पढ़ने और सीखने के क्रम को जारी रखना बहुत जरूरी होता है। यानी आगे की परीक्षा में बेहतर करने के लिए नियमितता अनिवार्य है।

हते हैं कि जोश के साथ होश भी हो और काम की अच्छी शुरुआत के साथ उसकी गतिशीलता भी बनी रहे तो परिणाम बेहतर होने की संभावना बढ़ जाती है। परीक्षा से पहले अमूमन सभी विद्यार्थियों के पढ़ने की अवधि और नियमितता में सुधार दिखाई पड़ता है। इसका लाभ परीक्षाफल में भी दिखाई देता है। लेकिन परीक्षा खत्म होने के बाद ( एक-दो दिन के आराम को छोड़ दें तब भी ) अधिकांश विद्यार्थी क्या करते हैं? क्या वे उतने ही घंटे की पढ़ाई नियमित रूप से जारी रखते हैं? यह एक विचारणीय विषय है। हरेक विद्यार्थी के जीवन में एक परीक्षा खत्म होती है तो देर-सबेर आगे दूसरी कोई परीक्षा इन्तजार करती रहती है। जो लोग नियमित रूप से कुछ करते रहते हैं, बेशक सकारात्मक सोच और तरीके से, उनकी प्रगति यात्रा बदस्तूर जारी रहती है। इस मामले में प्रकृति के मूल चरित्र पर थोड़ा गौर करें तो आसानी से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। सामान्यत: यह पाया गया है कि स्कूल-कॉलेज की सालाना परीक्षा समाप्त होने के बाद विद्यार्थी अपनी किताबों को उठाकर रख देते हैं, जैसे कि अब उन किताबों से कोई सरोकार ही नहीं। जब कि परीक्षा के दौरान और उससे पहले भी बहुत कम विद्यार्थी ही कोर्स के सभी विषयों के सभी चैप्टर को ठीक से समझ कर पढ़ पाते हैं। ऐसे में अगर परीक्षा के बाद उपलब्ध समय को उस अधूरे ज्ञान को पूर्ण करने में लगा दें तो शायद रिजल्ट आने से पहले ज्ञान के मामले में आप बहुत बेहतर स्थिति में रहेंगे, अलबत्ता आपका रिजल्ट कैसा भी हो। सभी जानते हैं कि सही ज्ञान से ही सही सम्मान मिलता है, आत्मविश्वास में यथोचित उछाल आता है, सो अलग। एक बात और, इस दौरान अगर कुछ समय अगले क्लास या जिस प्रतियोगी परीक्षा में शामिल होने की योजना है, उससे संबंधित कोर्स का अवलोकन कर सकें, कुछ पढ़-समझ सकें तो उसका फायदा आपको ही मिलेगा और समय का सदुपयोग भी होगा। ऐसे भी कहा गया है कि खाली दिमाग शैतान का घर और सकारात्मक व गतिशील दिमाग प्रगति का द्योतक। इस विषय का एक और पहलू भी है। उदाहरण के तौर पर दसवीं एवं बारहवीं की परीक्षा को ही लें तो इसमें विद्यार्थी एक निर्धारित पाठ्यक्रम पर आधारित सवालों का उत्तर देते हैं। लेकिन हर बढ़ते क्लास के लिए पाठ्यक्रम थोड़ा भिन्न और उच्च स्तर का होता जाता है और विद्यार्थी उसी अनुरूप खुद को तैयार कर नयी चुनौती का सामना करते हैं। आगे इंजीनियरिंग, मेडिकल या अन्य प्रतियोगी परीक्षा में पाठ्यक्रम का यह दायरा विस्तारित हो जाता है। यहां सिर्फ उत्तीर्ण होने या अच्छा ग्रेड हासिल करने की बात नहीं होती, बल्कि इतना बेहतर करने की कठिन चुनौती होती है जिससे कि अंतत: लाखों प्रतियोगियों में से चुनिन्दा सफल लोगों की सूची में अपना स्थान सुनिश्चित कर सकें। ऐसे में, तैयारी का दायरा बढ़ जाता है और उसकी शैली भी। इसलिए पढ़ने और सीखने के क्रम को जारी रखना बहुत जरूरी होता है। यानी आगे की परीक्षा में बेहतर करने के लिए नियमितता अनिवार्य है – पढ़ने और सीखने के मामले में। यहां इस बात को रेखांकित करना भी प्रासंगिक होगा कि कई विद्यार्थी कई बार किसी अच्छे कार्य को पूरे उत्साह और उल्लास के साथ शुरू तो करते हैं, लेकिन उन्हें नियमित व योजनानुसार आगे बढ़ाने से चूकते रहते है। इललिए उस कार्य की रतार धीमी हो जाती है और अंतत: वह कार्य रुक जाता है। परिणामस्वरूप, वे उस अच्छे कार्य को तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचा पाते। जानकार कहते हैं कि अगर किसी भी कार्य को समुचित ढंग से प्रारंभ करके आप अपनी दिनचर्या तथा दैनिक कार्य योजना में शामिल कर लेते हैं और उसे अगले साठ से नब्बे दिनों तक नियमित रूप से जारी रखते हैं तो आगे वह स्वत: चलता रहता है और एक समयावधि के बाद उसके अच्छे फल मिलने लगते हैं।

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