कुंभ कब से मनाया जा रहा है, इसके लिखित और ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। फिर भी एक अनुमान लगाया जा सकता है कि वर्तमान कुंभ 36 लाख साल से भी अधिक पुराना है

कुंभ पर्व बहुत पुराना है। इसे आदि पर्व कहा जाता है। इसकी आदिकालिकता पर किसी को भी कोई संदेह नहीं होना चाहिए। कुंभ की शुरुआत यूं तो समुद्र मंथन के बाद ही आरम्भ हो गई थी। लेकिन 850 साल पहले इसे व्यवस्थित रूप दिया था आदि शंकराचार्य ने। उन्होंनेसंतों के अखाड़ों को न केवल संगठित किया बल्कि उन्हें कुंभस्रान पर्व से भी जोड़ा। इसके पीछे उद्देश्य आमजन को संतों के अनुभव-आशीर्वाद से जोड़ना था। सरकारी दस्तावेजों परयकीन करें तो 525 ई.पू. में पहले कुंभ का आगाज हुआ था। 617-647 ई. में सम्राट शिलादित्य हर्षवर्धन के कुंभ मेले मेंआने और अपना सब कुछ दान कर अपने राज्य लौटने काजिक्र मिलता है। यह भी पता चलता है कि हर्षवर्धन वहां परवैचारिक सम्मेलन का आयोजन कराते थे जिससे राजकाज मेंआसानी हो। जनता-जनार्दन की सुख-सुविधाओं की, राज्यके संरक्षण-संवर्द्धन की आवश्यक रणनीति बनाई जा सके। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी कुंभ नगरी का जिक्र करते हुए लिखा है कि यहां महल और झोपड़ी एक साथ सिमटते हैं। कुंभ पर्व उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम को जोड़ता है।

इससे पता चलता है कि कुंभ एकता का पर्व है। कुंभ का संबंध जल से है। जल का संबंध प्राण से है, रस से है और समुद्र से है। समुद्र का संबंध जन से है, जीवन से है। समुद्र की उत्पत्ति और निष्पत्ति की वजह भी मनुष्य ही है। हम केवल यह कहना चाहेंगे कि कुंभ धरती का सबसे बड़ा सांस्कृतिकऔर आध्यात्मिक आयोजन है। यह केवल स्रान-दान का ही पर्व नहीं है, ज्ञान चर्चा और बौद्धिक विमर्श का भी पर्व है। समुद्रकी उत्पत्ति, मुक्ति और मंथन के मूल में हमारी प्राचीन ऋषिपरंपरा रही है। इसे तत्वत: जानने और समझने की जरूरत है।सरकारी दस्तावेज भले ही इसे एक हजार साल से भी कमपुराना बताएं, लेकिन धर्म ग्रंथ में इसकी आयु लाखों साल है। समुद्रमंथन महाराजा बलि के समय में हुआ था। बलि का जन्म सतयुग में हुआ था। वामन अवतार भी सतयुग में हुआ था। सतयुग कीआयु 17 लाख 28 हजार वर्ष बताई जाती है। सतयुग में आदमीऔसत एक लाख वर्ष तक जीता था। त्रेता की आयु 12 लाख96 हजार वर्ष है। त्रेता में आदमी की औसत आयु 10 हजार वर्षथी। द्वापर युग की आयु 8 लाख 64 हजार वर्ष है।

