र्म संसद में राम मंदिर के साथ दक्षिण भारत के शबरीमलामंदिर का मुद्दा भी गरमाता गया। विश्व हिन्दू परिषद(वीएचपी) की धर्म संसद में जुटे हजारों साधु-संत इसमामले में सुप्रीम कोर्ट और केरल सरकार के फैसले से बेहदनाराज दिखे। अंत में प्रस्ताव पारित कर शबरीमला मुद्दे पर अयोध्या आंदोलन की तरह राष्ट्रव्यापी आंदोलन का निर्णय लिया गया।संतों ने तर्क दिया कि भगवान अयप्पा के प्रति समूचे हिन्दूसमाज में आस्था है। इस पवित्र मंदिर की परम्परा और आस्थाकी रक्षा के लिए पूरे देश में आंदोलन होगा। प्रस्ताव प्रस्तुत करतेहुए स्वामी परमात्मानन्द ने कहा कि भारत में प्रत्येक मन्दिर काअपना इतिहास एवं विशिष्ट परम्परा रही है, जो ऋषि-मुनियों द्वारा स्थापित हैं। सदियों से हिन्दू समाज इन परम्पराओं के आधार परश्रद्धा से पूजन करता आया है। पिछले कुछ वर्षों से हिन्दू परंपराओं के प्रति समाज में अश्रद्धा जताकर उसे कलंकित करने का कुप्रयास किया जा रहा है। शबरीमला इसका ताजा उदाहरण है।

विश्व हिन्दू परिषद की धर्म संसद में राम मंदिर निर्माण की तिथि घोषित किये जाने की उम्मीद थी। लेकिन संत समाज ने साफ कर दिया कि लोकसभा चुनाव तक कोई आंदोलन नहीं किया जाएगा। साफ है कि साधु संत इस मामले को राजनीति से दूर रखने के पक्षधर हैं।

शबरीमला पर प्रस्ताव

स्वामी परमात्मानन्द ने कहा कि शबरीमला मंदिर में न्यायपालिका की आड़ में केरल सरकार ने दमनचक्र चला रखा है, जिसके कारण पांच भक्तों की जान चली गयी और सैकड़ों श्रद्धालुओं को गिरतार किया गया। इसके अलावा करीब 15 हजार भक्तों को गिरतार करने का षड्यंत्र रचा गया है। लाखों अयप्पा भक्तों ने श्रृंखला बनाकर और अन्य प्रदर्शनों के माध्यम से मन्दिर की पुरातन परम्परा को बनाए रखने के लिए संघर्ष किया है। प्रस्ताव में कहा गया कि धर्म संसद हिन्दू समाज से आह्वान करती है कि इस दमनचक्र के विरोध में राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया जाए। हिन्दू समाज इस आन्दोलन में बढ़-चढ़कर सहभागिता करें। केरल से आये स्वामी अयप्पा दास ने इस प्रस्तावका अनुमोदन किया। प्रस्ताव का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी पुरजोर समर्थन किया और सनातन धर्म की मान्यताओं पर अदालत के हस्तक्षेप को नामंजूर कर दिया। संतों के समर्थन के बाद ध्वनिमत से ये प्रस्ताव पास हो गया।

