रुंधति रॉय भारतीय बौद्धिक जगत में सक्रियता का एक स्थायी भाव है। 1997 में अपने पहले ही उपन्यास ‘गॉड आॅफ स्माल थिंग्स’ के लिए उन्हें बुकर जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला। इसके बाद वे सामाजिक जनआंदोलनों में ज़्यादा सक्रिय रहीं। अब अपने पहले उपन्यास के इक्कीस साल बाद ‘द मिनिस्ट्री आॅफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ लेकर आयीं, जिसका हिंदी अनुवाद प्रख्यात कवि मंगलेश डबराल ने ‘अपार खुशी का घराना’ शीर्षक से किया है। अनुवाद करने के रास्ते में बहुत सी प्रचलित मान्यताओं और सैद्धांतिकियों के साथ मूल कृति की रक्षा करने के साथ अनुवाद को अनूदित भाषा की कृति बनाने की भी जिम्मेदारी होती है। अरुंधति राय की भाषा के बारे में मंगलेश डबराल कहते भी हैं कि इस उपन्यास की भाषाई सरलता काफी भ्रामक है। वह एक भीतरी जटिलता के प्रवेश-द्वार की तरह है। हर अध्याय में हर चरित्र की भाषा, भंगिमा और विन्यास जिस तरह बदलते हैं उसे बरकरार रखना भी अनुवाद की आंतरिक जरूरत थी।’ इन सब कठिनाइयों को पार करने में मंगलेश डबराल का कवि होना काम आया। वे एक बेहतर अनुवाद करने में सफल रहे। इस उपन्यास को पढ़ने से पहले यह ध्यान रखना होता है कि गॉड आॅफ स्माल थिंग्स के प्रकाशन के बाद के इक्कीस सालों के दौरान वे लगातार राजनीति और पर्यावरण संबंधित लेख लिखती रहीं। नर्मदा बचाओ आंदोलन के पक्ष में खड़ी हुईं और कई अन्य सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को लेकर खासी आलोचना की भी शिकार रहीं। इन सब हलचलों का प्रभाव ‘अपार खुशी का घराना’ के पन्नों पर दर्ज भी है।

पुस्तक: अपार खुशी का घराना
लेखिका :अरुंधति रॉय /अनु: मंगलेश डबराल
प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

यह उपन्यास परिवार, वर्ग और जाति की कहानी तो कहता ही है, साथ ही भारत और उसकी जनसंख्या पर अंधाधुंध औद्योगिकीकरण के दुष्प्रभाव और उससे उत्पन्न प्रतिकूल वातावरण में एक हिजड़े के जीवन जीने का क्या अर्थ है? इसकी कहानी भी इस उपन्यास में दर्ज है। अपार खुशी का घराना का कथानक भारी-भरकम और विस्तृत है। यह बड़ा उपन्यास है, जिसमें जादुई यथार्थवाद का नियंत्रित और समीचीन प्रयोग है। इसके दो छोर हैं, एक छोर पर अंजुम नामक एक हिजड़ा है। जन्म के समय उसका नाम आफताब था। अब वह अपना जीवन चलाने के लिए दिल्ली जैसे शहर में संघर्षरत है। संघर्ष का परिणाम इतना ही निकल कर आया है कि वह एक कब्रिस्तान के निकट गेस्ट-हाउस की मालकिन है। जिसके पनाहगाह में आसपास के खोए हुए, टूटे हुए और अपने ही समाज से बहिष्कृत लोगों की बस्ती निरंतर बड़ी होती जा रही है। जैनब उसे जामा मस्जिद की सीढि़यों पर मिलती है। वह उस वक्त तीन साल की थी और काफी छानबीन के बाद अंतत: अंजुम की बेटी की तरह बड़ी होने लगती है। इसके समानांतर एक दुखती हुई प्रेम-कथा एस. तिलोत्तमा की है जिसके असंदिग्ध प्रतिरोध की अभिव्यक्ति को फुसफुसाहटों में, चीखों में, आंसुओं के जरिये और कभी-कभी हंसी-मजाक के साथ कहा गया है। इस उपन्यास के पात्र वे लोग भी हैं जिन्हें संसार में बढ़ती- फैलती जटिलताओं के बीच अपना अस्तित्व बनाए रखना मुश्किल होता है। लेकिन जीवन की छोटी-छोटी खुशियां उनमें आशा का संचार किये रहती हैं। अपने जीवन-स्थितियों से निपटने के लिए वे संघर्ष का रास्ता अख्तियार करते हैं लेकिन आत्मसमर्पण की मुद्रा नहीं अपनाते। दूसरे छोर पर तिलो है, जो कुशल और सम्मोहक आर्किटेक्ट होने के साथ अपने लिए एक एक्टिविस्ट की भूमिका चुनती है। उसके तीन पुरुष मित्र हैं और तीनों ही उसे बेहद प्यार करते हैं। तिलो आगे जाकर एक बच्ची को गोद ले लेती है। तिलो की सोच की और अनुवाद की भाषा की बानगी के लिए एक अंश बच्चे का पिता कौन है। उसने सोचा। ऐसे ही चलने दिया जाए। क्यों नहीं? अगर लड़का हुआ तो गुलरेज। अगर लड़की हुई तो जबीन। उसने कभी न मां के रूप में अपनी कल्पना की थी और न दुल्हन के रूप में, हालांकि वह दुल्हन रह चुकी थी, बन चुकी थी और बची हुई रही थी। फिर यह भी क्यों नहीं? इस ‘क्यों नहीं?’, के प्रश्नवाचक चिह्न को डीकोड करने के लिए अपार खुशी का घराना का पढ़ा जाना बेहद जरूरी है। 

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