मा घ का महीना कल्पवास करने की दृष्टि से प्राचीनकालसे ही महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। यह परम्परा अबभी अक्षुण्ण है। कल्पवासियों का प्रयाग क्षेत्र में प्रवेशपौषपूर्णिमा से ही प्रारम्भ हो जाता है। तैयारियां तो पहले से हीहोने लगती हैं किन्तु कल्पवासियों की दिनचर्या और कल्पवासपौषपूर्णिमा के संगम स्नान से शुरू होता है। देश-विदेश के कोनेकोने से प्रयागराज के चारों ओर से कल्पवासियों की भीड़ देखतेही बनती है। ट्रैक्टरों पर रजाई, गद्दा, लकड़ी, पुआल, खाने-पीने की सामग्री, गैस चूल्हा, गैस सिलेण्डर आदि दैनिक उपयोगकी सामग्रियों के साथ उनका प्रवेश होने लगता है। प्रशासनकी ओर से लगाये गये टेंट और तम्बुओं में उनके ठहरने कीव्यवस्था की जाती है। कुछ लोग तो अपने-अपने आश्रमों केसाथ उन्हीं के द्वारा अधिग्रहीत और बनाई गयी व्यवस्थाओंमें कल्पवास करते हैं। कुछ निजी स्तर पर भी अलग से टेंटलगवाते हैं, कुछ संस्थाओं और मठों के बीच वास करते हैं।कुछ अपने-अपने गुरुओं के साथ उनके पंडालों में ही कल्पवासकरने की व्यवस्था करते हैं। कल्पवास करने के लिये साधु,सन्त, महात्मा और सद्गृहस्थ भी यहां आते हैं। विधि-विधानसे अपनी दिनचर्या और तदनुकूल नियम और अनुशासनों कापालन करते हैं। प्रयाग की पावन भूमि पर पदार्पण कर प्रत्येककल्पवासी प्रमुख तीर्थनायकों का स्मरण करते हुए प्रवेश करते हैं।

कितने दिन का कल्पवास
कल्पवास कब और कितने दिन तक किया जाना चाहिये, इस पर अनेक मत हैं। परन्तु प्रयाग में एक निश्चितअवधि तक कल्पवास करने की परम्परा है। कल्पवास कातात्पर्य है ‘कल्प: कल्पपर्यन्त: वास: इव वास: यस्य सवास: कल्पवास:’ अर्थात यह अवधि एक रात ,त्रिरात्रि कीहो, अथवा एक मास की हो परन्तु समान्यत: पूरे माघ महीने का वास ही कल्पवास कहा जाता है। पौराणिक परम्परानुसार पौषमास के शुक्लपक्ष की एकादशी से कल्पवास प्रारम्भ कर माघ शुक्ल एकादशी तक कल्पवास करना चाहिए। विष्णु पुराण के अनुसार मकर राशि में सूर्य के होने पर अमावस्या व पौर्णमासी के दिन कल्पवास व्रत शुरू किया जा सकता है। व्यावहारिक रूप में पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक एक मास का कल्पवास अब भी प्रचलित है। मकर संक्रान्ति से ही प्रथम स्नान प्रारम्भ हो जाता है।उसके बाद मेले का स्वरूप आकर्षक दिखने लगता है।

विशेष दिनचर्या का पालन
कल्पवास करने वाले जो भक्त प्रयागक्षेत्र में पदार्पणकरते हैं, उन्हें अनेक प्रकार के नियमों का पालन करनापड़ता है। उन्हें दिन में एक बार स्वयं बनाया हुआ आहार,अल्पाहार, फल-फूल ग्रहण करना पड़ता है। प्रमुख पर्वों पर उपवास, तीन बार त्रिवेणी संगम का स्नान, त्रिकाल सन्ध्या, भूमि पर शयन, ब्रह्मचर्य, जप, तप, हवन, देवार्चन, अतिथि सत्कार, हरि-भजन, कथा-श्रवण, पूजन-अर्चन करके दिनचर्या बितानी पड़ती है। प्रयाग में जनवरी के इस महीने में कड़ाके की ठंड पड़ती है। कभी-कभी बारिस हो जाने से कल्पवासियों की कठिन परीक्षा भी होती है। फिर भी उनका संकल्प हर परिस्थितियों में अडिग बना रहता है।

