त्याग, तपस्या और यज्ञ की पवित्र भूमि तीर्थराज प्रयाग में कुम्भ का आगाज हो गया है। संगम की रेती पर करीब 50 दिन तक चलने वाला कुम्भ मेला यद्यपि 15 जनवरी को प्रथम शाही स्नान से प्रारम्भ होगा, लेकिन अखाड़ों की पेशवाई के साथ मेले की अनौपचारिक शुरुआत 25 दिसम्बर को ही हो गई। पहले दिन श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा और श्री पंच अग्नि अखाड़ा के संन्यासियों ने मेला क्षेत्र में शाही प्रवेश किया।

आस्था और विश्वास के संगम क्षेत्र में शाही अंदाज से विभिन्न अखाड़ों की पेशवाई की भव्यता अलौकिक थी जो 13 जनवरी तक जारी रहेगी।

इसके बाद गंगा, यमुना और अंत:सलिला सरस्वती के पावन तट पर बनी छावनियों में सनातन धर्म की चतुरंगिणी सेना के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया, जो 13 जनवरी तक जारी रहेगा। जूना और अग्नि अखाड़े की भव्य पेशवाई हर-हर महादेव के जयघोष के साथ श्रद्धा एवं उल्लासपूर्वक पूरी भव्यता से निकली। इस अद्भुत एवं अलौकिक शोभा यात्रा में सबसे आगे अखाड़े के आराध्य देव, भगवान दत्तात्रेय की सवारी थी। इसके बाद अखाड़े के ध्वज फिर भाला लेकर चले नागा संन्यासियों की अगुवाई में संतों का हुजूम उमड़ा। हाथी, घोड़ा और ऊंट पर सवार नागाओं की फौज, अखाड़े के पदाधिकारियों, संतों, श्रीमहंतों और महामंडलेश्वरों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी चले। प्रत्येक महामंडलेश्वर के रथ के साथ अलग-अलग बैंड पार्टियां भक्ति की धुन बजा रही थीं। मौज गिरि आश्रम से संगम तक कतारबद्ध होकर हजारों की संख्या में खड़े श्रद्धालु हर-हर महादेव के नारे के साथ संन्यासियों का स्वागत कर रहे थे।

शाही प्रवेश (पेशवाई)

अर्धकुम्भ और कुम्भ की हमेशा से यह परम्परा रही है कि मेला शुरू होने से पहले सभी अखाड़ों की शाही सवारी निकलती है और संत समाज गाजे बाजे के साथ कुम्भ क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। अखाड़ों के शाही प्रवेश का जुलूस बहुत बड़ा होता है, जिनमें हजारों साधु-संत और नागा संन्यासी शामिल रहते हैं। अखाड़ों के आचार्य और महामंडलेश्वर रथों पर सवार होकर शाही अंदाज में मेला क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। जुलूस में हाथी, घोड़े और बैंडबाजे भी भारी संख्या में रहते हैं। यह दृश्य बड़ा ही अनुपम होता है। इसे देखने के लिए हजारों श्रद्धालु सड़क के किनारे खड़े रहते हैं। कुम्भ प्रशासन के अधिकारी मेला क्षेत्र में प्रवेश करते ही साधु-संतों का माला पहनाकर स्वागत करते हैं। इस बार इसका सिलसिला 25 दिसम्बर से शुरू हो गया है।

पेशवाई के दौरान नागा सन्यासी अपने युद्ध कौशल के पराक्रम से भी लोगों को आकर्षित करते रहे। जूना अखाड़े के पेशवाई जुलूस का नेतृत्व आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने की, जबकि अग्नि अखाड़े की अगुवाई आचार्य महामंडलेश्वर रामकृष्णानंद कर रहे थे। शोभा यात्रा में काशी सुमेरू पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती, कामाख्या पीठाधीश्वर जगद्गुरु पंचानन गिरि, गोकर्ण पीठाधीश्वर स्वामी कपिलपुरी, वेणीमाधव पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर ओंकारदेव गिरि, महामंडलेश्वर कैलाशानंद ब्रह्मचारी, सचिव श्रीमहंत संपूणार्नंद ब्रह्मचारी सहित अनेक महामंडलेश्वर, संत व श्रीमहंत शामिल हुए।

  • मुख्य स्नान पर्व 
    मकर संक्रांति (प्रथम शाही स्नान) – 15 जनवरी, संभावित भीड़ – 1.2 करोड़ 
  • पौष पूर्णिमा – 21 जनवरी, संभावित भीड़ – 55 लाख 
  • मौनी अमावस्या (द्वितीय शाही स्नान) – 04 फरवरी, संभावित भीड़ – 03 करोड़ 
  • बसंत पंचमी (तृतीय शाही स्नान) – 10 फरवरी, संभावित भीड़ – 02 करोड़ 
  • माघी पूर्णिमा – 19 फरवरी, संभावित भीड़-1.6 करोड़ 
  • महाशिवरात्रि – 04 मार्च, संभावित भीड़ – 60 लाख