जल स्रोतों का आराधन पर्व

कुंभ जल स्रोतों की आराधना का पर्व है। यह जल स्रोतोंके संरक्षण और पवित्रीकरण का पर्व है। देखा जाए, तो कुंडसे उत्पन्न कुंभज ऋषि का जल संरक्षण में बहुत बड़ा योगदानहै। माता सीता की उत्पत्ति घड़े से हुई थी। सीता लक्ष्मी कीअवतार हैं। खुद लक्ष्मी का अवतार समुद्र से हुआ है। लक्ष्मीअर्थात समृद्धि का धरती और जल से नाभिनाल का रिश्ताहै। जीवन एक घड़ा है। कबीर दास ने लिखा है कि घट-घटव्यापत राम। ‘एक राम घट-घट में बोला। एक राम दशरथगृह डोला। एक राम का जगत पसारा-एक राम सब जग सेन्यारा।’ मतलब राम घट में निवास करते हैं। यजुर्वेद कहताहै कि कलश में वरुणदेव ही नहीं, सभी देवताओं और सभीतीर्थों का निवास होता है- ‘कलशस्य मुखे विष्णु: कंठे रुद्रसमाहित:। मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणास्थिता:।’जीवन अच्छाइयों और बुराइयों से भरा है। अमृत और विषअर्थात अच्छाई और बुराई का समन्वय ही मनुष्य है। यह भीकहा जाता है कि मनुष्य अच्छाइयों और बुराइयों का पुतला है।हर धार्मिक कार्य में कलश की स्थापना की जाती है। जीवनकलश में सच्चाई और अच्छाई की सकारात्मक भावना भरती रहे, यही कलश स्थापन और पूजन का रहस्य भी है।

इसमें आदमीकी औसत आयु 1 हजार वर्ष हुआ करती थी। कलियुग की आयुसबसे कम 4 लाख 32 हजार वर्ष है। इसमें आदमी की औसतआयु सौ वर्ष है। जो अब घट कर साठ सत्तर वर्ष हो रही है।अगर हम शुरुआत के तीन युगों की ही गणना करें, तोयह अवधि 38 लाख 78 हजार वर्ष होती है। अगर हम यहमानें कि शुरू के 2 लाख वर्ष सृष्टि के निर्माण में लग गएहोंगे, तब भी यह अवधि 36 लाख वर्ष से अधिक होगी।दैत्यों और देवताओं के बीच संघर्ष सतयुग आरंभ होने केदो लाख बाद हुआ होगा और तभी समुद्र को मथकर उसमेंसे धन आदि निकालने की योजना बनी होगी। तब भी यहअवधि 36 लाख साल से अधिक ही प्रमाणित होती है।इस समय कलियुग का प्रथम चरण चल रहा है। धार्मिककार्य के लिए लिये जाने वाले संकल्प से तो ऐसा ही पता चलताहै। ‘अष्टाविंशति तमे युगे कलियुगे कलि प्रथम चरणे।’मतलब अभी कलियुग का प्रथम चरण ही चल रहा है। हर युगके चार चरण होते हैं। कलियुग एक लाख वर्ष से अधिक कीआयु पूरा कर चुका है।

उस अवधि को न भी माना जाए, तोभी कुंभ का आरंभ हुए 36 लाख वर्ष से अधिक हो चुके हैं।वैदिक और पौराणिक काल में लोग निर्धारित तिथि पर हरिद्वारनासिक, उज्जैन और इलाहाबाद में स्रान करने आते थे, लेकिनउसका स्वरूप व्यवस्थित नहीं था। आज जैसे तामझाम औरसुरक्षा प्रबंध भी नहीं थे। तब कुंभ केवल मेला था। इसमें मेलिमलाप तो होता ही था, धर्म चर्चा भी होती थी। लोग एक-दूसरेके जीवनानुभवों से लाभान्वित होते थे। इस्लामिक शासन कालमें जिस तरीके से हिंदू धर्म ग्रंथों, साहित्य, दर्शन और प्रामाणिकपुस्तकों को नष्ट किया गया, उससे इस देश का बड़ा नुकसानहुआ है। कुंभ पर्व कब से मनाया जा रहा है, भले ही इसकेआधिकारिक दस्तावेज नालंदा और तक्षशिला के पुस्तकालयोंमें लगी आग की भेंट चढ़ गए हों, लेकिन मान्यताओंऔर परंपराओं का वजूद आज भी कायम है।

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