थर्ववेद में एक मंत्र है जिसका अर्थ है- अमृतसे भरा कुंभ समुद्र मंथन के बाद जहां-जहां रखागया था, उन स्थानों पर कुंभ पर्व को हम लोगहोता हुआ देख रहे हैं। यह कुंभ पर्व समस्त चौदह भुवनोंमें समय-समय पर उपस्थित होता है। कुंभ पर्व के समय कोबैकुंठ के समान पवित्र कहा गया है। दूसरा मंत्र है- ‘चतुर:कुंभाश्चतुर्था अहम ददामि।’ अर्थात भू-लोक में चार स्थानों मेंचार कुंभ पर्व प्रदान करता हूं। देवताओं और दानवों ने जबक्षीर सागर को मथा तब हे कुंभ तुम उत्पन्न हुए। स्वयं धन्वंतरिरूपधारी भगवान विष्णु ने तुम्हें अपने हाथों से धारण किया था।विष्णु पुराण, स्कंद पुराण, ब्रह्मपुराण, श्रीमद्भागवत और गर्गसंहिता आदि में वर्णन मिलता है कि समुद्र मंथन के बाद अमृतकलश प्रकट हुआ था। उसे छीनने के लिए देवताओं और दैत्यों मेंयुद्ध छिड़ गया। भगवान विष्णु के संकेत पर देव गुरु बृहस्पति केनेतृत्व में इंद्र पुत्र जयंत ने उस अमृत कुंभ को चुरा लिया। छीनाझपटी में कलश फूट न जाए, इसलिए सूर्य को उसकी रक्षा के लिए नियुक्त किया गया। अमृत सूख न जाए, इसके लिए चंद्रमाको नियत किया गया। अमृत कुंभ को छिपाने के लिए देवगण तीनोंलोकों में घूमे, लेकिन दानवों ने उनका हर जगह पीछा किया।12 दिव्य दिन तक भ्रमण करते हुए उक्त अमृत कुंभ कोचार बार भूमि पर रखने की जरूरत पड़ी।

12 दिव्य दिन तक भ्रमण करतेहुए अमृत कुंभ को चार बार भूमिपर रखने की जरूरत पड़ी। कुंभको रखते और उठाते समय कुछअमृतकण इन स्थानों पर बिखर गए।जहां-जहां वह कुंभ रखा गया था,वह स्थान हरिद्वार, प्रयाग, नासिकऔर उज्जैन थे।

कुंभ को रखते और उठाते समय कुछ अमृतकण इन स्थानों पर बिखर गए। जहांजहांवह कुंभ रखा गया था, वह स्थान हरिद्वार, प्रयाग, नासिकऔर उज्जैन थे। दिव्य 12 दिन 12 मानव वर्षों के बराबर होतेहैं। सूर्य, चंद्र और बृहस्पति के योगायोग से 12 वर्षों में उक्तचारों स्थानों में 4 कुंभ पर्व का योग बनता है। पृथ्वी का 1 वर्षदेवताओं का 1 दिन होता है। देवताओं का 12 वर्ष पृथ्वी लोकके 144 वर्ष के बराबर होता है। देवताओं के 12 वर्षपूरे होने पर देवताओं का कुंभ लगता है। उस वर्षपृथ्वी पर महाकुंभ होता है। प्रयाग महाकुंभका निर्धारित स्थान माना गया है। अमृतकणों की सत्ता से उक्त चारों स्थानश्रद्धालु भक्तों को अमरपद दिलानेमें सहायक है।

धरती पर जहां-जहांअमृत कुंभ की बूंदें टपकीं,वहां जीवनदायिनी औषधियोंका जन्म हुआ। जिन जल स्रोतोंमें अमृत कुंभ से अमृत टपका,वहां स्नान करने से व्यक्ति कोआरोग्य लाभ और दिव्य प्राणशक्ति प्राप्त होती है।

