देश में चाहे मानसून की बात हो, या सूखे की, किसान का मतलब पुरुष किसान से ही होता है। अखबारों में भी अन्नदाता के रूप में हल लिए किसान की तस्वीरें ही दिखती हैं। जय जवान, जय किसान के नारों में भी तस्वीर पुरुष किसान की ही होती है। गोया कि महिलाएं खेतों में जाती ही नहीं हैं। महबूब खान की फिल्म मदर इंडिया में हल लिए नरगिस की तस्वीर अपवाद हो सकती है। तस्वीरों में महिलाएं किसान के रूप में गायब हैं। पर इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में महिलाएं किसान नहीं हैं।

देश की कृषि में महिलाओं का बड़ा श्रम लगा हुआ है। फिर भी जमीन पर उनके मालिकाना हक न के बराबर हैं। इस कारण वे किसान नहीं मानी जाती हैं, जिससे कई योजनाओं का लाभ लेने से वे वंचित रह जाती हैं।

खेतों में हल चलाती स्त्री का चित्र देश के लिए दुर्लभ हो सकता है, पर देश में हर खेत में पुरुषों से अधिक स्त्रियां काम कर रही है, इसे किसी कीमत पर झुठलाया नहीं जा सकता है। खेत में अन्न उगाने की प्रक्रिया में उन्नत बीजों का चयन, खेत में बीज बोना और खाद डालना, चिड़ियों को खेत से उड़ाना, पौध रोपना, पौध तैयार करना, खरपतवार निकालना, कीट का नाश करना,  फसल काटना, बीज निकालना, बीज की सफाई, अनाज का भंडारण और वर्ष भर संरक्षण ये सभी ऐसे कार्य हैं जिन्हें महिलाएं बड़े धैर्य, लगन एवं समर्पण से करती आई हैं। हल जोतने एवं थ्रेशर द्वारा थ्रेशिंग के अतिरिक्त शायद ही कोई ऐसा काम हो जिसमें महिलाएं सक्रिय रूप से जुड़ी न हों। एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि एक हेक्टेयर खेत में एक वर्ष में एक जोड़ी बैल 1,064 घंटे, पुरुष 1,212 घंटे एवं एक महिला 3,485 घंटे काम करती हैं, यानी खेतों में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं लगभग तिगुना काम करती हैं।

आदिकाल से कृषि में महिलाओं का ही दखल सिद्ध हुआ है। जब पुरुष मुख्य खाद्य-पदार्थ की खोज में शिकार के लिए जाते थे, तब महिलाएं ही जंगलों से वनस्पतियों के रूप में कंदमूल, अन्न और फल एकत्र करने काम करती रही हैं। इसी अनुभव ने आगे उन्हें खेती के हुनर में माहिर बना डाला। यही कारण है कि विश्व में खेती के काम में आज भी 60 से 80 फीसदी महिलाएं संलग्न हैं। एफएओ यानी खाद्य और कृषि संगठन के अनुसार विश्व के खाद्य पदार्थ का 50 फीसदी हिस्सा महिलाओं द्वारा उगाया जाता है। विश्व के कृषि कार्यों की 45 फीसदी कार्य शक्ति महिलाओं के हाथों में ही है। अफ्रीका और एशिया की कृषक महिलाएं एक हफ्ते में पुरुषों के मुकाबले 12-13 घंटे अधिक काम करती हैं।

फिर क्या कारण है कि महिलाओं को एक किसान के तौर पर नहीं देखा जाता है। हल पकड़ी हुई एक महिला की तस्वीर इतनी सहज नहीं मानी जाती है। कहीं-कहीं तो महिलाओं का हल छूना कई धार्मिक कार्यों की तरह वर्जित है। इस अंधविश्वास के चलते खेतों के प्रत्येक काम में हाथ बंटाने वाली स्त्री, घर के पुरुष सदस्य के न होने पर खेत जोतने का काम नहीं करती हैं। महिलाएं खेत जोतने का कार्य तभी करती हैं, जब बहुत अधिक मजबूरी होती है। यही कारण है कि इस तरह की घटनाएं खबर बन जाती हैं। उत्तर भारत खासतौर पर हिंदी पट्टी में इस प्रवृत्ति को खूब देखा जाता है। यहां बारिश न होने की स्थिति में एक टोटके के लिए रात के अंधेरे में महिलाओं से खेतों में हल चलवाया जाता है। इस टोटकों को करते समय यह ध्यान रखा जाता है कि कोई पुरुष उन्हें न देख रहा हो।