कल्पवास करने के नियम

पद्मपुराण में दत्तात्रेय द्वारा बताये गये कल्पवास केनियमानुसार कल्पवासी को मन, वचन और कर्म से इक्कीसनियमों का पालन करना चाहिए। ये नियम हैं- सत्य भाषण,अहिंसा, इन्द्रिय-संयम, दयाभाव, ब्रह्मचर्य-पालन, तैल,ताम्बूल एवं अन्य तामसिक उपादानों का त्याग। सभी प्रकारके व्यसनों का त्याग, सूर्योदय से पहले जगना, प्रतिदिन तीनबार स्नान, त्रिकाल सन्ध्या करनी चाहिए। साथ ही यथाशक्तिदान, पितरों को पिण्डदान, यथासम्भव मौन होकर जपकरना, भागवत कथा सुनना, सत्संग-कथा श्रवण आदि करनाचाहिए। संकल्पित प्रयागक्षेत्र से बाहर न जाना, पर-निन्दा कात्याग कर देना चाहिए। साधु-सन्तों की सेवा, निरन्तर प्रभुस्मरण, जाप एवं संकीर्तन में समय बिताना चाहिए। ये नियमप्रत्येक कल्पवासी को पालन करना चाहिए।

कल्पवास में दान का माहात्म्य

दान के तीन प्रकार बताये गये हैं- नित्य, काम्य और नैमित्तिक। गौशाला, बाग, तड़ाग आदि के निर्माण काम्यफलदेने वाले हैं। जो दिन-प्रतिदिन किये जाते हैं, वे नित्य दान कहलाते हैं। स्वर्ग प्राप्ति, विजय, ऐश्वर्य, स्त्री, पुत्र आदिकी प्राप्ति की इच्छा से जो दान किया जाता है, वह काम्य दान कहा जाता है। नैमित्तिक दान तीन प्रकार का कहागया है- कालापेक्ष, क्रियापेक्ष और धनापेक्ष। ये होम सहित और होमरहित होते हैं। देय पात्र के उत्तम, मध्यम औरअधम होने के कारण दान भी उत्तम, मध्यम और अधम होते हैं। अन्न, दधि, मधु, रक्षा की वस्तु, गौ, भूमि, सोना,हाथी आदि ये उत्तम पदार्थ उत्तम दान की कोटि में आते हैं। विद्या, वस्त्र, औषधि आदि मध्यम वस्तुएं मध्यम दानकी श्रेणी में कही गयी हैं। इन वस्तुओं के अतिरिक्त वस्तुओं का दान अधम दान कहा गया है। सत्व, रज या तमसे प्रेरित होकर जो दान किया जाता है, उसे उसके अनुरूप फल भी मिलता है। ये दान कब, कहां और किसे कियेजाने चाहिए इसका विस्तृत उल्लेख प्रयाग माहात्म्य शताध्यायी के अन्तर्गत द्रष्टव्य है।

स्नान के कई प्रकार

प्रयागक्षेत्र में कल्पवास करने वाले भक्तों को माघस्नान के भी अनेक नियम बताये गये हैं। त्रिकाल स्नानका नियम तो है ही, उसके अतिरिक्त छह प्रकार के स्नानभी बताये गये हैं। इनमें ब्राह्म, आग्नेय, वायव्य, दिव्य,वारुण और यौगिक ये छह प्रकार के स्नान कहे गये हैं।इन स्नान प्रकारों में सामान्य गृहस्थों के लिये गंगास्नान ही श्रेयस्कर माना गया है। विरक्त, साधु एवं संन्यासीके लिये आग्नेय अथवा भस्म या धूलि-स्नान करके भीउनकी शुद्धता का विधान बताया गया है। स्नान का उद्देश्यशारीरिक शुद्धता और स्वच्छता कहा गया है। कहा जाताहै- ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा।’ इस प्रकार स्वच्छ मनऔर शुद्ध भावना से स्नान करना ही श्रेयस्कर माना गया है।

व्रत और उपवास

कल्पवास में व्रत और उपवास का भी विशेष महत्व होता है।व्रत का तात्पर्य है निर्धारित संकल्प के अनुसार आचरण करने काअनुष्ठान और उपवास का अर्थ है भौतिक प्रवृत्तियों से हटकर आत्माके सन्निकट वास करना। इसमें आहार रहित होकर जब निर्धारिततिथियों या पर्वों पर हरि चिन्तन के साथ दैनिक भोजन बनाने आदिक्रियाओं से निवृत्त होकर उपवास किया जाता है, तो वह उपवास हीआत्मा के समीप अर्थात हरि के निकट उपस्थित कराता है। व्रतपालनके लिये मनुस्मृति में धर्म के दस अंगों का विधान बताया गया है।उनका समुचित पालन ही व्रत की सार्थकता कही गयी है। धैर्य,क्षमा, दम, स्वार्थ-दमन, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या,सत्य और अक्रोध (अहिंसा) ये धर्म के लक्षण हैं। व्रत पालन मेंस्वधर्म निजी कर्तव्यपालन को भी श्रेयस्कर कहा गया है।

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