2019 का लोकसभा चुनाव अभी तक सबसे महंगा चुनाव साबित होने जा रहा है। अनुमान है कि इस बार लगभग 50 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे। यह देश की कुल जीडीपी का 0.33 फीसद है। जाहिर है इसमें ब्लैकमनी का भी एक बड़ा हिस्सा है।

लोकतंत्र के सबसे बड़े त्योहार का आगाज हो चुका है। हर चुनाव पर हजारों करोड़ खर्च होते हैं। आजादी के बाद 1952 में हुए पहले लोकसभा चुनाव में जो चुनाव खर्च महज 10. 45 करोड़ का था, वही खर्च अब कई हजार करोड़ का हो गया है। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार के चुनाव में कुल खर्च 50 हजार करोड़ रुपये तक का हो सकता है। भारत का सकल घरेलू उत्पाद 2.264 ट्रिलियन डॉलर यानी 158.48 खरब रुपये का है। इसमें 50 हजार करोड़ रुपये का खर्च चुनाव पर होने का मतलब सिर्फ इस एक चुनाव में जीडीपी का लगभग 0.33 फीसदी खर्च हो जाएगा। आंकड़ों के लिहाज से ये अधिक बड़ा प्रतिशत नजर नहीं आता है, लेकिन अगर इसके कुल आकार की बात की जाए तो यह देश के स्वास्थ्य बजट से थोड़ी ही कम राशि है। चुनाव आयोग द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के मुताबिक चुनाव में प्रति मतदाता सरकार को 17 रुपये का खर्च करना पड़ता है। देश में लगभग 90 करोड़ मतदाता हैं। ऐसे में 17 रुपये प्रति मतदाता के हिसाब से चुनाव में सरकार का खर्च ही लगभग 1530 करोड़ रुपये का होगा। इसमें हर संसदीय सीट पर सिर्फ दो उम्मीदवारों के लिहाज से ब्लैकमनी को छोड़कर अगर केवल वैधानिक खर्च जोड़ा जाए तो ये राशि लगभग 2330 करोड़ रुपये हो जाती है। यह वह रकम है, जिसे ह्वाइट-मनी के रूप में खर्च किया जाता है।
लेकिन इस तथ्य से हर कोई परिचित है कि चुनाव के दौरान ह्वाइट-मनी के खर्च से ब्लैक मनी का खर्च कई गुना अधिक होता है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए चुनाव की प्रक्रिया, खर्च और चुनाव से जुड़े अन्य तथ्यों का विश्लेषण करने वाली संस्था इलेक्शन वॉच का मानना है कि इस बार का चुनाव खर्च 50 हजार करोड़ रुपये को पार कर सकता है। चुनाव में होने वाले खर्च में आजादी के बाद सिर्फ एक बार 1957 में कमी आई है। उसके बाद से हर साल चुनाव का खर्च बढ़ता ही रहा है। चुनाव आयोग द्वारा उपलब्ध कराये गये ये आंकड़े सिर्फ उसी खर्च की जानकारी देते हैं, जो चुनाव की व्यवस्था, प्रशासनिक और सुरक्षा इंतजामों पर किये गये तथा जिस खर्च का हिसाब पार्टियों और उम्मीदवारों ने चुनाव आयोग के पास जमा किया।
इस खर्च में उस राशि का कहीं भी उल्लेख नहीं है, जो उम्मीदवारों द्वारा ब्लैक-मनी के जरिए खर्च किये जाते हैं। इलेक्शन वॉच के सचिव डीजी जगन्नाथ के मुताबिक चुनाव में जमकर रैलियों का आयोजन किया जाता है, रोड-शो किये जाते हैं, बाइक रैलियां निकाली जाती हैं और नेताओं की धुआंधार हवाई यात्राएं होती हैं। लेकिन इनका कभी भी पार्टियों या उम्मीदवारों द्वारा चुनाव आयोग को पक्का हिसाब नहीं दिया जाता है। इलेक्शन वॉच के मुताबिक सिर्फ रोड-शो और बाइक रैलियों पर ही हर उम्मीदवार लाखों रुपये खर्च करता है। इसी तरह नेताओं की जनसभाओं और चुनावी रैलियों पर भी भारी-भरकम राशि खर्च की जाती है।|
डीजी जगन्नाथ के मुताबिक इतनी बड़ी राशि से विकास के कई काम किये जा सकते हैं, लड़ाकू विमानों का पूरा बेड़ा तैयार किया जा सकता है। लेकिन लोकतंत्र में चुनाव सबसे जरूरी है। चुनाव होंगे तो खर्च भी होगा। जरूरत इस बात की है चुनाव में काले धन के इस्तेमाल पर कड़ाई से रोक लगाई जाए, क्योंकि अगर काले धन का इस्तेमाल रुक गया तो चुनाव में खर्च होने वाली कुल राशि का लगभग 90 फीसदी पैसा अन्य विकास कार्यों या युद्धक तैयारियों के लिए किया जा सकता है। इसके लिए चुनाव आयोग को तो सख्त होना ही होगा, राजनीतिक दलों को भी संकल्प लेना होगा। ऐसा होने से ही चुनाव में ब्लैक-मनी के उपयोग पर प्रभावी रोक लग सकेगी और चुनाव के खर्च को न्यूनतम किया जा सकेगा।

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रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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