कालचक्र में सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। तीनों का योग कुंभ का मूल आधार है। इस स्थिति में सभी ग्रह मित्रतापूर्ण और श्रेष्ठ माने जाते हैं। उसी तरह जब मानव जीवन में सज्जनों की संगति का योग बैठता है, तभी सद्चिन्तन का प्राकट्य होता है।

थर्ववेद में कहा गया है कि ब्रह्माण्ड काल के ऊपर स्थापित भरा हुआ कुंभ है। संत-ज्ञानीजन इसको दिन-रात जैसे विभिन्न रूपों में देखते हैं। काल प्रकट होकर दृश्यमान प्राणियों को अपने में समाहित कर लेता है। मनीषीगण उस काल को विकारों से रहित आकाश के समान (निर्लेप) बताते हैं। इसी प्रकार अथर्ववेद में ब्रह्मा जी कहते हैं‘हे मनुष्यो! मैं तुम्हें लौकिक और पारलौकिक सुखों को प्रदान करने वाले चार कुंभ पर्वों का निर्माण कर चार स्थानों (हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन, नासिक) पर पहुंच कर देवोपम अमृत को पाकर अमरत्व का पावन संदेश देता हूं।’ साधारणत: कुंभ का अर्थ घड़ा माना जाता है, किन्तु गहनतापूर्वक अवलोकन करने पर ‘यत्पिंडे तत्ब्रह्माण्डे’ की ओर भी संकेत करता है। मनुष्य के भीतर भी परमात्मा ने विराट ब्रह्माण्ड की रचना कर रखी है। द्रौपदी के घट-घटवासी को पुकारने और अपनी लाज बचाने के पीछे एक ही रहस्य है कि परमात्मा अपने भीतर समाविष्ट आत्मतत्व में विराजमान है, जिसका अनुभव होने पर मनुष्य मृत्यु से अमरत्व की ओर अग्रसर होता है। इसी को अमृत-तत्व कहते हैं। रावण की नाभि में अमृत का होना संकेत करता है कि बिना उसे निकाले मौत नहीं आ सकती। साधना मार्ग में यह स्थान मणिपुर चक्र का है। वैज्ञानिक इसको ‘सोलर प्लक्सस’ के नाम से जानते हैं। अर्थात् सविता का दिव्य प्रकाश इसी में आलोकित होता है।

अमृत-घट स्थापना
अमृत-घट की स्थापना का तात्पर्य अमरता प्राप्त करना भी कहा जा सकता है। मृत्यु जीव का सबसे बड़ा भय है। आत्मबोध होना भी अमृत-तत्व की प्राप्ति ही कहा जा सकता है। देवगण पयस्विनी का पयपान करके ही अमर हुए। गीता कहती है कि शरीर मरता है, आत्मा नहीं। फिर भी शरीर के साथ मोह-ममता बनाये रखना व्यक्ति की अज्ञानता ही है। कोई भी छोटा-बड़ा प्राणी मृत्यु से नहीं बच सकता। शास्त्रकारों ने देवताओं को अमर बताया है। किन्तु देवगण भी पूर्णतया अमर नहीं हैं। वे मृत्युलोकवासियों की अपेक्षा अधिक आयु के अवश्य होते हैं। उनका एक अहोरात्र मनुष्यों के एक वर्ष (छह मास का दिन और छह मास की रात्रि) के समान होता है। सूर्य जबतक उत्तरायण रहता है, तबतक देवताओं का दिन रहता है और दक्षिणायन की अवधि में रात्रि। इस कालगणना में उनकी आयु सौ वर्ष मानी गयी है। यह मनुष्यों के छत्तीस हजार वर्षों से कुछ अधिक ही है। हमारी दृष्टि में वे अजर-अमर प्रतीत होते हैं, क्योंकि इतनी अवधि में मानव की सहस्रों पीढि़यां मिट चुकी होती हैं। उदाहरण के लिए मच्छर और पतंगों की दृष्टि में मनुष्य भी एक तरह से अमर ही है, क्योंकि मनुष्य के जीवनकाल में उनकी हजारों पीढि़यां समाप्त हो चुकी होती हैं। इसलिए देवताओं को भी अमर कहना तर्कसंगत नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा है कि स्वर्गलोक भोगने और पुण्य क्षीण होने के बाद जीव पुन: मृत्युलोक में आता है। ये मान्यता अमृत के बारे में सटीक बैठती है। भगवती श्रुति में ऐसा संकेत है- ‘हमने सोमपान करके अमरता प्राप्त कर ली।’ गीता में सोमपान से इन्द्रलोक की प्राप्ति का उल्लेख है। वस्तुत: इन्हें सापेक्षिक अमरत्व की ही संज्ञा दी जा सकती है, जबकि जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होने का अर्थ कुछ और ही है। जन्म लेने वाले की मृत्यु तो निश्चित है। इसे टाला नहीं जा सकता। वैज्ञानिक खोजें भी इस दिशा में कोई सार्थक कदम नहीं उठा पायी हैं। वस्तुत: अमृत-तत्व की प्राप्ति का अभिप्राय मनुष्य योनि के पावन प्रयोजन को ही प्राप्त करना है। मृत्यु के विष को समझ लेने के उपरान्त ही जीवन के अमृत को पाया जा सकता है। शास्त्रों में इसको नि:श्रेयस कहकर संबोधित किया गया है, जो मानवी काया में ही संभव है। इसीलिए इसे सुरदुर्लभ कहा जाता है। यदि देवता अमर होते, तो वे मानव शरीर में आने के लिए क्यों आतुर रहते?