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि और महामंत्री महंत हरि गिरि समूची शोभा यात्रा की अगुवाई कर रहे थे। प्रयागराज के मंडलायुक्त डॉ. आशीष गोयल, कुम्भ मेलाधिकारी विजय किरण आनंद और डीआईजी कुम्भ केपी सिंह ने मेला प्राधिकरण कार्यालय के पास अखाड़ों के शाही जुलूस का परंपरागत तरीके से स्वागत किया। इसके बाद संतों का हुजूम पीपे का पुल पार करके मेला क्षेत्र के सेक्टर 16 स्थित अखाड़े की छावनी में पहुंचा। वहां आचार्य समेत सभी महामंडलेश्वरों ने अखाड़े के ध्वज की परिक्रमा कर आराध्य देव का पूजन किया और कुम्भ मेले की कुशलता के लिए प्रार्थना की। पेशवाई के साथ संतों का मेले की छावनी में विधिवत ठौर आरंभ हुआ। जूना और अग्नि अखाड़े के बाद श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा का कुम्भ मेला क्षेत्र में शाही प्रवेश 27 दिसम्बर को परंपरागत तरीके से पूरी भव्यता के साथ सम्पन्न हुआ। इसके बाद श्री पंचायती अखाड़ा महानिवार्णी और श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी क्रमश: एक और दो जनवरी को शाही प्रवेश करेगा। श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा और श्री शंभू पंच अटल अखाड़ा की पेशवाई तीन जनवरी को निर्धारित है। इसी तरह श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन, श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन और श्री पंचायती अखाड़ा निर्मल क्रमश: 10, 11 और 13 जनवरी को कुम्भ मेला क्षेत्र में शाही प्रवेश करेंगे।

शाही स्नान
अर्धकुम्भ व कुम्भ के दौरान अखाड़ों के साधु-संत, आचार्य और महामंडलेश्वर हालांकि प्रतिदिन पवित्र संगम में स्नान करते हैं। लेकिन, पूरे मेले की अवधि में तीन प्रमुख स्नान पर्वों (मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या और बसंत पंचमी) के पर ये शाही स्नान करते हैं। यह दृश्य इतना रोमांचक होता है, जिसे देखने के लिए लाखों श्रद्धालु संगम तट पर आधी रात ही इकट्ठा हो जाते हैं। इस बार शाही स्नान की तिथियां क्रमश: 15 जनवरी, चार फरवरी और दस फरवरी को हैं।

सुविधाओं का भी मेला
तीर्थराज प्रयाग में परंपरानुसार इस वर्ष अर्धकुम्भ का आयोजन है। लेकिन, प्रदेश की योगी सरकार ने आयोजन को भव्य और दिव्य बनाने के लिए इसे पूर्ण कुम्भ की संज्ञा दी है। पूरे मेला को इस बार 3200 हेक्टेयर में बसाया गया है। मेलाधिकारी विजय किरण आनंद के अनुसार व्यवस्था की दृष्टि से समूचे मेला क्षेत्र को 20 सेक्टर में बांटा गया है। कुल 84 पार्किंग स्थलों का निर्माण संगम से अल्प दूरी पर किया जा रहा है। पार्किंग स्थलों से संगम क्षेत्र तक श्रद्धालुओं को ले आने के लिए 500 से अधिक शटल बसें एवं पर्याप्त संख्या में सीएनजी आटो चलाए जाएंगे। आवागमन की सुविधा के लिए सड़क सेवा और रेल सेवा के अतिरिक्त प्रयागराज को वायुमार्ग और जलमार्ग से भी जोड़ा गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ दिन पहले ही प्रयागराज के नये हवाई अड्डे का उद्घाटन भी किया। जलमार्ग से भी संगम तक पहुंचाने की योजना बनी है। इसके लिए किला घाट, सरस्वती घाट समेत कई घाटों पर जेट्टी बनाई गई है। स्नानार्थियों की सुविधा के लिए संगम पर 10 किलोमीटर लंबे स्नान घाट और चेंजिंग रूम बनाए गए हैं। करीब 70 देशों के प्रतिनिधि 15 दिसम्बर को ही प्रयागराज पहुंचकर कुम्भ की तैयारियों से रुबरु हुए। कुम्भ मेले में इस बार श्रद्धालुओं को पहली बार अक्षयवट और सरस्वती कूप के दर्शन का भी अवसर मिलेगा। इसके अलावा लेजर शो के जरिए सांस्कृतिक कार्यक्रम दिखाने की व्यवस्था की गई है।

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