देश के सामने एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो गई है। राजनीतिक टकराव या केन्द्रीय सत्ता पाने का लोकतांत्रिक संघर्ष संसदीय लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। किंतु इसमें कोई इस सीमा तक चला जाए कि केन्द्रीय एजेंसियों के अपने प्रदेश में प्रवेश निषेध कर दे, तो? इसकी कल्पना अब तक नहीं की गई थी। पहले आंध्र प्रदेश से यह खबर अ ा इर् कि चंद्रबाबू सरकार ने राज्य में सीबीआई के प्रवेश पर रोक लगा दी है। उसके बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसका समर्थन करते हुए अपने राज्य में भी सीबीआई को प्रतिबंधित कर दिया।

अपने-अपने राज्यों में नायडू और ममता ने केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का निर्णय ले लिया है। उनका यह कदम केंद्र-राज्य संबंध और देश की एकता में बाधक तो नहीं बनेगा?

संभव है कुछ और गैर-राजग शासित राज्य भी ऐसे ही कदम उठा लें। भारतीय राष्ट्र-राज्य की दृष्टि से इसे एक बड़ा संकट है। यह बात अलग है कि इस पर जितनी चर्चा होनी चाहिए नहीं हो रही है। नायडू ने केवल सीबीआई ही नहीं, सभी केन्द्रीय एजेंसियों के प्रवेश को निषेध कर दिया है। उन्होंने 63 केन्द्रीय कानूनों तथा भारतीय दंड संहिता के विभिन्न 188 धाराओं के क्रियान्वयन को दी गई सहमति भी वापस ले ली है। साथ ही देश के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के मामले तक की छानबीन केन्द्रीय एजेंसी नहीं कर सकती हैं। इससे विमान अपहरण, पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं की तस्करी, हथियारों, विस्फोटकों, नाभिकीय उर्जा, बेनामी लेनदेन, सीमा शुल्क, पासपोर्ट, हवाला, आयकर, कॉपीराइट, कंपनी मामले, अप्रवासन, विदेशी चंदा, विदेशी विनिमय ही नहीं, जनरल इन्श्योरेंस, स्वर्ण नियंत्रण आदि से संबंधित अपराधों की जांच तथा कार्रवाइयां भी बाधित होंगी। नायडू ने स्थिति को विकट बना दिया है। यह सीधेसीधे केन्द्रीय सत्ता को खारिज कर देना है। सीबीआई के आंतरिक संघर्ष से संबंधित एक मामला उच्चतम न्यायालय में अभी चल रहा है, एक और मामला इसकी संवैधानिकता से संबंधित उच्चतम न्यायालय के पास पांच वर्षों से लंबित है। ध्यान रखने की बात है कि ठीक पांच वर्ष पहले गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 7 नवंबर 2013 को सीबीआई के गठन और इसके कामकाज को असंवैधानिक करार दे दिया था। उच्च न्यायालय ने कह दिया था कि सीबीआई को अपराधों की जांच से लेकर गिरफ्तार करने या पूछताछ करने का अधिकार ही नहीं है, क्योंकि सीबीआई पुलिस नहीं है। न्यायमूर्ति इकबाल अहमद अंसारी और न्यायमूर्ति इंदिरा शाह की पीठ ने कहा कि सीबीआई का गठन निश्चित जरूरत को पूरा करने के लिए कुछ समय के लिए ही गृह मंत्रालय के संकल्प के जरिए किया गया था। यह सही है कि यह संयुक्त कैबिनेट का फैसला नहीं था और न ही राष्ट्रपति द्वारा निर्देश ही दिया गया था। इस आधार पर उच्च न्यायालय ने कहा कि यह विभागीय आदेश के अलावा कुछ भी नहीं है। यानी यह एक प्रशासनिक निर्देश है, जिसे कानून के रूप में लागू नहीं किया जा सकता है। वास्तव में इसके लिए केंद्र सरकार ने न कोई अध्यादेश जारी किया और न ही यह कार्यकारी फैसला था। इसकी शक्तियों के बारे में भी कोई जिक्र नहीं किया गया था। यानी कुल मिलाकर सीबीआई आवश्यक परिस्थितियों में विशेष मामलों की जांच के लिए है।

हमारे संविधान निर्माताओं ने कानून और व्यवस्था को राज्यों के जिम्मे रखा है। इसलिए केन्द्र के पास पुलिस बल नहीं है। किंतु जिन अपराधों की छानबीन राज्य पुलिस द्वारा संभव नहीं, या राज्य के लोग पुलिस छानबीन पर प्रश्न उठाएं या जिन अपराधों का विस्तार कई राज्यों तक हो या देश की सीमाओं से भी बाहर हो, जिसमें केन्द्र के कानून का उल्लंघन हुआ हो, केन्द्रीय संपत्ति से संबंधित भ्रष्टाचार या आपराधिक षडयंत्र हो, तो उनकी छानबीन और कानूनी प्रक्रिया कैसे चलेगी? इसी का ध्यान रखते हुए ही सीबीआई को नया चरित्र दिया गया। क्या वो भूल गए कि आज सीबीआई के साथ केन्द्रीय सतर्कता आयोग संबद्ध है? 12 सितंबर 2003 को केन्द्रीय सतर्कता आयोग कानून बना जिसके अनुसार 1988 के भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत सीबीआई के मुकदमे की कार्रवाई के अधीक्षण का दायित्व केन्द्रीय सतर्कता आयोग को दिया गया है। सीबीआई को नकारने का अर्थ संसद द्वारा पारित इस कानून को भी नकारना है। सीबीआई की भूमिका देश तक सीमित नहीं है यह आज इंटरपोल में भारत का प्रतिनिधित्व करता है। किसी अपराध का दायरा देश के बाहर विस्तारित हो और आरोपी भी विदेश में हों तो इंटरपोल से सहयोग लेने तथा अन्य देशों में मामला चलाने के लिए मान्य संस्था सीबीआई ही है।