विकीपीडिया की मानें तो एक किसान वह व्यक्ति होता है, जो या तो अपने खेत में खेती का काम करता है या फिर दूसरों के खेत में। पर आधुनिक अर्थव्यवस्था में किसान खेत के स्वामी या प्रबंधन करने वालों को ही कहा जाता है। इस अर्थ में देश की कितनी महिलाओं को किसान कहा जा सकता है? अगर वास्तविक स्थिति देखी जाए तो महिलाएं खेती के हर काम से जुड़ी हुई हैं, पर कितनी महिलाओं के पास खेत के मालिकाना हक हैं? (वैसे इस संदर्भ में देश में अलग से आंकड़ें उपलब्ध नहीं हैं।) देश में इसलिए भी महिलाएं किसान नहीं मानी जाती हैं। खेतों में दिन-रात काम करने के बावजूद उन्हें किसान का दर्जा नहीं मिला है। पिछले साल महिला किसानों ने दिल्ली में महिला किसान अधिकार मंच के नेतृत्व में भूमि पर अपने अधिकारों की मांग की थी। उनका कहना था कि जब महिलाओं का नाम जमीन और कृषि से जुड़े दस्तावेज में नजर आएगा, तभी उन्हें कानूनी रूप से किसान होने के सारे लाभ मिल पाएंगे। उनकी यह मांग भी थी कि सभी कृषि योजनाओं पर खर्च होने वाले धन का आधा हिस्सा महिला किसानों पर खर्च किया जाए और कृषि कार्य के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं को बीमा के दायरे में लाया जाए।

खेतों में दिन-रात खटने वाली महिलाओं के पास खुद का जमीन का एक टुकड़ा न होना, कितनी मार्मिक बात हो सकती है, इसको एक महिला किसान के अतिरिक्त कौन समझ सकता है। संस्था वर्ल्डवाच की माने तो देश के खाद्यान्न का 60 से 80 प्रतिशत उगाने वाली महिलाओं के नाम पर सिर्फ दो प्रतिशत जमीन है। वहीं विकासशील देशों में महिलाओं के पास 20 प्रतिशत से भी कम कृषि योग्य भूमि है। 2011 की जनगणना के अनुसार, जहां कृषि में महिला मजदूरों की संख्या 2001 में 49.6 मिलियन थी, वहीं 2011 में 24 प्रतिशत बढ़कर 61.6 हो गई। इसका कारण ग्रामीण क्षेत्रों से पुरुषों का पलायन माना गया। गांव-देहातों से पुरुषों के शहरों की तरफ पलायन से छोटी जोत वाले किसानों की खेती महिलाओं के जिम्मे आ गई। इससे खेत-खलिहान में महिलाओं का दखल बढ़ गया है। यह बात 2017-2018 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी सामने आई।

खेती आधारित हमारी नीतियों की यह एक बड़ी खामी है कि इसे महिलाओं के परिप्रेक्ष्य से नहीं देखा गया। जब से खेती के काम में मशीन का प्रयोग होने लगा है, पुरुषों की मेहनत कई गुना कम हो गई, पर महिलाओं के हिस्से का काम अभी भी जस का तस बना हुआ है। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 प्रस्‍तुत करते हुए बताया था कि पुरुषों का गांव से शहर की ओर पलायन की वजह से महिलाओं की हिस्सेदारी कृषि क्षेत्र में बढ़ रही है। इसकी वजह से महिलाएं कृषि को लेकर विभिन्न भूमिकाओं में दिख रही है। अब जरूरत इस बात की है कि महिलाओं तक जमीन, पानी, क्रेडिट और प्रौद्योगिकी की पहुंच बढ़ाई जाए। भारत की स्थिति देखते हुए महिलाओं को कृषि कार्यों का प्रशिक्षण दिए जाने की जरूरत है। यह देखा गया है कि महिलाओं को अधिकार दिए जाने के बाद कृषि उत्पादकता में सुधार हुआ है। इसलिए सभी योजनाओं, कार्यक्रमों और विकास संबंधित गतिविधियों में किए जाने वाले आवंटन में महिलाओं के लिए 30 प्रतिशत निर्धारित किया जाना सुनिश्चित किया जाए। आज भी देश में मुख्य व्यवसाय कृषि है। देश की 68.8 फीसदी जनसंख्या कृषि के कामों में लगी हुई है। 2015 से संचालित किसान पोर्टल की मानें तो देश की जीडीपी में कृषि का योगदान लगभग 16 फीसदी है, वहीं देश के रोजगार में लगभग 52 फीसदी योगदान कृषि का ही है। ऐसे महत्वपूर्ण सेक्टर की रीढ़ मानी जाने वाली महिला किसानों की अनदेखी कहां तक उचित कहीं जा सकती है? कभी महात्मा गांधी ने कहा था कि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। आज इस रीढ़ की बैक बोन महिला किसान को न मानकर, कहीं हम गलती तो नहीं कर रहे हैं।

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