मौद्रिक नीति में लोगों का ध्यान ब्याज दर में कमी या वृद्धि की ओर ही टिका रहता है। लेकिन इस बार की मौद्रिक नीति न केवल ब्याज दर में कमी के कारण उल्लेखनीय है, बल्कि आरबीआई के कई बड़े फैसलों ने भी इसकी महत्ता बढ़ा दी है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने लंबे इंतजार के बाद नीतिगत ब्याज दरों में कमी करने का ऐलान किया है रेपो रेट में आरबीआई ने 25 बेसिस प्वाइंट की कटौती की है, जिससे यह 6.5 फीसदी से घटकर 6.25 फीसदी हो गया है। इसके पहले केंद्रीय बैंक ने अगस्त 2017 में अपने ब्याज दरों में कटौती की थी। उसके बाद से ब्याज दर या तो स्थिर बनी रही या फिर उनमें उछाल ही आया। अपनी मौद्रिक नीति में केंद्रीय बैंक ने न केवल ब्याज दरों को कम किया है, बल्कि बैंकिंग सेक्टर की समस्याओं का निराकरण ढूंढने की भी कोशिश की है।
आमतौर पर वित्त वर्ष की शुरुआत में ही नियामक प्राधिकार के रूप में रिजर्व बैंक बैंकिंग संबंधी बड़ी घोषणाएं करता है, नए गवर्नर शक्तिकांत दास ने अपनी पहली मौद्रिक समीक्षा बैठक में ही बैंकिंग सिस्टम तथा अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद चुनौतियों का समाधान निकालने की कोशिश की है। ये उपाय कितने सफल होंगे, ये तो आने वाले दिनों में पता चलेगा, लेकिन इतना तो तय है कि शक्तिकांत दास ने बैंकिंग सेक्टर की समस्याओं के निदान की कोशिश करके अपने उन आलोचकों का मुंह बंद कर दिया है, जो अभी तक यही कहते रहे थे कि एक नौकरशाह से बैंकिंग सेक्टर में अधिक बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती।
अपनी पहली मौद्रिक नीति में उन्होंने सरकार की इच्छा के मुताबिक ब्याज दरों में कटौती जरूर की है, लेकिन पूरी नीति को देखने के बाद कहा जा सकता है कि रेपो रेट में कमी करने का फैसला कोई राजनीतिक दबाव का फैसला नहीं है, बल्कि रिजर्व बैंक की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति कि आम राय से बनी नीति है। इस नीति में अर्थव्यवस्था को सख्त मापदंडों से बचने की दिशा में बढ़ने की कोशिश की गयी है। बैंकिंग सेक्टर की चुनौतियों से निपटने के लए शहरी सरकारी बैंकों से लेकर कृषि क्षेत्र और दिवालिया कानून की अड़चनों को दूर करने संबंधी कई बड़ी घोषणाएं मौद्रिक नीति में की गयी है। मौद्रिक नीति जारी होने के पहले तक बहस सिर्फ इस बात को लेकर थी कि रेपो रेट स्थिर रखा जायेगा या इसमें कमी लाई जायगी। विकास के मापदंडों पर देखा जाए तो रेपो रेट को कम किया जाना जरूरी था, ताकि ब्याज दरें कम हो सकें और बैंकों के कर्जों का उठान बढ़ सके।
शक्तिकांत दास की अगुवाई में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति भारतीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था का लए शहरी सरकारी बैंकों से लेकर कृषि क्षेत्र और दिवालिया कानून की अड़चनों को दूर करने संबंधी कई बड़ी घोषणाएं मौद्रिक नीति में की गयी है। मौद्रिक नीति जारी होने के पहले तक बहस सिर्फ इस बात को लेकर थी कि रेपो रेट स्थिर रखा जायेगा या इसमें कमी लाई जायगी। विकास के मापदंडों पर देखा जाए तो रेपो रेट को कम किया जाना जरूरी था, ताकि ब्याज दरें कम हो सकें और बैंकों के कर्जों का उठान बढ़ सके। शक्तिकांत दास की अगुवाई में रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति भारतीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था का कर भारत की एक बड़ी परेशानी का हल निकाल लिया। वहीं एक आशंका अमेरिकी फेड द्वारा अपनी ब्याज दरों को बढ़ाने की भी थी, लेकिन वहां के शीर्ष बैंक ने भी ब्याज दरों को बढ़ाए जाने की बात पर ठंडा रुख अपना लिया। इसका असर यह हुआ कि जो डॉलर रुपये की तुलना में रोज छलांग लगा रहा था, उसकी उछाल हल्की पड़ गयी और रुपया तुलनात्मक तौर पर मजबूत हुआ।