मानवीय सदगुण ही अमृत
देवगणों की अपेक्षा मनुष्य योनि को श्रेष्ठतम मानने के पीछे एक ही रहस्य अमृत-तत्व की प्राप्ति का है, जिसे पाने के बाद सदासर्वदा के लिए यम की यातनाएं मिटती और जीवन की सच्चाई सामने आ खड़ी होती हैं। स्कन्द पुराण में लिखा है- ‘कुल उसी का पवित्र माना जाता है, उसी की माता कृतार्थ है और पृथ्वी भी उसी के कारण पुण्यवती कहकर पुकारी जाती है, जो अपने परम ध्येय रूपी अमृत-तत्व को प्राप्त कर लेता है।’ शास्त्रकारों ने इस अमृत स्वरूप घट को पाने के कई उपाय भी सुझाये हैं। मानवी पुण्य-प्रयोजनों की प्राप्ति हेतु कोई भी पावन प्रयास अमृतोपम ही कहा जाएगा। कैवल्योपनिषद में कहा गया है- न सकाम कर्मों से, न संतति से और न सम्पत्ति से अमृत की प्राप्ति होती है, मात्र त्याग ही काम आता है। मतलब मानवीय सदगुण ही अमृत की श्रेणी में गिने जाते हैं। कठोपनिषद में निष्काम भाव से किये गये सभी कार्य अमृत की तुलना में आते हैं। परमात्म-विषयक ज्ञान की तुलना भी अमृत से की गयी है, क्योंकि परमात्म तत्व को जान लेने के पश्चात व्यक्ति अमर हो जाता है। ईश्वर का नाम भी अमृत सदृश है। पद्मपुराण के उत्तराखण्ड में कहा गया है कि हरि के नाम का निरन्तर उच्चारण करते हुए जीवनमुक्त हो जाता है। संस्कृत में प्रसाद शब्द के कई अर्थ निकलते हैं। ईश्वर और महापुरुषों की अनुकम्पा, अनुग्रह और आशीर्वाद भी एक तरह का प्रसाद है। अन्त:करण की पवित्रता और प्रसन्नता को भी प्रसाद के अन्तर्गत गिना जाता है। गीता में कहा गया है- ‘परमात्मा का अनुग्रहरूपी प्रसाद पाकर जीवन के सभी दु:ख दूर होते हैं।’

यज्ञीय जीवन भी अमृततुल्य
मनुष्य का यज्ञीय जीवन भी अमृततुल्य माना जाता है। मानव के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने हेतु कुंभ का आयोजन होता आया है। पौराणिक आख्यानों में कुंभ की संख्या बारह बतायी गयी है, जिनमें से चार मृत्युलोक और भारत की पुण्य प्रक्षालित भूमि में सम्पन्न होते हैं। कालगणना के दृष्टि से ऐसे ग्रहयोग बारह वर्ष बाद ही आते हैं। गंगातट हरिद्वार, त्रिवेणी घाट प्रयागराज, शिप्रा तट उज्जैन और गोदावरी की पावन गोद में नासिक का यह पावन पर्व बारह वर्ष बाद मनाने का विधि-विधान शास्त्र सम्मत भी है और विज्ञान सम्मत भी। कोई भी धमार्नुष्ठान नियत अवधि और स्थान विशेष पर करना ही पुण्यप्रद और फलप्रद होता है। कालचक्र में सूर्य, चन्द्र और बृहस्पति की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। तीनों का योग कुंभ पर्व का मूल आधार है, क्योंकि इस स्थिति में सभी ग्रह मित्रतापूर्ण और श्रेष्ठ माने जाते हैं। उसी तरह जब मानव जीवन में सज्जनों की संगति का योग बैठता है, तभी सद्चिन्तन का प्राकट्य होने लगता है। गायत्री परिवार के जनक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने प्रज्ञोपनिषद में संसार की मूलभूत समस्याओं का मुख्य कारण अचिन्त्य-चिन्तन ही बताया है। उनके द्वारा संचालित विचार क्रान्ति अभियान का एक ही लक्ष्य है कि जनजीवन में सद्चिन्तन और सत्कर्म का विकास-विस्तार हो। देव संस्कृति के यही दो आधार हैं। युग परिवर्तन की इस पावन बेला में जन-जन को इस युग्म का अमृतपान कराना ही महाकाल के अभियान का शुभारंभ होगा, जो पवित्र त्रिवेणी संगम से ही प्रारम्भ होता प्रतीत हो रहा है।

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