रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन सहित देश के 13 प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने आदर्श आर्थिक रणनीति का जो सुझाव दिया है, उसमें कई बातें काफी महत्वपूर्ण हैं।

देश के 13 वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों ने अपने आदर्श आर्थिक सुझावों में किसान कर्जमाफी का खुल कर विरोध किया है। अन्य आर्थिक मुद्दों पर भी उन्होंने काफी महत्वपूर्ण राय दी है। इन पर व्यापक राजनीतिक विमर्श किया जाना चाहिए, ताकि देश आर्थिक मोर्चे पर सही दिशा में बढ़ सके।

सिद्धांत रूप में इन बातों को कमोबेश हर कोई स्वीकार करता है, लेकिन राजनीतिक विवशताओं की वजह से उनपर प्राय: अमल नहीं होता। सुझावों में किसान, रोजगार, पर्यावरण के साथ ही आर्थिक विषमता पर विशेष जोर दिया गया है और देश के विकास के लिए इन्हें आवश्यक बताया गया है। इस सुझाव को रघुराम राजन के साथ अभिजीत बनर्जी, प्रांजुल भंडारी, साजिद चिनॉय, मैत्रीश घटक, गीता गोपीनाथ, अमर्त्य लाहिड़ी, नीलंकठ मिश्रा, प्राची मिश्रा, कार्तिक मुरलीधरन, रोहिणी पांडे, ईश्वर प्रसाद तथा ई. सोमनाथन ने मिलकर तैयार किया है। ‘ऐन इकोनॉमिक स्ट्रैटिजी फॉर इंडिया’ शीर्षक से पेश की गयी आर्थिक रणनीति में इन अर्थशास्त्रियों का जोर कृषि कर्जमाफी पर है। फिलहाल कृषि कर्जमाफी देश में एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। ये कितना प्रभावी मुद्दा है, इसका अनुमान पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान किये गये चुनावी वादे और परिणाम पर पड़े उनके असर के रूप में देखा जा सकता है। अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक रणनीति में कृषि कर्जमाफी को चुनावी वादों का हिस्सा नहीं बनाये जाने की जरूरत पर बल दिया है। उनका कहना है कि इस तरह के चुनावी वादों को यदि पूरा करने की कोशिश की जाती है, तो इससे पूरी अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। कर्जमाफी की जगह किसानों की आमदनी बढ़ाना और ग्रामीण रोजगार योजना पर जोर देना देश के लिए ज्यादा कारगर विकल्प है। कर्जमाफ करने की जगह सरकारों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि किसानों को इतना सशक्त कैसे बनाया जाए, जिससे उन्हें कर्ज लेने की जरूरत ही न पड़े। ऐसा करने के लिए कृषि शोध की दिशा में निवेश बढ़ाने की जरूरत है, ताकि उन्नत किस्म के बीज तैयार किये जा सकें। साथ ही सिंचाई की भी नवीनतम तकनीक का उपयोग कर कम पानी से अधिक उपज प्राप्त करने की दिशा में किसानों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

रणनीति पत्र में आर्थिक विशेषज्ञों ने विकास दर का उल्लेख करते हुए इसकी प्रशंसा जरूर की है, लेकिन यह भी कहा है कि यह विकास दर संतुलित नहीं है। देश के नागिरकों का एक बहुत छोटा सा वर्ग लगातार आगे बढ़ रहा है, वहीं समाज के शेष वर्ग पिछड़ेपन का शिकार हैं।