स्कंद महापुराणमें कहा गया है कि कुंभ स्नान सेकामना की पूर्ति होती है। भविष्यपुराण कहता है कि कुंभ स्नान से स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है,जबकि ब्रह्म पुराण में वर्णन मिलता है कि अश्वमेध यज्ञ का फलकुंभ में स्नान और दान से मिलता है। कुंभ सामूहिक हिंदू तीर्थ है।पृथ्वी की तरह चार कुंभ देवलोक में और चार कुंभ पाताललोक में भी होते हैं। आकाशगंगा में स्नान कर 33 करोड़ देवताकुंभ स्नान करते और सौ अश्वमेध यज्ञों का फलप्राप्त करते हैं। पाताल लोक में नाग औरयक्ष भोगवती ने इस विशेष स्नानयोगमें स्नान कर खुद को कृतकृत्यमानते हैं। कुंभ पर विचार करें,तो हमें ऋषि दुर्वासा के शापपर भी विचार करना होगा।

देवासुर संग्राम का वैज्ञानिक वर्णन
अगर हम कुंभ योग के वैज्ञानिक विश्लेषण पर विचार करें, तो यह संपूर्ण संसार जीवनवर्द्धक और जीवन संघर्ष दो
प्रकार के तत्वों से आप्यायित है। वैज्ञानिक इस तरह कह सकते हैं कि आॅक्सीजन प्रधान पिंडों को जीवनवर्द्धक और कार्बन
डाइआॅक्साइड प्रधान पिंडो को जीवन संहारक कहा जा सकता है। उक्त दोनों तत्वों का संघर्ष ही देवासुर संग्राम है। हमारी
पृथ्वी अन्य ग्रह-नक्षत्रों की गति-विगति के तारतम्य से कभी जीवनवर्द्धक वातावरण से संयुक्त होती है, तो कभी जीवन
संहारक वातावरण से जूझती है। किस काल में पृथ्वी के किस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह हमारे ज्योतिर्विद तत्वार्थदर्शी
ऋषि-महर्षि जानते थे। उसी के अनुरूप पृथ्वी के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग समय में अलग-अलग कार्य करने की
अनादि परंपरा विकसित हुई थी, जो आज तक चली आ रही है। पृथ्वी के उन्हीं विशिष्ट स्थानों को तीर्थ कहा जाता है।

ऋषि दुर्वासा ने देवराजइंद्र को सम्मानस्वरूपअपनी माला प्रदान कीथी। देवराज इंद्र ने उसमाला को धारण करनेके बजाय मदांध भाव सेअपने हाथी के गले में डालदी थी। हाथी ने उस मालाको अपनी सूंड से उठाकरजमीन पर पटक दिया और उसेरौंदते हुए चला गया। तब दुर्वासा नेइंद्र को श्रीहीन होने का शाप दिया। इसकेफलस्वरूप इंद्र धन-बल से हीन हो गए। उन्हेंकमजोर जानकर दैत्यों ने तीनों लोक पर कब्जा कर लिया। बादमें भगवान विष्णु की राय से समर्थन के लिए दैत्यों को तैयारकिया गया। उस समुद्र मंथन से पहले विष निकला, जिसे भगवानशिव ने अपने कंठ में धारण कर संपूर्ण विश्व की रक्षा की।14 रत्नों के निष्क्रमण क्रम में अमृत सहित धनवंतरि प्रकटहुए। अमृत को देखकर उसे पीने और अमर होने की इच्छा सेदेव-दानव उसे छीनने में जुट गए। धनवंतरि आकाश मार्ग सेअमृत कुंभ लेकर उड़े। दैत्य उनसे उसे छीनने का प्रयास करतेरहे। 12 दिनों तक देवताओं और दैत्यों के बीच घनघोर संग्रामहुआ। इस क्रम में धरती पर जहां-जहां अमृत कुंभ की बूंदेंटपकीं, वहां जीवनदायिनी औषधियों का जन्म हुआ। जिन जलस्रोतों में अमृत कुंभ से अमृत टपका, वहां स्नान करने से व्यक्तिको आरोग्य लाभ और दिव्य प्राण शक्ति प्राप्त होती है।

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