल नहीं पाती हैं, तो उन्हें सबसे पहला आसान तरीका जॉब छोड़ना ही लगता है। कामोबेश वे यही करती भी हैं। जून, 2016 को एसोचैम ने अपने एक अध्ययन में बताया कि पिछले एक दशक में संपूर्ण श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी 10 फीसदी घटकर अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। राष्ट्रीय सैंपल सर्वे ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि 2004-05 से लेकर 2011-12 के बीच देश में लगभग दो करोड़ महिलाओं ने अपनी जॉब छोड़ दी। इसी तरह सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया कि 2017 के जनवरी-अप्रैल के दौरान कामकाजी महिलाओं की संख्या में 24 लाख की कमी देखी गई।

जबकि इसके बरक्स नौ लाख से ज्यादा पुरुषों ने नौकरी ज्वाइन की। देश में रोजगार प्राप्त करने का सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार मिला हुआ है। महिलाएं घर से निकलकर रोजगार प्राप्त करके राष्ट्रीय आय में अपना योगदान दे रही हैं। यहां समस्या तब आती है, जब महिलाओं को भेदभाव के कारण कार्यस्थल पर परेशान किया जाता है। उन्हें परेशान करने के लिए यौन उत्पीड़न को भी हथियार बनाया जाता है। इसी साल जनवरी में इंडियन नेशनल बार एसोशिएशन ने बीपीओ, आईटी, हॉस्पीटल, शिक्षा संस्थाओं जैसे सेक्टर में महिला कर्मचारियों पर सर्वे किया। उन्होंने पाया कि 38 फीसदी महिलाओं ने माना कि उनके साथ यौन उत्पीड़न हुआ है। सर्वे में यह भी बताया गया कि देश में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की दर काफी अधिक है और सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात यह है कि यौन उत्पीड़न संबंधी अधिनियम की जानकारी बहुत कम लोगों को है। इस सर्वे ने यह बात भी बताई कि अधिकांश पीडि़त महिलाओं ने इस समस्या से अपने स्तर पर ही निपटा दिया, वे अपनी शिकायत लेकर मैनेजमेंट तक भी नहीं गईं। इसका कारण उन्होंने डर, शर्मिंदगी, विश्वास की कमी जैसे कारण गिनाए। वास्तव में महिलाओं को अब इन सभी चीजों से बाहर आकर खुलकर बोलना होगा। जैसा मीटूइंडिया कंपेन के दौरान देखा गया। इस मामले में जागरुकता और साहस महिलाओं के मुख्य हथियार हो सकते हैं जिसका रास्ता उन्हें दिखाया जा चुका है। बस, अमल की जरूरत है।

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