प श्चिम में साक्षात्कार एक गंभीर विधा के रूप में स्वीकृत है जबकि हमारे यहां मित्र-संलाप की तरह रहा है। कृष्णा सोबती से अलग-अलग आयु के लेखकों, पत्रकारोंऔर विचारकों द्वारा लिए गए साक्षात्कारों का संग्रह लेखक काजनतंत्र इससे अलग हटकर है। पिछले दो दशकों के बीच लिए गए उनके कुल चौदह साक्षात्कारों में संवादकों ने अपने प्रश्न कृष्णा सोबती के सामने गंभीरता से रखे हैं और उन्होंने खुले मन से अपनीबातें रखी हैं। पुस्तक की भूमिका ‘लेखक की हैसियत’ शीर्षक सेलिखी गई है। जिसमें वे कहती हैं मैं लेखक होने के नाते साहित्य और साहित्यकार की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और खुले उन्मुक्तसंस्कार की सुरक्षा चाहती हूं। रचनात्मक प्रतिभा, मौलिकता, अस्मिताऔर गरिमा जैसे मूल्यवान शब्दों का अवमूल्यन नहीं होना चाहिए।हिंदी साहित्य के परिदृश्य पर कृष्णा सोबती की उपस्थिति एकआदमकद इंसान की है। उनकी रचना-प्रक्रिया में जो लेखकीय गहराई है उसमें रूढि़वादिता के खिलाफ एक सामाजिक जंग साफसाफ दिखता भी है। वह समाज में स्त्रियों की बराबरी की लड़ाईऔर लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा के लिए निरंतर अपने विचारदृढ़ता से रखती रही हैं। रणवीर रांग्रा जब मित्रो और रत्ती जैसपात्रों के सृजन-समय के बारे में पूछते है, तो वे कहती हैं- ‘किसी भी समय को अंकित करने के लिए मात्र कल्पना ही काफी नहींहोती और न वैचारिक अनुमान ही। अपनी बात करूं तो ऐसा कुछनहीं लिख पाई जो मात्र कल्पना के आधार पर, कल्पना के बलपर बुना-सजा हो, जो किसी स्वप्निल संसार से उभरा हो और जीवन के यथार्थ से दूर हो। 1966 में प्रकाशित मित्रो मरजानी केपचास वर्ष पूरे होने पर जब मीनाक्षी तिवारी पूछती हैं कि आजमित्रो को कहां पाती हैं, तो वे कहती हैं कि इन पचास सालों में मित्रो एक व्यक्तित्व में बदल चुकी है और वह अब एक संयुक्तपरिवार की स्त्री नहीं है जो हर बात में पीछे रखी जाती थी। उसे अपनी इच्छा व्यक्त करने का अधिकार है और यह अधिकारउसने अर्जित किया है। शायद यही वजह है कि मित्रो मरजानी को पिछली सदी की दस बड़ी किताबों में शुमार किया जाता है। अन्यथा पत्रिका से हुई बातचीत काफी विस्तार लिए हुए है। इसी बातचीत में वे सरोकारों से जुड़ा लेखन, लेखन को कैसे प्रभावित करता है, के जवाब में कहती हैं कि मानवीय मूल्यों पर आंख रखने वाला लेखन अपनी कमजोर रचनात्मक शिल्प-शैली के बावजूदभी मूल्यवान माना जाएगा। कृष्णा सोबती के ख्यालात हमेशा रोशन रहे। आजादी के बाद वे दिल्ली आ चुकी थीं। उन्होंने दिल्ली कोबदलते देखा है, संवरते देखा है और घुटते देखा है। वे दिल्लीके इतिहास और बदलते भूगोल से रूबरू होती रही हैं। नब्बे पारकृष्णा जी की स्मृति देखकर सामान्य व्यक्ति आश्चर्य में डूब जाए।कृष्णा सोबती तिरानवें साल की उम्र में भी यह कहकर चौंका देती थीं कि साहित्य का आकलन इतिहास के संपन्न ब्यौरों से कहीं ज्यादा गहरा और मुकम्मल होता है। उनसे गिरधर राठी ने पूछा किआप अपने जीवन के आख्यान को आज किस तरह देख रही हैं।कृष्णा राग-विराग से परे होकर दार्शनिक मुद्रा में कहती हैं इन दिनों मैं ऐसा महसूस कर रही हूं जैसे अपार्टमेंट के वाक-वे पर चल रहीहूं। एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक की ओर। जाने के लिए पृथ्वी के इस नक्षत्र से किसी दूसरे नक्षत्र की ओर। कुछ ऐसे कहूं कि इस लोकसे उस लोक की ओर… यह बातचीत बेहद महत्वपूर्ण है। उनके संस्मरणों और विचारों से भरी इस किताब को पढ़ते हुए पाठक इतिहास के प्रति सिर्फ सह्रदय ही नहीं होता, बल्कि वह भारतीय संस्कृति के सांस्कृतिक घनत्व के पीछे की वजहों को भी समझपाता है। साथ ही आजादी के बाद हमारी बौद्धिक और कलात्मकरचनाशीलता कैसी रही है, उससे भी परिचित होता है।

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