बनास जन एक ऐसी पत्रिका है जिसने पिछले दस सालों में व्यक्ति केंद्रित विशेषांक निकालने में विशेषज्ञता हासिल कर ली है। पल्लव इसके स्थायी संपादक हैं। पत्रिका का वर्तमान अंक रवींद्र कालिया पर केंद्रित है। ‘रवींद्र कालिया समय के बीच: समय के पार’। संपादन का आतिथ्य-भार युवा कहानीकार राजीव कुमार ने उठाया है। वर्तमान साहित्य के महाविशेषांक के दो भाग, वागर्थ और नया ज्ञानोदय का संपादन कर रवींद्र कालिया कहानी के लिए एक स्वर्णिम अध्याय लिख गए हैं। 27 जुलाई 1958 में जब रवींद्र कालिया स्नातकोत्तर कक्षा के छात्र थे तबके उनके गुरु और नयी कहानी के स्टार लेखक मोहन राकेश ने अपनी डायरी में दर्ज किया था कि कालिया और कपिल शाम को घर आये और कहानियों के बारे में बात करते रहे।
ऐसा मालूम होता है कि ये नौजवान चीजों को कुछ ज्यादा ही संजीदगी से लेने लगते हैं, और जब वागर्थ के संपादन काल में राजीव कुमार रवींद्र कालिया से पहली बार मिलते हैं, तो उन्हें भी बेहद संजीदा सलाह देते हैं कि रोमांटिक तनाव से बाहर आओ और फ्रस्ट्रेशन को रचनात्मक रूप दे दो। मैंने जब उन दिनों के हालात पर बातें कीं, तो उन्होंने कहा कि इसे लिखो। यह तुम्हारे समय की कहानी है। अखिलेश को छोड़कर इस अंक में लिखने वाले तमाम कवि, आलोचक और कहानीकार वे हैं जिन्होंने भूमंडलीकरण के बाद जो दुनिया बनी और इस दुनिया में साहित्य में पहली बार आंखें खोलीं तथा उनका बहुत कुछ बेहतरीन कालिया जी के संपादन में ही सामने आया। उनके संपादक व्यक्तित्व पर अपने आलेख में जीतेंद्र श्रीवास्तव की सटीक टिप्पणी है कि संपादक के रूप में उनमें रिस्क लेने या स्पष्ट कहें, तो संकट मोल लेने का साहस था। कोई ऐसी रचना छापकर जिस पर लोग बहस करें या विवाद हो। और भी कई तरह का साहस, जिसमें कि लग सकता है कि रवींद्र कालिया मजा ले रहे हैं।
वे मजा नहीं लेते थे, बल्कि रिस्क लेते थे। परिशिष्ट छोड़कर इस विशेषांक के नौ उप-खंड हैं जिनमें पत्र-संवाद, संस्मरण और उनके चार महत्वपूर्ण पुस्तकों पर मूल्यांकन विद्यार्थियों के साथ सामान्य पाठकों के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। रवींद्र कालिया साठोत्तरी पीढ़ी के कथाकार रहे हैं। वे धर्मयुग जैसी पत्रिका के संपादकीय विभाग से संबद्ध रहे, एक दौर में राजनीति की पृष्ठभूमि में रहकर भी अपना रसूख कायम रखा। पत्र संवाद में ज्ञानरंजन, श्रीकांत वर्मा, विजयमोहन सिंह और काशीनाथ सिंह के पत्रों से तत्कालीन समय के साहित्यिक और राजनीतिक तापमान की एक समझ बनती है। श्रीकांत वर्मा 25 अप्रैल 1967 के अपने पत्र में लिखते हैं, ‘हिंदी में हर कोशिश नाकाम होती है। हर चर्चा नारा बन जाती है, प्रतिभाशाली लेखक खो जाते हैं और नक्काल नेता हो जाते हैं। 1992 में भी बिहार की राजनीतिक छवि अच्छी न थी, इसका प्रमाण 31 जनवरी 1992 को लिखे एक पत्र की मात्र एक पंक्ति ही काफी है, अगर जल्दी कुछ नहीं किया गया तो बाद में यह प्रसंग उलझ जाएगा और उसे अंतत: बिहार में ही रहना होगा।
यहां मैं नामवर जी के पत्र की भाषा की बानगी स्वरूप एक अंश पाठकों के विशेष ध्यान के लिए प्रस्तावित कर रहा हूं। पत्र 28 अगस्त 1965 का है, जब नामवर जी चालीस के आसपास की उम्र के रहे होंगे ‘टी हाउस’ वाला तुम्हारा लेख काफी पसंद आयाआखिर की नामावली को छोड़कर। एक आलोचक की लाचारी, आशा है। अब तुम्हें समझ में आ गयी होगी। लेकिन दिल्ली तो तुम्हें अब आना नहीं, इसलिए और कौन-सी लाचारी थी? उस लेख को पढकर यहां तुम्हें दोस्तों ने कहना शुरू कर दिया था कि अब कालिया आने ही वाला है। लेकिन मुझे भरोसा नहीं है क्योंकि राकेश तो आजकल यहां है नहीं और न ही बारिश जो ट्विस्ट की तरह कहीं और कभी भी शुरू हो सकती है। इस अंक में पत्र-संवाद ही कथाकार रवींद्र कालिया तक पहुंचने के मार्ग में सहायक होते हैं। उनके परवर्ती लेखन पर युवाओं के लेखन में वस्तुनिष्ठता की थोड़ी कमी जरूर है, लेकिन युवा लेखकों ने अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी के साथ सदाशयता का भाव रखा है। यह अंक का एक विरल पक्ष है और यह सारा श्रेय संपादक के खाते में ही जाना चाहिए।

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