अपने-अपने राज्यों में नायडू और ममता ने केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई के प्रवेश को प्रतिबंधित करने का निर्णय ले लिया है। उनका यह कदम भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत सीबीआई के मुकदमे की कार्रवाई के अधीक्षण का दायित्व केन्द्रीय सतर्कता आयोग को दिया गया है। सीबीआई को नकारने का अर्थ संसद द्वारा पारित इस कानून को भी नकारना है।केंद्र-राज्य संबंध और देश की एकता में बाधक तो नहीं बनेगा?

क्या नायडू और ममता वहां भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे? वैसे भी सीबीआई अपने-आप किसी राज्य का कोई मामला हाथ में नहीं ले सकती। राज्य की अनुशंसा इसके लिए आवश्यक है। केन्द्र इसके लिए डीएसपीई कानून 1946 के तहत ही अधिसूचना जारी करती है। यह कानून भी संघ क्षेत्रों के पुलिस को समवर्ती, सहअस्तित्वकारी अधिकार, दायित्व, विशेषाधिकार प्रदान करती है। इसके अनुसार केन्द्र सरकार सीबीआई के सदस्यों के अधिकार एवं उनके कार्यक्षेत्र को संघ क्षेत्रों के अलावा कहीं भी विस्तारित कर सकती है। हां, उसके लिए संबंधित राज्यों की संस्तुति अवश्य चाहिए। वैसे राज्य की संस्तुति न मिलने के बावजूद उच्च न्यायालय एवं उच्चतम न्यायालय के आदेश से सीबीआई राज्यों के मामले की जांच करती है। इस दुखद तथ्य से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि केन्द्रीय एजेंसियों का सत्ता द्वारा भयावह दुरुपयोग हुआ है। कई बार केन्द्रीय एजेंसियों के उच्चाधिकारी स्वयं भी राजनीतिक सत्ता की सोच का आकलन कर उसके अनुसार कार्रवाई करते हैं। इससे विरोधी दलों के नेताओं और उनके समर्थक चपेट में आते रहे हैं। सीबीआई को उच्चतम न्यायालय ने साढ़े पांच वर्ष पूर्व पिंजड़े का तोता तक कह दिया था। कोयला घोटाला में सीबीआई का शपथ पत्र सरकार के आदेश पर बदला गया। यूपीए सरकार में तो सीबीआई पूरी तरह से सरकार की मुखपेक्षी हो चुकी थी। मोदी सरकर के साढेÞ चार साल से ज्यादा के कार्यकाल में सीबीआई से लेकर, एनआईए, प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग आदि ने अपेक्षा के अनुरूप बहुत बड़े आॅपरेशन किए ही नहीं हैं। न किसी बड़े नेता की गिरफ्तारी हुई है, न जिसे अंग्रेजी में विच हंटिंग कहते हैं वैसा कुछ हुआ है। हम नहीं कहते कि सरकार का कोई हस्तक्षेप हुआ ही नहीं होगा, किंतु जैसे आरोप लगाकर नायडू एवं ममता ने अतिवादी फैसले किया, उनका कोई तार्किक आधार दिख ही नहीं सकता। हम मानते हैं कि केन्द्रीय संस्थाओं का जो भी दुरुपयोग होता आया है, वह पूरी तरह खत्म होना चाहिए। लेकिन इसके नाम पर राज्य इस तरह विद्रोह का झंडा उठा दें, तो इससे कानून और संविधान के द्वारा कायम केन्द्र-राज्य संतुलन का ढांचा चरमरा जाएगा। क्या एजेंसियों का दुरुपयोग केन्द्र में ही हुआ है? यह मानना ही बेमानी है कि राज्य सरकारें पाक-साफ रहीं हैं और केवल केन्द्र सरकार गलत। अगर केन्द्र की राजनीति केन्द्रीय एजेंसियों को प्रभावित करतीं हैं, तो राज्य सरकारें भी राज्य एजेंसियों को प्रभावित करतीं हैं। ये दोनों स्थितियां खतरनाक हैं। इसका अंत होना चाहिए और यह राजनीतिक प्रतिष्ठान की ही जिम्मेदारी है। वास्तव में इन दोनों प्रदेशों में ही स्थानीय पुलिस एवं भ्रष्टाचार निरोधक शाखा की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए जाते हैं। हर राज्य में महत्वपूर्ण मामलों को राजकीय एजेंसी से सीबीआई को सौंपने की मांग की जाती है। उस समय ये क्या करेंगे? अगर ये अपने कदम वापस नहीं लेते, तो प्रदेश में इनके विरोधी ही किसी मामले को प्रदेश पुलिस या भ्रष्टाचार निरोधक शाखा से मामला केन्द्रीय एजेंसियों को स्थानांतरित करने की अपील लेकर न्यायालय में जाएंगे। न्यायालय इसका आदेश दे देगा, तो वे क्या करेंगे? यह देश के भविष्य की दृष्टि से भयावह तस्वीर निर्मित करता है। अगर राज्य इस तरह का व्यवहार करने लगे तो देश का क्या होगा? वे भी जानते हैं कि उनके इन कदमों से अनेक जटिलताएं पैदा हो जाएंगी।

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