क्या है शबरीमला मंदिर विवाद

शबरीमला, केरल के पेरियार टाइगर अभयारण्य में स्थित एक प्रसिद्ध हिन्दू मन्दिर है। यहां दुनिया की सबसे बड़ी वार्षिकतीर्थयात्रा होती है। इसमें प्रति वर्ष करीब दो करोड़ श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं। शबरीमला शैव और वैष्णवों के बीच कीअद्भुत कड़ी है। लगभग 800 साल पुराने इस मंदिर में भगवानअयप्पा का विग्रह है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, अयप्पाको भगवान शिव और भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरुप का पुत्रमाना जाता है। भगवान अयप्पा को हरिहरपुत्र, अयप्पन, शास्ता और मणिकांता नाम से भी जाना जाता है। यह भी माना जाताहै कि भगवान परशुराम ने अयप्पा की पूजा के लिए शबरीमला में मूर्ति स्थापित की थी। कुछ लोग इसे रामभक्त शबरी के नामसे जोड़कर भी देखते हैं। अयप्पा स्वामी को ब्रह्मचारी माना गया है। इसी वजह से मंदिर में उन महिलाओं का प्रवेश वर्जित है,जो रजस्वला हो सकती हैं। केरल से धर्म संसद में भाग लेनेआये स्वामी अयप्पा दास बताते हैं कि शबरीमला मंदिर की यह परंपरा अति प्राचीन है। वह कहते हैं कि इस मामले में लिंग विभेद का आरोप सरासर गलत है। वहां कन्याओं और 50 सालसे अधिक उम्र की महिलाओं का प्रवेश बिल्कुल वर्जित नहींहै। वर्ष 1891 और 1901 में छपे ब्रिटिश लेखकों के शोध भी बताते हैं कि बच्चियों और बुजुर्ग महिलाओं को ही इस मंदिर जाने की इजाजत थी। शबरीमला मंदिर में विवाद की शुरुआतउस समय हुई जब मंदिर के ज्योतिषी परप्पनगडी उन्नीकृष्णन ने2006 में बयान दिया कि मंदिर में मौजूद भगवान अयप्पा अपनी शक्ति खो रहे हैं और वह नाराज हैं। उन्नीकृष्णन ने कहा था किकिसी युवा महिला के मंदिर में प्रवेश करने की वजह से ऐसा हुआ है। इसके बाद कन्नड़ अभिनेता प्रभाकर की पत्नी जयमालाने दावा किया कि 1987 में उन्होंने अयप्पा की मूर्ति को छुआ था। उन्होंने बताया था कि वह अपने पति के साथ मंदिर गई थीं। हालांकि, अपने दावे के साथ कन्नड़ अभिनेत्री जयमाला ने परंपरा तोड़ने की गलती मानते हुए उस समय प्रायश्चित करने कीइच्छा भी जताई थी, लेकिन उनके इस दावे के बाद पूरे केरलमें हंगामा मच गया था। इसके बाद मामला अदालत में पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने 28 सितंबर 2018को हर उम्र की महिलाओं को शबरीमला मंदिर में प्रवेश देने के पक्ष में फैसला सुनाया। हालांकि, बेंच की इकलौती महिलान्यायाधीश इंदु मल्होत्रा हर उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश न दिये जाने के पक्ष में थीं। उनका तर्क था कि धार्मिक मामलोंमें अदालत को दखल नहीं देना चाहिए, लेकिन चार जज हर महिला को प्रवेश देने के पक्ष में थे।

