अभी हाल ही में बीएसपी प्रमुख मायावती ने कांग्रेस को नागनाथ और बीजेपी को सांपनाथ कहते हुए दोनों से किसी तरह का समझौता नहीं करने का ऐलान किया था। यह बयान अगले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए बड़ा झटका था। मायावती मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को आंखें दिखा रही हैं, जहां उनकी पार्टी कमजोर है, तो समझा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में क्या होगा, जहां बीएसपी बड़ी शक्ति है। तो क्या यह मान लिया जाए कि मायावती ने अगले लोकसभा चुनावों में एकला चलो रे का मन बना लिया है। लोकसभा चुनावों में कुछ महीने का वक्त है। अभी किसी नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना तय है कि मायावती प्रस्तावित गठबंधन के रणनीतिकारों, विशेष रूप से कांग्रेस के लिए बड़ा सिरदर्द साबित होने जा रही हैं।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम विपक्ष के प्रस्तावित गठबंधन के लिहाज से काफी अहम साबित होने वाले हैं। इन परिणामों से ही तय होगा कि इस गठबंधन में कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी या फिर कांग्रेस से इतर तीसरे मोर्चे का गठन होगा।

अगर कांग्रेस ने तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीएसपी से समझौता किया होता, तो लोकसभा चुनाव में उसको साथ लाने में कम कठिनाई होती, लेकिन स्थानीय कांग्रेसी नेताओं के कारण ऐसा नहीं हो पाया। लेकिन अभी तो खेल शुरू हुआ है। जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, उनके परिमाण निर्णायक साबित होंगे। चंद्रबाबू नायडू ने नवंबर में देश के तमाम गैर-एनडीए दलों के नेताओं की बैठक की योजना बनाई थी, लेकिन उसको विधानसभा चुनावों के नतीजे आने तक के लिए टाल दिया गया। अधिकतर गैर-बीजेपी दलों का इन चुनावों में कुछ भी दांव पर नहीं लगा है। दांव पर है कांग्रेस की साख। यहां कांग्रेस कैसा प्रदर्शन करती है, उससे तय होगा कि लोकसभा चुनावों में उसकी क्या भूमिका रहेगी। इन राज्यों में कांग्रेस के पास जीतने का मौका है। यदि पार्टीं का प्रदर्शन अच्छा रहा, तो कांग्रेस कह सकेगी कि वही बीजेपी विरोधी दलों का नेतृत्व करने की क्षमता रखती है। पर यदि उसका प्रदर्शन पहले की तरह ही लचर रहा, तो उन विपक्षी दलों को कांग्रेस से इतर तीसरा मोर्चा बनाने की बात सोचने का मौका मिल जाएगा। निगाहें बीएसपी के प्रदर्शन पर भी रहेंगी, क्योंकि कांग्रेस के बाद मायावती ही बीजेपी विरोधी दलों का नेतृत्व करने की सबसे बड़ी दावेदार हैं। इस तरह गठबंधन में कांग्रेस के अलावा बीएसपी की भूमिका भी इन विधानसभा चुनाव परिणामों से निर्धारित होगी। कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि पार्टी अकेले दम पर चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करेगी। यदि दावा सही हुआ तो कांग्रेस यह कह सकेगी कि राहुल गांधी के हाथों में ही प्रस्तावित गठबंधन का नेतृत्व होना चाहिए। लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ तो उसे बिहार और कर्नाटक की तरह ही पीछे हटकर समझौता करना पड़ेगा। जहां तक मायावती की बात है, तो मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ में उनके लिए खोने के लिए कुछ भी नहीं है। लेकिन यदि उनके कारण कांग्रेस चुनावों में हारती है, तो फिर मायावती विपक्षी दलों को यह धमकी देने की स्थिति में होंगी कि उनकी बात नहीं सुनी गई तो वे दूसरों का खेल बिगाड़ सकती हैं। ऐसे में बीएसपी प्रदेश में सबसे अधिक प्रभाव रखने वाले दलों पर भी दबाव बना सकती है। सच तो ये है कि मायावती प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखती हैं और ये सारी कवायद उसी दिशा में है। कांग्रेस और बीएसपी के अलावा जो गैर-एनडीए दल हैं, उनकी रणनीति भी तैयार है। कांग्रेस या मायावती कितने भी दावे करें, ये दल किसी को भी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करेंगे। शरद पवार ने बहुत पहले कहा भी था और यशवंत सिन्हा भी इस बात को बार-बार दोहरा रहे हैं कि प्रस्तावित गठबंधन केंद्र के स्तर पर नहीं, राज्य स्तर पर होगा। चुनाव परिणाम आने के बाद जिस दल के पास सबसे अधिक सीटें होंगी प्रधानमंत्री पद के लिए उसका दावा सबसे अधिक मजबूत होगा। वैसे अंदर ही अंदर देश के सभी गैर-बीजेपी और गैर-कांग्रेसी दलों के बीच यह अघोषित समझौता भी हो चुका है कि वे किसी भी तरह से अधिक सीटे हासिल करेंगे। चाहे इसके लिए उन्हें अपने सबसे बड़े दुश्मन कांग्रेस के साथ भी हाथ क्यों न मिलाना पड़े। लोकसभा चुनाव में अगर उनके पास 100 सीटें भी आ जाती हैं, तो वे अपना एक अलग ब्लॉक बनाएंगे, ताकि त्रिशंकु लोकसभा होने पर वे कांग्रेस और बीजेपी दोनों पर उनके उम्मीदवार को समर्थन देकर प्रधानमंत्री बनवाने का दबाव बना सकें। अर्थात तीसरे मोर्चे का सपना खत्म नहीं हुआ है। लोकसभा चुनाव होने तक उसे नेपथ्य में जरूर डाल दिया गया है।

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