देश के इन अग्रणी आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है की भूमिहीन ग्रामीणों के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम को और मजबूत किये जाने की जरूरत है, ताकि ऐसे लोगों को कृषि का मौसम खत्म होने के बाद भी आवश्यकता के मुताबिक रोजगार उपलब्ध होता रहे। यदि ऐसा हो सका तो भूमिहीन ग्रामीणों का शहरों की ओर होने वाला पलायन काफी हद तक रुक सकेगा। साथ ही ग्रामीण क्षेत्र में ढांचागत विकास होने की वजह से प्राथमिक सुविधाएं भी बढ़ायी जा सकेंगी। इन अर्थशास्त्रियों ने कृषि कर्जमाफी की परंपरा को देश की अर्थव्यवस्था के लिए काफी नुकसानदेह बताते हुए कहा है कि इससे कृषि क्षेत्र में निवेश पर नकारात्मक असर पड़ता है और कर्जमाफी करने वाले राज्यों का राजकोष दबाव में आ जाता है। कर्जमाफी जैसे कदम वित्तीय और चालू खाते के घाटे को एक झटके में बढ़ा देते हैं, जिससे आर्थिक मोर्चे पर राज्यों की परेशानियां बढ़ने लगती हैं। इसके साथ ही कृषि के नाम पर कर्ज लेने और कर्जमाफी की उम्मीद में उन्हें वापस नहीं करने की एक गलत परंपरा की भी शुरुआत होती है। यह परंपरा किसी भी स्थिति में देश या राज्य के विकास के लिए सही नहीं मानी जा सकती, क्योंकि अंतत: इसका भार देश के खजाने पर तो पड़ता ही है, ईमानदारी से कर्ज का भुगतान करने वाले सामान्य किसानों पर भी नकारात्मक रूप से पड़ता है। आर्थिक रणनीति के इन सुझावों में रोजगार की कमी को प्रमुखता के साथ रेखांकित किया गया है। कहा गया है कि देश में सालाना एक से सवा करोड़ रोजगार सृजित किये जाने की जरूरत है, जबकि फिलहाल सरकार इससे काफी कम रोजगार का सृजन कर पाने में सफल हो रही है। रोजगार सृजन के क्षेत्र में एक बड़ी चिंता यह भी है कि राजनीतिक वजहों से निजी क्षेत्रों और ढांचागत विकास के क्षेत्र में काम करने वाले अकुशल या अर्द्धकुशल श्रमिकों की संख्या को कभी आंकड़ों में शामिल नहीं किया जाता। इस बात में कोई शक नहीं है कि पिछले तीन-चार वर्षों में देश के तमाम हिस्सों में ढांचागत विकास के क्षेत्र में काफी काम हुए हैं। इन सभी कामों में श्रमिकों का नियोजन हुआ है, लेकिन यदि आंकड़ों की बात की जाए, तो ऐसे श्रमिकों के नियोजन को रोजगार के आंकड़ों में कभी स्थान नहीं मिल पाता है। निजी क्षेत्र में बढ़ती असुरक्षा और लगातार खराब होती जा रही सेवा शर्तों की वजह से भी ज्यादातर युवा सरकारी नौकरी पाने को ही सबसे अधिक महत्व देते हैं। सरकारी नौकरी की चाहत युवाओं को कई बार उनकी शिक्षा की तुलना में कम अहम पदों पर भी काम करने के लिए बाध्य कर देता है। सरकारी नौकरियों को हासिल करने की ललक की वजह से ही देश के युवाओं का एक बड़ा वर्ग अपनी जिंदगी के कई साल प्रतियोगी परीक्षाओं का सामना करते-करते ही बिता देता है। अंत में जब उसे सफलता नहीं मिलती है, तो वह मजबूरन निजी क्षेत्र का मार्ग चुनता है। आर्थिक रणनीति पत्र में इस विषय पर विशेष जोर दिया गया है कि रोजगार सृजन का तात्पर्य सिर्फ सरकारी सेवा की नौकरियां ही नहीं होना चाहिए। इसमें बड़े पैमाने पर अर्द्धकुशल नौकरियों की गुंजाइश बढ़ाने, कामगारों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने तथा तटीय क्षेत्रों से दूर के इलाकों में भी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत पर विशेष रूप से बल दिया गया है। इन अर्थशास्त्रियों ने रणनीति पत्र में रोजगार और किसान के मुद्दे के साथ ही पर्यावरण के मुद्दे को भी काफी प्रमुखता के साथ उठाया है। इसे दुर्भाग्य ही समझा जाना चाहिए कि राजनीतिक वजहों से आर्थिक मुद्दों, किसान के मुद्दों और रोजगार के मुद्दों को तो हर राजनीतिक पार्टियां प्रमुखता से उठाती हैं, लेकिन पर्यावरण को अभी तक महत्व के मुद्दे के रूप में शामिल नहीं किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अवश्य ही इस पर बात होती है, देश में बड़े आर्थिक फैसले लेते वक्त पर्यावरण के महत्व पर विशेष रुप से ध्यान देने की जरूरत महसूस नहीं की जाती है। रणनीति पत्र पर्यावरण को लेकर ऐसे नियामक के गठन की जरूरत पर बल देता है जिसे पद से आसानी से न हटाया जा सके। इसका उद्देश्य सिर्फ यही है कि देश का राजनीतिक नेतृत्व पर्यावरण संबंधी चिंताओं को अपनी सुविधा तथा अपनी जरूरत के मुताबिक बदल न सके। पिछले कुछ वर्षों के दौरान आर्थिक विकास के क्रम में पर्यावरण मंत्रालय तथा अन्य मंत्रालयों के बीच टकराव की खबरें आती रही हैं और हर सरकार अपनी जरूरत या अपनी सुविधा के मुताबिक पर्यावरण के नियमों में फेरबदल करती रही है। इससे उद्योग-धंधों का तो विकास होता है, लेकिन पर्यावरण को इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है। रणनीति पत्र में आर्थिक विकास को तो महत्वपूर्ण बताया ही गया है, साथ ही पर्यावरण संरक्षण की जरूरत पर भी बल दिया गया है और कहा गया है कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है, ताकि देश का आर्थिक विकास भी हो सके और पर्यावरण भी सुरक्षित रह सके। रणनीति पत्र में आर्थिक विशेषज्ञों ने विकास दर का उल्लेख करते हुए इसकी प्रशंसा जरूर की है, लेकिन यह भी कहा है कि यह विकास दर संतुलित नहीं है। इसमें समाज के सभी वर्गों की समान भागीदारी होनी चाहिए, जबकि प्रायोगिक तौर पर ऐसा हो नहीं पा रहा है। देश के नागिरकों का एक बहुत छोटा सा वर्ग लगातार आगे बढ़ रहा है, वहीं समाज के शेष वर्ग पिछड़ेपन का शिकार हैं। इसकी वजह से देश में आर्थिक असमानता की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। जरूरत इस बात की है कि समाज के सभी वर्गों का सम्यक विकास हो और विकास दर को आगे ले जाने में हर वर्ग का योगदान हो। इन अर्थशास्त्रियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि उनकी आर्थिक रणनीति पत्रक का उद्देश्य सकारात्मक आलोचना करना और देश की आर्थिक स्थिति को सही दिशा में ले जाने का सुझाव देना है। इसे किसी भी राजनीतिक दल या किसी सरकार के खिलाफ नहीं माना जाना चाहिए। निश्चित रूप से इस आदर्श रणनीति में जो बातें सुझायी गयी हैं, उन पर व्यापक विचारविमर्श किया जाना चाहिए ताकि देश फिलहाल जिन आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, उसमें एक सार्थक रास्ते की तलाश की जा सके और देश को आर्थिक विकास की दिशा में हर वर्ग के सहयोग से तेजी से बढ़ाया जा सके।

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रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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