षड्यंत्रों के खिलाफ धर्म संसद

वीएचपी की धर्म संसद में पहले दिन दूसरा प्रस्ताव हिन्दू समाज के खिलाफ हो रहे षडयंत्र के बारे में लाया गया। इसको प्रस्तुत करते हुए स्वामी गोविन्द देव गिरि ने आरोप लगाया कि हिन्दू समाज को तोड़ने के लिए इस्लामिक संस्थाएं, चर्च तथा साम्यवादी संगठन कुचक्र रचते रहे हैं। अब कुछ राजनीतिक दल भी अपने निहित स्वार्थों के कारण इन षड्यंत्रों को तेजी से बढ़ा रहे हैं। इनकी कार्य पद्धति देखकर लगताहै कि ये देश में अशान्ति भी फैला सकते हैं। स्वामी गोविन्द देव गिरि ने कहा कि महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलित-मराठा विवाद पैदा किया जाता है तो झारखंड के पत्थलगढ़ी द्वारा चर्च वहां के वनवासी समाज को हिन्दू समाज व देश से अलग-थलग करनेका षड्यंत्र रच रहे हैं। यूपी के सहारनपुर में बाबा साहेब अम्बेडकर की शोभायात्रा पर हमला करवाकर दलित-सवर्ण केमध्य विवाद पैदा किया गया, वहीं गुजरात के ऊना में परंपरागत व्यवसाय में लगे अनुसूचित जाति के युवकों की पिटाई करवाकर सामाजिक वैमनस्य पैदा करने का प्रयास किया गया। पिछले कुछसमय में शहरी नक्सलियों के राष्ट्र विरोधी षड्यंत्रों का खुलासा हुआ है। ये लोग हिन्दू इतिहास को तोड़-मरोड़ कर लोगों को भ्रमित करने की कोशिश में लगे हैं। उन्होंने कहा कि धर्म संसद हिन्दू समाज से आह्वान करती है कि क्षेत्रवाद, भाषावाद,प्रान्तवाद, जातिवाद व छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर देश को तोड़ने का जो प्रयास हो रहा है, उसका संगठित होकर प्रतिकारकरें। जो राजनीतिक दलों ऐसे प्रयास कर रहे हैं उन्हें उचितजवाब दें। स्वामी जितेन्द्रानन्द ने इस प्रस्ताव का अनुमोदन किया। धर्म संसद में पारित प्रस्ताओं पर चर्चा के दौरान आरएसएसप्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि वोट के लिए इस समयहिन्दुओं के साथ कपट युद्ध चल रहा है। उन्हें बांटा जारहा है। इस कुटिल राजनीति से हिन्दुओं को सावधान रहनेकी जरूरत है। शबरीमला के बारे में संघ प्रमुख ने कहाकि वह सार्वजनिक स्थल नहीं, बल्कि एक विशिष्ट मंदिर है और वहां की परंपरा संविधान द्वारा संरक्षित है। वहां आज भी लोग परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं, भागवत ने कहा कि अदालत के फैसले के बाद भी कोई महिला वहां जाना नहीं चाहती। ऐसे में साजिश के तहत श्रीलंका से महिलाओं को लाकर पीछे के दरवाजे से मंदिर में घुसाया जा रहा है। भारत की प्राचीन संस्कृति और परंपरा पर चर्चा करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि आज हमारे बच्चों को अपनी मातृभाषा नहीं आ रही है। उन्होंने कहा कि हमें अपनी जड़ कमजोर नहीं करनी चाहिए। कहा कि परिवार ठीक रहेगा तभी समाज और देश ठीक ढंग से प्रगति करेगा।ऐसे में कुटुम्ब प्रबोधन के कार्य पर भी उन्होंने बल दिया।

 

मंदिर मामले में सरकार पर भरोसा
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर संतों ने केंद्र की मोदी सरकार पर पूरा भरोसा जताया। संतों ने इस मामले में लोकसभा चुनाव तक कोई नया आंदोलन न करने की बात कही। लेकिनछह अप्रैल को पूरे देश में श्रीराम जय राम के सामूहिक जाप का निर्णय लिया गया है। धर्म संसद में राम मंदिर मामले में लाएगए प्रस्ताव पर संतों ने कहा कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट मेंअर्जी देकर देकर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर दी है। संतों को मोदी सरकार पर पूरा भरोसा है। प्रस्ताव में सुप्रीम कोर्ट से मांगकी गयी कि राम मंदिर प्रकरण पर रोज सुनवाई कर दो-तीनमहीने के अंदर फैसला दिया जाए। प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सर संघचालक मोहन भगवत ने कहा कि, संघ राम जन्मभूमि आंदोलन का कार्यकर्ता है, हमें मंदिर से कम कुछ स्वीकार्यनहीं है। दो दिन तक चले धर्म संसद में देश भर के तीन हजारसे अधिक साधु-संतों का जमावड़ा रहा। आयोजन में वीएचपीऔर संघ के बड़े पदाधिकारियों ने भी भाग लिया।

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