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि भारत में महंगाई दर में तेजी से कमी आयी। अक्टूबर 2018 की तुलना में अभी तक महंगाई में लगभग 18 फीसदी की कमी हो चुकी है। हालांकि खाद्य पदार्थों की कीमत भारत के साथ ही पूरी दुनिया में गिरी हैं। इसमें अंतर सिर्फ यही है कि चीन जैसी विशाल अर्थव्यवस्था महंगाई कम होने की वजह से सुस्त पड़ने लगी है, जबकि भारत में महंगाई कम होने का असर अर्थव्यवस्था की रतार के रूप में नजर आ रहा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने अपने आकलन में भारत की जीडीपी का आकलन 7.2 फीसदी आंका है। यह जाहिर करता है कि अर्थव्यवस्था की रतार तेज बनी हुई है। कृषि क्षेत्र से जीडीपी को हमेशा चुनौती मिलती है। इस बार भी रबी की बुवाई में लगभग चार फीसदी की कमी देखी गयी, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि देर तक ठंड पड़ने और समय से बारिश हो जाने के कारण कम बुवाई के बावजूद रबी फसलों का पिछली बार से अधिक उत्पादन होगा। और तो और, खुदरा तथा थोक महंगाई दर भी लगातार नियंत्रित बनी हुई है। ऐसे में अगर भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में कमी करने का फैसला लिया है तो इसे राजनीतिक दबाव वाला फैसला नहीं कहा जा सकता, बल्कि इसका असर विकास की रतार को और तेज करने के रूप में नजर आएगा।
शक्तिकांत दास की अगुवाई में जारी मौद्रिक नीति में सहकारी क्षेत्र के बैंकों के लिए शीर्ष संगठन बनाने का नीतिगत फैसला लिया गया है, जो सहकारी क्षेत्र के बैंकिंग तंत्र को मजबूत करेगा। इससे आम जनता में भी सहकारी बैंकों के प्रति अधिक भरोसा बन सकेगा। यह शीर्ष संगठन सहकारी बैंकों की दिक्कतों को दूर करने, आईटी व्यवस्थाओं को बहाल करने तथा उन्हें अतिरिक्त पूंजी उपलब्ध कराने में भी मदद उपलब्ध कराएगा। इसी तरह गैर बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) के वर्गीकरण में बदलाव को के फैसले को भी मौद्रिक नीति की अहम बात माना जा रहा है। अभी तक एनबीएफसी को अलग अलग वर्गों में रखा जाता था, लेकिन अब आरबीआई ने फाइनेंस कंपनी, लोन कंपनी और निवेश कंपनियों को एक ही श्रेणी में रखने की बात मौद्रिक नीति में कही है।
इससे इन कंपनियों पर निगरानी करना ज्यादा आसान होगा। केंद्रीय बैंक की उच्चस्तरीय समिति ने 2014 में ही एनबीएफसी के वर्गीकरण में बदलाव करने की सिफारिश की थी, लेकिन अभी तक कोई भी गवर्नर इस दिशा में कदम उठाने की हिम्मत नहीं दिखा सका था। शक्तिकांत दास ने अपनी पहली मौद्रिक समीक्षा बैठक में ही इस सिफारिश को लागू कर दिया है और एनबीएफसी के लिए अतिरिक्त फंड जुटाने के उपायों की घोषणा की है। मासिक समीक्षा बैठक में आरबीआई ने एक अहम काम विदेश में अपनी मुद्रा में निवेश को बढ़ावा देने के उपाय सुझाने के लिए एक कार्यदल का गठन करके किया है। ये कार्यदल बताएगा कि विदेश में रुपये के कारोबार को कैसे बढ़ाया जा सकता है और किस तरह दूसरे देशों के निवेशकों को रुपये के प्रति आकर्षित किया जा सकता है। अगर इन उपायों पर कारगर तरीके से काम हो गया, तो आने वाले दिनों में रुपये की कीमत को स्थिर रखने में काफी मदद मिल सकेगी।
इसी तरह बल्क डिपॉजिट का प्रस्ताव काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। केंद्रीय बैंक ने दो करोड़ से ज्यादा की राशि के जमा को बल्क डिपॉजिट घोषित किया है। बैंक अभी तक एक करोड़ से ज्यादा के डिपॉजिट पर ज्यादा ब्याज का प्रस्ताव देते हैं, ताकि निवेशक अधिक रिटर्न की चाहत में बैंक में एकमुश्त अधिक से अधिक धन का निवेश करे। लेकिन ये सीमा अब दो करोड़ की कर दी गई है। इससे उन निवेशकों को निराशा होगी, जो दो करोड़ से कम का डिपॉजिट करते थे, लेकिन इससे बैंकों का पूंजी आधार बनाने में मदद मिलेगी और बैंक तुलनात्मक तौर पर अधिक ब्याज देने से भी बच सकेंगे। मौद्रिक नीति में ही केंद्रीय बैंक ने किसानों को तोहफा देते हुए बिना गारंटी के मिलने वाले कर्ज की सीमा भी बढ़ा दी है। पहले यह सीमा एक लाख रुपये थी जिस बढ़ाकर 1.6 लाख कर दिया गया है। इतना तो तय है कि इस बार की मौद्रिक नीति काफी राहत देने वाली है और अगर इसे राजनीति की दृष्टि से न देखा जाए, तो यह देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने वाली भी है।

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रांची विश्वविद्यालय से स्नातक। वर्ष 1988 में रांची में ही फील्ड रिपोर्टर के रूप में रांची एक्सप्रेस से जुड़े। उसके बाद साप्ताहिक रविवार, प्रभात खबर, सेंटिनल, पांचजन्य, राजस्थान पत्रिका, टेलीग्राफ, इकोनॉमिक्स टाइम्स, अमर उजाला, बीएजी फिल्म्स, न्यूज 24, इंडिया टीवी, जी न्यूज जैसी संस्थाओं के लिए उप संपादक से लेकर विशेष संवाददाता, सहायक फीचर एडिटर, समन्वय संपादक, एक्जक्यूटिव प्रोड्यूसर जैसे पदों पर कार्य कर चुके हैं। टीवी की दुनिया में ‘पोलखोल’ और ‘सनसनी’ जैसे कार्यक्रमों का भी प्रोडक्शन किया है।

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